ये बनारस की रामलीला: एक तरफ रामचरितमानस की चौपाई तो दूसरी तरफ अजान
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गंगा जमुनी तहजीब का शहर बनारस। गलियों का शहर बनारस। कला और संस्कृति का शहर बनारस। धर्म और अध्यात्म की नगरी की हर बात निराली है। रामलीलाओं की बात करें तो इसमें श्री आदि रामलीला लाटभैरव का रंग सबसे अनोखा है। अजान के बीच गूंजती रामचरित मानस की चौपाइयां असली हिंदुस्तान का दर्शन कराती हैं।
कोरोना संक्रमण के कारण इस साल श्रद्धालुओं का यह नजारा नसीब नहीं होगा। काशी में होने वाली प्रमुख लीलाओं में 476 सालों से श्री आदि रामलीला लाटभैरव सबसे प्राचीन रामलीला का दस्तावेज समेटे हुए है। लीला में हिंदू और मुसलमान बंधुओं का परस्पर सहयोग हिंदुस्तान की एकता का सबूत देता है।
अन्य लीलाओं की तरह न केवल वेषभूषा, मुकुट आदि के निर्माण में उनका सक्रिय सहयोग रहता है बल्कि वे दर्शक के रूप में भी लीला में शामिल होते हैं व प्रसाद ग्रहण करते हैं। लीला का मंचन और नमाज अदा करने का काम भी एक ही स्थान पर होता है।
रामलीला के प्रधानमंत्री कन्हैया लाल यादव ने बताया कि संभव है कि इस लीला का प्रारंभ गोस्वामी तुलसीदास ने किया हो क्योंकि आदमपुर के हनुमान फाटक पर उनके रहने के प्रमाण मिलते हैं। उन्होंने इसी स्थान पर हनुमान विग्रह की स्थापना की थी जो वर्तमान में बाल हनुमान के नाम से जाने जाते हैं। मेघा भगत का नाम भी 1543 में लाटभैरव की रामलीला से जोड़ा जाता है।
माना जाता है कि चित्रकूट की रामलीला और लाटभैरव की रामलीला कभी एक ही रामलीला रही हो जो बाद में अलग-अलग हो गई। आदि रामलीला नाम से लगता है कि आरंभ में रामलीला का मंचन वाल्मीकि रामायण के आधार पर होती रही हो।
तिथियों का रखा जाता है खास ध्यान
35 सालों से लाटभैरव की रामलीला से जुड़े प्रधानमंत्री कन्हैयालाल यादव ने बताया कि रामलीला एक स्थान पर न होकर एक बड़े क्षेत्र के अंतर्गत अलग-अलग स्थानों पर होती है जो विशेश्वरगंज से लेकर वरुणा तट तक फैला है। लीला में तिथियों का खास ध्यान रखा जाता है। लीला 20 से 22 दिनों तक चलती है।
रावण का मुखौटा आकर्षण का केंद्र
प्रधानमंत्री ने बताया कि लाटभैरव की रामलीला में आज भी परंपराएं निभाई जाती हैं। दस मुखवाला मुखौटा और कागज की लुगदी से निर्मित उनकी 20 भुजाएं विशिष्ट प्रकार की होती हैं। नक्कटैया में इस्तेमाल होने वाले विमान, मुखौटे दर्शकों को खासा आकर्षित करते हैं। रामलीला के पात्र 10 से 12 साल के बच्चे ही होते हैं। स्त्री पात्र की भूमिका भी पुरुष ही निभाते हैं। स्वरूपों के श्रंगार में श्रंगारिया का महत्वपूर्ण स्थान होता है।
14 दिन में पूरा होती है 14 वर्षों के वनवास की लीला
लाटभैरव की रामलीला में परंपरागत श्रद्धालुओं द्वारा स्वरूपों को भोग लगाने की परंपरा है। लीला का आरंभ रामगंज में मुकुट पूजन एवं स्वरूप पूजन से होता है। राम के14 वर्षों के वनगमन को 14 दिनों की लीला में पूरा किया जाता है। लाटभैरव रामलीला से जुड़े निखिल त्रिपाठी रुद्र ने बताया कि तुलसी के दौर की गवाह लाटभैरव की रामलीला में आज भी प्राचीनता का अहसास होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम की लीला के मंचन के 14 दिन बेहद खास होते हैं।