ज्ञानवापी: पुराने केस में छह सितंबर को आएगा आदेश, अधिवक्ता की बहस पूरी; वाद मित्र नियुक्त करने पर सवाल
न्यायालय के किसी त्रुटि के कारण कोई पक्षकार के हित प्रवाहित नहीं होनी चाहिए ये नैसर्गिक न्याय की मंशा है। उच्चतम न्यायालय के नजीर में ये भी कहा गया कि न्याय के विलंबता यदि न्याय के विफलता है। तो न्याय देने में जल्दबाजी न्याय के दफन करने जैसा है।
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Varanasi News: सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) भावना भारती की अदालत में शुक्रवार को ज्ञानवापी के वर्ष 1991 के पुराने मुकदमे में सुनवाई हुई। मामले में पैरोकार रहे हरिहर पांडेय की बेटियों की ओर अधिवक्ता आशीष श्रीवास्तव ने बहस पूरी कर ली। इस मामले में आदेश के लिए कोर्ट ने छह सितंबर की तिथि नियत की है।
शुक्रवार को बेटियों की ओर से अधिवक्ता ने कोर्ट के आदेश में संशोधित करने संबंधित अर्जी के समर्थन किया और वाद मित्र नियुक्त पर भी कई सवाल खड़ा किया। अधिवक्ता ने कहा कि उच्चतम न्यायालय नजीर हैं। वह बताता है कि कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि हो गई है तो उसे स्वयं ही सुधार कर सकती है या अगर पक्षकार उसपर ध्यान दिलाया है उसे संज्ञान में लेना चाहिए।
काफी देर तक चली बहस
उन्होंने कहा, पक्षकार गण ने इसपर बहस ही नहीं की थी और आदेश हो गया। 11 अक्तूबर 2019 को कोर्ट ने सिर्फ वादमित्र नियुक्त किया न कि वादी बनाया है। ये जनहित संबंधित वाद है। जो हिंदू जनमानस से जुड़ा हुआ। जिस प्राइवेट ट्रस्ट के माध्यम से इस मुकदमे को पैरवी करने की हकदार के दावा किया जा रही वो कपोल कल्पित है। उनके इस अर्जी पर विरोध करने के विधिक अधिकार भी नहीं है। इस लिए बेटियों के ओर वे दाखिल आदेश में संशोधित करने की अर्जी को स्वीकार करने की गुहार लगाई।
वहीं, पिछली तिथि पर वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी और अंजुमन इंतजामिया मसाजिद की ओर से रईस अहमद अंसारी ने बहस की थी। वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने कोर्ट में कहा था कि इस मामले में अवर न्यायालय से आदेश हो चुका है। हालांकि बेटियों की ओर से बार-बार अपनी बहस में ये कहा जा रहा कि वाद मित्र ने हरिहर पांडेय के धोखे में रख कर अपने को इस मामले में वाद मित्र नियुक्त करवाए है। जबकि कोर्ट ने सारे प्रक्रिया पूरी करने के बाद 2019 में उसे न्यायालय ने वाद मित्र नियुक्त किया गया था।