टीईटी: दो साल बाद मिली कामयाबी

अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Thu, 21 Nov 2013 11:03 AM IST
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उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापकों के 72,825 पदों पर नियुक्ति की राह देख रहे अभ्यर्थियों को पूरे दो साल बाद सपने पूरे होने की उम्मीद जगी है।
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शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लागू होने के बाद से ही प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने की जरूरत महसूस की जाने लगी थी।
केंद्र सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों की अर्हता तय करने का जिम्मा एनसीटीई को सौंपा। एनसीटीई ने 23 अगस्त 2010 को अधिसूचना जारी करते हुए अध्यापकों की नियुक्ति के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य कर दिया। प्रदेश सरकार ने 13 नवंबर 2011 को टीईटी आयोजित कर परिणाम 25 नवंबर को घोषित किया।
पढ़ें, टीईटी की मेरिट पर ही होंगी 72,825 भर्तियां

बड़ी संख्या में सहायक अध्यापकों के रिक्त पदों को भरे जाने के लिए एनसीटीई ने बीएड उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को भी टीईटी उत्तीर्ण करने और छह माह का प्रशिक्षण देने की शर्त पर भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने की छूट दे दी। इसके बाद टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की सहायक अध्यापक के 72825 पदों पर नियुक्ति करने के लिए विज्ञापन 30 नवंबर 2011 में जारी किया गया। 20 दिसंबर 2011 को इसे संशोधित करते हुए टीईटी मेरिट को नियुक्ति का आधार बनाया गया।

इस दौरान कानपुर के रमाबाई नगर की पुलिस ने एक वाहन को जब्त करते हुए टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की तीन लिस्ट और कई लाख रुपये बरामद किए गए थे। आरोप है कि यह रुपये लेकर कुछ लोगों को टीईटी में पास कराया गया। 260 ऐसे अभ्यर्थियों की सूची बरामद की गई जिनको रुपये लेकर परीक्षा में पास कराने का आरोप है। माध्यमिक शिक्षा निदेशक संजय मोहन को इस सिलसिले में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

यहां से शुरू हुई अदालती लड़ाई

चार जनवरी 2012- हाईकोर्ट ने 30 नवंबर 2011 के विज्ञापन की चयन प्रक्रिया पर रोक लगाई
10 अप्रैल 2012- प्रदेश सरकार ने टीईटी की धांधली पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हाईपावर कमेटी गठित की।
एक मई 2012- हाईपावर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि टीईटी को मात्र अर्हता माना जाए। धांधली में शामिल रहे अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया से बाहर करते हुए आपराधिक मामला चलाया जाए।
26 जुलाई 2012- कैबिनेट ने कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए टीईटी को मात्र अर्हता स्वीकार किया।
31 अगस्त 2012- सेवा नियमावली में 15 संशोधन करते हुए टीईटी को न्यूनतम अर्हता और चयन का आधार क्वालिटी प्वाइंट मार्क्स तय किया गया। कहा गया कि इससे 30 नवंबर 2011 का विज्ञापन स्वत: निष्प्रभावी हो गया। अभ्यर्थियों को आवेदन शुल्क वापस करने का वादा किया गया।
अगस्त 2012- अखिलेश त्रिपाठी व अन्य ने याचिकाएं दाखिल कर 15 वें संशोधन और 31 अगस्त के शासनादेश को चुनौती दी।
पांच दिसंबर 2012- याचिकाएं लंबित रहने के दौरान प्रदेश सरकार ने शासनादेश जारी कर टीईटी बीएड अभ्यर्थियों के चयन की प्रक्रिया प्रारंभ की।
16 जनवरी 2013- एकल न्यायपीठ ने याचिकाएं खारिज कर दी।
29 जनवरी 2013- एकल न्यायधीश के फैसले के खिलाफ विशेष अपील दाखिल की गई।

खंडपीठ के समक्ष थे छह प्रश्न

1- क्या बीएड डिग्री धारक अभ्यर्थियों को छह माह का प्रशिक्षण देने के बाद प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक नियुक्त करने में 1981 की सेवा नियमावली लागू होगी।
2- क्या 30 नवंबर 2011 के विज्ञापन में जारी 72825 प्रशिक्षु अध्यापकों की नियुक्ति इस आधार पर अवैध है कि 1981 की नियमावली में प्रशिक्षु अध्यापकों का कोई कैडर नहीं है।
3- क्या एनसीटीई द्वारा 11 फरवरी 2012 को जारी दिशानिर्देश कि टीईटी प्राप्तांक को अध्यापकों की नियुक्ति में आधार बनाना राज्य सरकार पर बाध्यकारी नहीं है और सरकार चयन तथा नियुक्ति के दौरान इसे नजरअंदाज कर सकती है।
4- क्या प्रदेश सरकार का 26 जुलाई 2012 का शासनादेश और क्वालिटी प्वाइंट मार्क्स को चयन का आधार बनाया,जैसा कि 12 वें संशोधन से पूर्व था विधि सम्मत है।
5- क्या सरकार के पास 30 नवंबर 2011 के विज्ञापन को निष्प्रभावी और निरस्त घोषित करने का वैध आधार है।
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