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परंपरावादी कला के लिए यह समय कठिन0
Updated Sat, 17 Mar 2018 02:32 AM IST
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वाराणसी।
श्री अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज के बुलानाला परिसर में शास्त्रीय संगीत एवं वर्तमान परिवेश पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई। संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. मुकेश गर्ग ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समाज बहुत जटिल समाज है। शास्त्रीय संगीत जैसी परंपरावादी कला के लिए यह समय कठिन है। लोकतंत्र में आज बहुत बड़ी तादात में स्त्रियां शास्त्रीय संगीत से जुड़ रही हैं। उन्होंने कहा कि संगीत साधना करने में उनको बहुत सी समस्याएं आती हैं जिसपर विचार की जरूरत है।
शास्त्रीय संगीतज्ञ डॉ. राजेश्वर आचार्य ने कहा कि संगीत के क्षेत्र में आत्म विज्ञापन के स्थान पर आत्माभिव्यक्ति को प्रमुखता देना सही लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होगा। शिक्षा और शिक्षक को महत्व देकर ही अगली पीढ़ी को चेतना नायक बनाया जा सकता है। कहा कि प्रथम वादन है अभिवादन। कार्यक्रम में स्वागत प्राचार्या डॉ. कुमकुम मालवीय तथा प्रबंधक अनिल कुमार जैन, विषय स्थापना डॉ. अंजलि शर्मा, विषय प्रवर्तन डॉ. मुकेश गर्ग और संचालन डॉ. आभा सक्सेना ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. नीता दिशावाल ने किया। द्वितीय सत्र में कलकत्ता से आए शैव्या सांची सरखेल ने अपनी सितार वादन से सभी को सितार वादन की बारीकियां बताईं। डॉ. ऋत्विक सान्याल ने कहा कि गुरु शिष्य परंपरा आज भी बरकरार है और विदेशी भी उनका अनुकरण कर रहे हैं। डॉ. सीमा वर्मा ने शोध पत्र के माध्यम से बताया कि शास्त्रीय संगीत के हर महाविद्यालय के संगीत विभाग को मानक बनना होगा। इस अवसर पर डॉ. अपर्णा शुक्ला, डॉ. शिवानी शुक्ला, डॉ. शुभ्रा वर्मा, चेतना गुजराती, नंदिनी केशरी, डॉ. नीलिमा शाह, डॉ. अर्चना सिंह, डॉ. अनीता सिंह, डॉ.आकाश, डॉ. सुनील मिश्रा, पवन सिंह सहित अन्य प्रदेशों से आए छात्र छात्राएं उपस्थित रहीं।
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श्री अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज के बुलानाला परिसर में शास्त्रीय संगीत एवं वर्तमान परिवेश पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई। संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. मुकेश गर्ग ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समाज बहुत जटिल समाज है। शास्त्रीय संगीत जैसी परंपरावादी कला के लिए यह समय कठिन है। लोकतंत्र में आज बहुत बड़ी तादात में स्त्रियां शास्त्रीय संगीत से जुड़ रही हैं। उन्होंने कहा कि संगीत साधना करने में उनको बहुत सी समस्याएं आती हैं जिसपर विचार की जरूरत है।
शास्त्रीय संगीतज्ञ डॉ. राजेश्वर आचार्य ने कहा कि संगीत के क्षेत्र में आत्म विज्ञापन के स्थान पर आत्माभिव्यक्ति को प्रमुखता देना सही लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होगा। शिक्षा और शिक्षक को महत्व देकर ही अगली पीढ़ी को चेतना नायक बनाया जा सकता है। कहा कि प्रथम वादन है अभिवादन। कार्यक्रम में स्वागत प्राचार्या डॉ. कुमकुम मालवीय तथा प्रबंधक अनिल कुमार जैन, विषय स्थापना डॉ. अंजलि शर्मा, विषय प्रवर्तन डॉ. मुकेश गर्ग और संचालन डॉ. आभा सक्सेना ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. नीता दिशावाल ने किया। द्वितीय सत्र में कलकत्ता से आए शैव्या सांची सरखेल ने अपनी सितार वादन से सभी को सितार वादन की बारीकियां बताईं। डॉ. ऋत्विक सान्याल ने कहा कि गुरु शिष्य परंपरा आज भी बरकरार है और विदेशी भी उनका अनुकरण कर रहे हैं। डॉ. सीमा वर्मा ने शोध पत्र के माध्यम से बताया कि शास्त्रीय संगीत के हर महाविद्यालय के संगीत विभाग को मानक बनना होगा। इस अवसर पर डॉ. अपर्णा शुक्ला, डॉ. शिवानी शुक्ला, डॉ. शुभ्रा वर्मा, चेतना गुजराती, नंदिनी केशरी, डॉ. नीलिमा शाह, डॉ. अर्चना सिंह, डॉ. अनीता सिंह, डॉ.आकाश, डॉ. सुनील मिश्रा, पवन सिंह सहित अन्य प्रदेशों से आए छात्र छात्राएं उपस्थित रहीं।
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