{"_id":"c930abbd574c5c4dc584a4a6ea67ee7b","slug":"electricity-cut-in-winter-session-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"जाड़े में भी शहर को कटौती से राहत नहीं ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जाड़े में भी शहर को कटौती से राहत नहीं
वाराणसी
Updated Sun, 14 Dec 2014 01:11 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के बावजूद शहर को जाड़े में भी बिजली कटौती से राहत नहीं मिल रही है। लखनऊ कंट्रोल ने 20 घंटे का बिजली देने का शेड्यूल तय किया है लेकिन कटौती का समय निर्धारित है लेकिन कोई नहीं जानता कि बिजली कब आएगी और कब जाएगी। सूबे में इफरात बिजली हुई तो 24 घंटे चकाचक रहता है और जैसे ही क्राइसिस होती है सबसे पहले बनारस का गला रेता जाता है। केवल लखनऊ ही सताता तो भी राहत होती लेकिन जर्जर तार, उपकेंद्रों पर अधिक भार की मार भी यहां के उपभोक्ताओं के झेलनी पड़ती है।
पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के कारण लोगों को उम्मीद थी कि शहर को 24 घंटे बिजली मिलेगी। इसके लिए आंदोलन भी हुआ, जिसके चलते सरकार ने एक महीने तक 24 घंटे आपूर्ति की लेकिन सूबे में विद्युत संकट उत्पन्न होती ही शहर में छह से आठ घंटे की कटौती होने लगी। उसके बाद चार घंटे की कटौती का शेड्यूल जारी कर दिया गया। वर्तमान में कटौती का समय दिन में एक से तीन और शाम को पांच से सात बजे के बीच निर्धारित है लेकिन इस पर अमल शायद ही किसी दिन किया गया हो।
शुक्रवार को ही रात में सात से नौ बजे तक शहर की बिजली काटी गई। यह स्थिति जाड़े में है जबकि गर्मियों में तो कई मुहल्लों में 10 घंटे से ज्यादा की कटौती झेलनी पड़ती है। सबसे ज्यादा दिक्कत कटौती का समय निर्धारित नहीं होने से होता है। आधी रात को गुल होने वाली बिजली चैन से सोने नहीं देती जबकि शाम की कटौती से पढ़ाई-लिखाई और कारोबार प्रभावित होता है। व्यापारी नेता अजीत सिंह बग्गा का कहना है कि बिजली की कटौती के चलते शहर के तमाम कुटीर उद्योग बंद हो गए।
विज्ञापन
शहर की विद्युत वितरण व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद योजनाबद्ध तरीके से काम नहीं होने के कारण उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल पा रही है। उपकेंद्रों पर क्षमता से अधिक लोड होने के कारण गर्मियों में यहां से लोकल रोस्टरिंग करनी पड़ती है। इसके अलावा जर्जर तारों के टूटने और ट्रांसफार्मरों के ओवरलोड होने की मार भी झेलनी पड़ती है। चांदपुर औद्योगिक आस्थान में कुछ फीडरों को 24 घंटे बिजली दी जा रही है लेकिन उद्यमी राजेश भाटिया का कहना है कि अक्सर लो वोल्टेज की समस्या रहती है, जिससे मशीनें नहीं चल पाती हैं।
तारों का जाल, कटियामारी से संकट
वाराणसी। शहर में तारों का जाल बिछा हुआ है। नियमानुसार पोल से 40 मीटर से ज्यादा दूरी तक कनेक्शन नहीं दिए जा सकते हैं लेकिन इस नियम की धज्जियां उड़ाते हुए कई मुहल्लों में 100 मीटर की दूरी तक लोग बांस-बल्लियों के सहारे तार खींच कर बिजली ले रहे हैं। इसके अलावा गलियों में कटियमारी के चलते तारों से चिनगारी निकलती रहती है। धीरे-धीरे तार कमजोर हो जाते हैं और टूटने लगते हैं। किसी इलाके में तार टूटने पर उसकी मरम्मत में कई घंटे लग जाते हैं क्योंकि विभाग के कर्मचारियों की संख्या भी कम है। इतना ही नहीं विभागीय आंकड़ों के मुताबिक 35 फीसदी बिजली चोरी हो रही है।
उपकेंद्र चल रहे पूरी क्षमता पर
