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मुसीबत में शहर, खौफ हर पहर
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sun, 21 Aug 2016 02:08 AM IST
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बाढ़
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चार दिनों के भीतर अस्सी से लगे दक्षिणी इलाकों में सैकड़ांे परिवारों को बेघर कर चुकी बाढ़ ने शनिवार से शहर की बीच अपना कोप दिखाना शुरू कर दिया। देर रात प्राचीन दशाश्वमेध के शीतला घाट की सड़क से होकर गंगा कालीमाता मंदिर होते हुए काशी के हृदयस्थल खालिसपुरा गली में प्रवेश कर गई। पर्यटकों के पसंद की मशहूर गली में बाढ़ आने से हड़कंप मच गया। उधर, गंगा, वरुणा और असि किनारे की कॉलोनियों, बस्तियों के करीब पांच हजार से अधिक घर बाढ़ से घिर चुके हैं। करीब 10 हजार से अधिक लोगों पर इस बाढ़ से आफत आ गई है।
अस्सी, नगवा, सामने घाट की सघन कॉलोनियों में रहने वाले बिहार के अधिकतर लोग अपने गावों की ओर रवाना हो रहे हैं , लेकिन इन क्षेत्रों में बने आलीशान भवनों को छोड़ना भी लोगों को गंवारा नहीं हो रहा है। पानी से घिरने के बावजूद लोग घर छोड़ने की बजाए रोजमर्रा के समान जुटा रहे हैं, ताकि इस आपदा की घड़ी को किसी तरह काटा जा सके।
लोगों को डर है कि कहीं नावों से चोर आकर उनके सूने घरों को खंगाल न ले जाएं। तारा नगर कालोनी के रहने वाले डा. राधेश्याम विश्वकर्मा, इं. आरके सिंह, प्रदीप कुमार चंदेल, राजकुमार तिवारी ने अपने घर के सदस्यों को सुरक्षित अपने अपने गांव पहुंचवा दिया है। दूसरी ओर गायत्री नगर में भी पानी लगने से लोग घरो में ताला बंद कर निकलना शुरू कर दिए हैं। सामने घाट स्थित मृत्युंजय महादेव मंदिर तक पानी पहुंच चुका है। अघोर आश्रम के दरवाजे तक पानी का फैलाव शुरू हो गया है। रोहितनगर में भी नाले का भरने लगा है। इसके साथ ही कालोनियो के लिंक रास्ते बजबजाते सीवर के पानी से भरने लगे हैं। सामने घाट, मदरवा इलाके में जिन घरों में पशु पालन किया गया है, उन्हें सुरक्षित रख पाना टेढ़ी खीर बन गया है।
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केंद्रीय जल आयोग के अनुसार वाराणसी में गंगा के जलस्तर में एक सेंटीमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से इजाफा हो रहा है। पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश की चंबल, केन और बेतवा से अतिरिक्त पानी किसी भी समय छोड़ा जा सकता है। ऐसा हुआ तो फिर काशी में 1978 की बाढ़ का रिकॉर्ड टूट सकता है। बताते हैं कि तब काशी में गोदौलिया, गुरुबाग, नई सड़क तक नावें चलानी पड़ी थीं। फिलहाल गंगा तटीय कॉलोनियों की गलियों में आ गई है। लगातार जलस्तर बढ़ने से नए गली-मुहल्ले बाढ़ की चपेट में आते जा रहे हैं। शनिवार को गंगोत्री बिहार, नगवा, सत्यमनगर, गायत्रीनगर, मारुतिनगर में फंसे लोगों को स्थानीय नागरिकों और एनडीआरएफ की टीम ने नावों की मदद से बाहर निकाल कर राहत शिविरों में पहुंचाया।
वरुणा के तटीय इलाकों में बाढ़ का पानी भरने से बुनकरों के रोजी-रोटी पर संकट गहरा गया है। करघों में पानी घुसने से कामकाज पूरी तरह ठप है। इससे चौकाघाट से सरैंया, नक्खीघाट तक लगभग दो सौ बुनकर परिवार प्रभावित हैं। रोजाना हजारों रुपये का नुकसान हो रहा है। शुक्रवार-शनिवार की रात पानी की रफ्तार धीमी होने पर लगा कि अब बाढ़ से राहत मिल जाएगी लेकिन शनिवार सुबह से गंगा-वरुणा में फिर बढ़ाव शुरू होने से बुनकर परिवारों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरा गई हैं।
कैंटोमेंट से सरायमोहाना के बीच वरुणा के तटीय इलाकों में बाढ़ से जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया है। नक्खीघाट से सरैया तक सैकड़ों बुनकर परिवार रहते हैं। बाढ़ का पानी घरों और करघों में घुस गया है। इससे बुनकर परिवारों की दोहरी मार झेलनी पड़ी है। बुनकरों का कहना है कि अब करघों पर कई दिनों तक काम नहीं हो पाएगा। बाढ़ हटने के बाद उन्हें नए सिरे से दुरुस्त करना होगा। हाजी ओकास अंसारी ने बताया कि अकेले सरैया इलाके में 100 से ज्यादा बुनकरों के कारखाने बाढ़ में डूब गए हैं। प्रभावित बुनकर परिवार या तो शिविर में या फिर रिश्तेदारों के यहां गुजारा कर रहे हैं। बाढ़ राहत शिविरों में रोजाना शरणार्थियों की तादाद बढ़ रही है। ढेलवरिया, बड़ा मंदिर, मीराघाट और सरैया स्थित शिविर में सैकड़ों बुनकर परिवार शरण लिए हुए हैं।
