{"_id":"59fc404b4f1c1bf2538ba720","slug":"chandra-prabha-wildlife-sanctuary-waiting-for-his-king","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"यूपी के चंद्रप्रभा अभयारण्य को 47 साल से है अपने 'राजा' का इंतजार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूपी के चंद्रप्रभा अभयारण्य को 47 साल से है अपने 'राजा' का इंतजार
amarujala.com- Written by: अनुपम निशान्त
Updated Fri, 03 Nov 2017 03:39 PM IST
विज्ञापन
1958 से 1969 तक 11 हो गई थी शेरों की संख्या
- फोटो : self
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
काशी वन्य जीव प्रभाग के अंतर्गत आने वाली चंदौली जिले में स्थित चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य को पिछले 47 साल से अपने राजा का इंतजार है। देश की हथेली पर भाग्य रेखा की तरह खड़े विशाल विंध्य पर्वत श्रेणी की गोद में हरीतिमा बिखेरते 78 वर्ग किलोमीटर के इस जंगल में पशु-पक्षियों की 650 से अधिक प्रजातियों का वास है।
नदियां, झरने और जल प्रपात भी हैं। यह अभयारण्य राष्ट्रीय वन्यजीव एक्शन प्लान (2002-2016) के अंतर्गत देश के 668 संरक्षित वन क्षेत्रों में से एक है।
1957 में केंद्र सरकार ने यहां वन्यजीवों के संरक्षण के प्रयास शुरू किए।
1958 में यहां पहली बार तीन एशियाई शेर दिखे। धीरे-धीरे इनका कुनबा बढ़ने लगा और 1969 तक अभयारण्य में 11 शेर हो गए। इसके बाद जंगल में इंसानी दखलंदाजी बढ़ गई। बेलगाम शिकार का नतीजा रहा कि 70’ के दशक के बाद इस जंगल में शेर नहीं दिखे।
जिम्मेदार अफसर शेरों के गायब होने पर तत्काल चिंतित हुए बग़ैर 22 साल तक इंतज़ार करते रहे कि शेर खुद-ब-खुद आ जाएं। पर शेर कैसे आते...! आखिरकार 1993 में यहां फिर से शेरों को बसाने की योजना का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया लेकिन प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं मिली।
विज्ञापन
काशी वन्य जीव प्रभाग रामनगर के प्रभागीय वनाधिकारी गोपाल ओझा का कहना है कि प्रस्ताव पर बात आगे नहीं बढ़ पाई थी। बीएचयू के पर्यावरणविद डॉ. बीडी त्रिपाठी की मानें तो इस संरक्षित वन क्षेत्र की जैव विविधता एशियाई शेरों की बसावट और उनके संवर्धन के लिए सर्वाधिक अनुकूल है।
यहां फिर शेरों को बसाया जा सकता है। इससे यहां पर्यटक तो आएंगे ही, रोजगार के नए अवसर भी उपलब्ध होंगे।
विज्ञापन
नदियां, झरने और जल प्रपात भी हैं। यह अभयारण्य राष्ट्रीय वन्यजीव एक्शन प्लान (2002-2016) के अंतर्गत देश के 668 संरक्षित वन क्षेत्रों में से एक है।
1957 में केंद्र सरकार ने यहां वन्यजीवों के संरक्षण के प्रयास शुरू किए।
1958 में यहां पहली बार तीन एशियाई शेर दिखे। धीरे-धीरे इनका कुनबा बढ़ने लगा और 1969 तक अभयारण्य में 11 शेर हो गए। इसके बाद जंगल में इंसानी दखलंदाजी बढ़ गई। बेलगाम शिकार का नतीजा रहा कि 70’ के दशक के बाद इस जंगल में शेर नहीं दिखे।