वाराणसी। शहर के 32 उपकेंद्रों की कुल क्षमता 517 एमवीए की है। गर्मियों में शाम के समय बिजली की मांग इससे ऊपर चली जाती है। ऐसे में लोकल रोस्टरिंग करनी पड़ती है। गोदौलिया, चौक, मैदागिन, बेनियाबाग, शंकुलधारा, बेनियाबाग, डीपीएच आदि उपकेंद्रों को पूरी क्षमता से चलाना पड़ रहा है। भदैनी, सिगरा और विद्यापीठ पर तो जरूरत से ज्यादा भार होने के कारण लोड शेडिंग करनी पड़ती है। नगरीय विद्युत वितरण मंडल प्रथम के अधीक्षण अभियंता पीपी सिंह के मुताबिक उपकेंद्रों के लिए जगह की तलाश करना सबसे बड़ी समस्या है।
विज्ञापन
पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के कारण लोगों को उम्मीद थी कि शहर को 24 घंटे बिजली मिलेगी। इसके लिए आंदोलन भी हुआ, जिसके चलते सरकार ने एक महीने तक 24 घंटे आपूर्ति की लेकिन सूबे में विद्युत संकट उत्पन्न होती ही शहर में छह से आठ घंटे की कटौती होने लगी। उसके बाद चार घंटे की कटौती का शेड्यूल जारी कर दिया गया। वर्तमान में कटौती का समय दिन में एक से तीन और शाम को पांच से सात बजे के बीच निर्धारित है लेकिन इस पर अमल शायद ही किसी दिन किया गया हो।
विज्ञापन
शुक्रवार को ही रात में सात से नौ बजे तक शहर की बिजली काटी गई। यह स्थिति जाड़े में है जबकि गर्मियों में तो कई मुहल्लों में 10 घंटे से ज्यादा की कटौती झेलनी पड़ती है। सबसे ज्यादा दिक्कत कटौती का समय निर्धारित नहीं होने से होता है। आधी रात को गुल होने वाली बिजली चैन से सोने नहीं देती जबकि शाम की कटौती से पढ़ाई-लिखाई और कारोबार प्रभावित होता है। व्यापारी नेता अजीत सिंह बग्गा का कहना है कि बिजली की कटौती के चलते शहर के तमाम कुटीर उद्योग बंद हो गए।
विज्ञापन
शहर की विद्युत वितरण व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद योजनाबद्ध तरीके से काम नहीं होने के कारण उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल पा रही है। उपकेंद्रों पर क्षमता से अधिक लोड होने के कारण गर्मियों में यहां से लोकल रोस्टरिंग करनी पड़ती है। इसके अलावा जर्जर तारों के टूटने और ट्रांसफार्मरों के ओवरलोड होने की मार भी झेलनी पड़ती है। चांदपुर औद्योगिक आस्थान में कुछ फीडरों को 24 घंटे बिजली दी जा रही है लेकिन उद्यमी राजेश भाटिया का कहना है कि अक्सर लो वोल्टेज की समस्या रहती है, जिससे मशीनें नहीं चल पाती हैं।
तारों का जाल, कटियामारी से संकट
वाराणसी। शहर में तारों का जाल बिछा हुआ है। नियमानुसार पोल से 40 मीटर से ज्यादा दूरी तक कनेक्शन नहीं दिए जा सकते हैं लेकिन इस नियम की धज्जियां उड़ाते हुए कई मुहल्लों में 100 मीटर की दूरी तक लोग बांस-बल्लियों के सहारे तार खींच कर बिजली ले रहे हैं। इसके अलावा गलियों में कटियमारी के चलते तारों से चिनगारी निकलती रहती है। धीरे-धीरे तार कमजोर हो जाते हैं और टूटने लगते हैं। किसी इलाके में तार टूटने पर उसकी मरम्मत में कई घंटे लग जाते हैं क्योंकि विभाग के कर्मचारियों की संख्या भी कम है। इतना ही नहीं विभागीय आंकड़ों के मुताबिक 35 फीसदी बिजली चोरी हो रही है।
उपकेंद्र चल रहे पूरी क्षमता पर
वाराणसी। शहर के 32 उपकेंद्रों की कुल क्षमता 517 एमवीए की है। गर्मियों में शाम के समय बिजली की मांग इससे ऊपर चली जाती है। ऐसे में लोकल रोस्टरिंग करनी पड़ती है। गोदौलिया, चौक, मैदागिन, बेनियाबाग, शंकुलधारा, बेनियाबाग, डीपीएच आदि उपकेंद्रों को पूरी क्षमता से चलाना पड़ रहा है। भदैनी, सिगरा और विद्यापीठ पर तो जरूरत से ज्यादा भार होने के कारण लोड शेडिंग करनी पड़ती है। नगरीय विद्युत वितरण मंडल प्रथम के अधीक्षण अभियंता पीपी सिंह के मुताबिक उपकेंद्रों के लिए जगह की तलाश करना सबसे बड़ी समस्या है।