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अस्सी, नगवा, सामने घाट की सघन कॉलोनियों में रहने वाले बिहार के अधिकतर लोग अपने गावों की ओर रवाना हो रहे हैं , लेकिन इन क्षेत्रों में बने आलीशान भवनों को छोड़ना भी लोगों को गंवारा नहीं हो रहा है। पानी से घिरने के बावजूद लोग घर छोड़ने की बजाए रोजमर्रा के समान जुटा रहे हैं, ताकि इस आपदा की घड़ी को किसी तरह काटा जा सके।
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लोगों को डर है कि कहीं नावों से चोर आकर उनके सूने घरों को खंगाल न ले जाएं। तारा नगर कालोनी के रहने वाले डा. राधेश्याम विश्वकर्मा, इं. आरके सिंह, प्रदीप कुमार चंदेल, राजकुमार तिवारी ने अपने घर के सदस्यों को सुरक्षित अपने अपने गांव पहुंचवा दिया है। दूसरी ओर गायत्री नगर में भी पानी लगने से लोग घरो में ताला बंद कर निकलना शुरू कर दिए हैं। सामने घाट स्थित मृत्युंजय महादेव मंदिर तक पानी पहुंच चुका है। अघोर आश्रम के दरवाजे तक पानी का फैलाव शुरू हो गया है। रोहितनगर में भी नाले का भरने लगा है। इसके साथ ही कालोनियो के लिंक रास्ते बजबजाते सीवर के पानी से भरने लगे हैं। सामने घाट, मदरवा इलाके में जिन घरों में पशु पालन किया गया है, उन्हें सुरक्षित रख पाना टेढ़ी खीर बन गया है।
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केंद्रीय जल आयोग के अनुसार वाराणसी में गंगा के जलस्तर में एक सेंटीमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से इजाफा हो रहा है। पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश की चंबल, केन और बेतवा से अतिरिक्त पानी किसी भी समय छोड़ा जा सकता है। ऐसा हुआ तो फिर काशी में 1978 की बाढ़ का रिकॉर्ड टूट सकता है। बताते हैं कि तब काशी में गोदौलिया, गुरुबाग, नई सड़क तक नावें चलानी पड़ी थीं। फिलहाल गंगा तटीय कॉलोनियों की गलियों में आ गई है। लगातार जलस्तर बढ़ने से नए गली-मुहल्ले बाढ़ की चपेट में आते जा रहे हैं। शनिवार को गंगोत्री बिहार, नगवा, सत्यमनगर, गायत्रीनगर, मारुतिनगर में फंसे लोगों को स्थानीय नागरिकों और एनडीआरएफ की टीम ने नावों की मदद से बाहर निकाल कर राहत शिविरों में पहुंचाया।
वरुणा के तटीय इलाकों में बाढ़ का पानी भरने से बुनकरों के रोजी-रोटी पर संकट गहरा गया है। करघों में पानी घुसने से कामकाज पूरी तरह ठप है। इससे चौकाघाट से सरैंया, नक्खीघाट तक लगभग दो सौ बुनकर परिवार प्रभावित हैं। रोजाना हजारों रुपये का नुकसान हो रहा है। शुक्रवार-शनिवार की रात पानी की रफ्तार धीमी होने पर लगा कि अब बाढ़ से राहत मिल जाएगी लेकिन शनिवार सुबह से गंगा-वरुणा में फिर बढ़ाव शुरू होने से बुनकर परिवारों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरा गई हैं।
कैंटोमेंट से सरायमोहाना के बीच वरुणा के तटीय इलाकों में बाढ़ से जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया है। नक्खीघाट से सरैया तक सैकड़ों बुनकर परिवार रहते हैं। बाढ़ का पानी घरों और करघों में घुस गया है। इससे बुनकर परिवारों की दोहरी मार झेलनी पड़ी है। बुनकरों का कहना है कि अब करघों पर कई दिनों तक काम नहीं हो पाएगा। बाढ़ हटने के बाद उन्हें नए सिरे से दुरुस्त करना होगा। हाजी ओकास अंसारी ने बताया कि अकेले सरैया इलाके में 100 से ज्यादा बुनकरों के कारखाने बाढ़ में डूब गए हैं। प्रभावित बुनकर परिवार या तो शिविर में या फिर रिश्तेदारों के यहां गुजारा कर रहे हैं। बाढ़ राहत शिविरों में रोजाना शरणार्थियों की तादाद बढ़ रही है। ढेलवरिया, बड़ा मंदिर, मीराघाट और सरैया स्थित शिविर में सैकड़ों बुनकर परिवार शरण लिए हुए हैं।