विज्ञापन
जिम्मेदार अफसर शेरों के गायब होने पर तत्काल चिंतित हुए बग़ैर 22 साल तक इंतज़ार करते रहे कि शेर खुद-ब-खुद आ जाएं। पर शेर कैसे आते...! आखिरकार 1993 में यहां फिर से शेरों को बसाने की योजना का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया लेकिन प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं मिली।
विज्ञापन
काशी वन्य जीव प्रभाग रामनगर के प्रभागीय वनाधिकारी गोपाल ओझा का कहना है कि प्रस्ताव पर बात आगे नहीं बढ़ पाई थी। बीएचयू के पर्यावरणविद डॉ. बीडी त्रिपाठी की मानें तो इस संरक्षित वन क्षेत्र की जैव विविधता एशियाई शेरों की बसावट और उनके संवर्धन के लिए सर्वाधिक अनुकूल है।
यहां फिर शेरों को बसाया जा सकता है। इससे यहां पर्यटक तो आएंगे ही, रोजगार के नए अवसर भी उपलब्ध होंगे।
यहां अक्सर पकड़े जाते रहे हैं शिकारी
चंद्रप्रभा अभयारण्य में नदियां, झरने और जल प्रपात भी हैं
- फोटो : demo
जिम्मेदारों की बेपरवाही के चलते अभयारण्य शिकारियों की ऐशगाह बनता जा रहा है। जून, 2011 में यहां से छह शिकारी 40 किलो वजन के हिरण के क्षत-विक्षत शव और राइफल के साथ रामनगर टेंगरा मोड़ के समीप पकड़े गए थे। 2001 में भी शिकारियों को बाघ की खाल के साथ पकड़ा गया था।
दूर होंगी सारी बाधायें
चंदौली के जिलाधिकारी हेमंत कुमार ने कहा कि 1993 के प्रस्ताव के बारे में डीएफओ से जानकारी लेकर देखेंगे कि इसे कैसे दोबारा भेजा जा सकता है। अगर वातावरण को अनुकूल बनाने में कोई तकनीकी या प्रशासनिक दिक्कत होगी तो इसकी बाधाएं दूर करा ली जाएंगी।
सुशील अवस्थी(मुख्य वन संरक्षक, कानपुर) ने कहा कि अभयारण्य में शेर छोड़ने का प्रस्ताव तकनीकी कारणों से लागू नहीं हुआ। इस समय शेर छोड़ने का वातावरण नहीं है। शासन किसी वन्य जीव संस्थान से सर्वे कराए। रिपोर्ट अनुकूल होने पर प्रस्ताव बनाकर फिर भेजा जाएगा।
चंद्रप्रभा में पाए जाने वाले वन्य जीव
बाघ (अब विलुप्तप्राय), चीता, तेंदुआ, कृष्ण मृग (काला हिरण), चीतल, सांभर, जंगली शूकर, नील गाय, भेड़िया, सियार, खरगोश, बंदर, लंगूर, घड़ियाल, अजगर आदि।
दूर होंगी सारी बाधायें
चंदौली के जिलाधिकारी हेमंत कुमार ने कहा कि 1993 के प्रस्ताव के बारे में डीएफओ से जानकारी लेकर देखेंगे कि इसे कैसे दोबारा भेजा जा सकता है। अगर वातावरण को अनुकूल बनाने में कोई तकनीकी या प्रशासनिक दिक्कत होगी तो इसकी बाधाएं दूर करा ली जाएंगी।
सुशील अवस्थी(मुख्य वन संरक्षक, कानपुर) ने कहा कि अभयारण्य में शेर छोड़ने का प्रस्ताव तकनीकी कारणों से लागू नहीं हुआ। इस समय शेर छोड़ने का वातावरण नहीं है। शासन किसी वन्य जीव संस्थान से सर्वे कराए। रिपोर्ट अनुकूल होने पर प्रस्ताव बनाकर फिर भेजा जाएगा।
चंद्रप्रभा में पाए जाने वाले वन्य जीव
बाघ (अब विलुप्तप्राय), चीता, तेंदुआ, कृष्ण मृग (काला हिरण), चीतल, सांभर, जंगली शूकर, नील गाय, भेड़िया, सियार, खरगोश, बंदर, लंगूर, घड़ियाल, अजगर आदि।