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Sultanpur News: गोमती में बना सिल्ट का टापू, दो हिस्सों में बंटी धारा
Sun, 02 Jul 2023 11:46 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
Updated Sun, 02 Jul 2023 11:46 PM IST
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धनपतगंज (सुल्तानपुर)। गोमती में कुड़वार पुल के पास बने विशालकाय टापू से नदी की धारा दो हिस्सों में बंट गई है। इससे आसपास के दर्जनों गांवों में कटान का खतरा बढ़ गया है। किनारे बसे गांवों के लोग भी इस आशंका से सहमे हुए हैं। हालांकि बीच बरसात में अब इस टापू को समाप्त करना भी संभव नजर नहीं आ रहा है।
जिले की लाइफलाइन कही जाने वाली गोमती नदी में जमाव ले रहा गाद टापू में बदल रगा है जिससे नदी की धारा बदलने लगी है। नदी के जल का स्वाभाविक प्रवाह रुकता जा रहा है। कुड़वार नदी पुल के दोनों तरफ गाद का दायरा तकरीबन एक किलोमीटर में टापू का शक्ल ले चुका है। इससे नदी दो समानांतर धाराओं में बंट गई है।
लंबी दूरी में नदी का रूप सपाट सा दिखने लगा है। गाद से उथली होती नदी के कटान से तटवर्ती गांव गोविंदपुर, खादर बसंतपुर गांव, नौगंवातीर भंडरा, जज्जौर, मुडुआ, अगई, कोलिया व बगियवा आदि के बाशिंदों की चिंता बढ़ गई है।
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खादर बसंतपुर निवासी बम बहादुर सिंह व उमेश का कहना है कि पांच वर्षों से नदी में जल भंडारण की क्षमता काफी कम हुई है। भारी बरसात के बाद नदी का पानी गांव की तरफ रुख कर लेता है जिससे फसलों के साथ रिहायशी इलाके में घर व पेड़ों को काफी क्षति पहुंचती है।
भंडरा के नयन बहादुर और सतई कहते हैं कि बरसात आते ही बाढ़ का पानी गांव में पहुंच जाता है। नौगंवा के रणविजय सिंह कहते हैं कि नदी में गाद के चलते पानी का बहाव काफी धीमा रहता है। इसके कारण नदी के दोनों किनारों पर कटान होता है। फसलों का नुकसान काफी होता है।
अमउ निवासी उमाकांत शुकुल कहते हैं कि नदी का पानी प्रत्येक वर्ष बरसात में ओवरफ्लो होकर बगियवा, कोलिया गांव को प्रभावित करता है। कटान तेज हो जाता है, प्रतिवर्ष कृषि योग्य कई बीघे जमीन नदी में समा जाती है।
1952 में इसी हालात में छह किमी. दूर चली गई थी नदी
बुजुर्ग बताते हैं कि गोमती में इसी तरह की परिस्थितियां सन 1952 में बनी थीं। गाद के चलते पुरानी गोमती जो केवटली से ढबिया, माधवपुर वाया मडहा, खाझापुर, चंदौर, तीरगांव होते हुए बहती थी, उसने 1952 में अपना तकरीबन नया रास्ता और नई धारा बनाकर सात किलोमीटर दूर से बहना शुरू कर दिया था। यही नदी अब बरासिन, खादर व बसंतपुर होकर बहती है। लोगों को चिंता है कि उथली होती नदी कहीं सन 1952 की अपनी कहानी न दोहरा दे।
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जिले की लाइफलाइन कही जाने वाली गोमती नदी में जमाव ले रहा गाद टापू में बदल रगा है जिससे नदी की धारा बदलने लगी है। नदी के जल का स्वाभाविक प्रवाह रुकता जा रहा है। कुड़वार नदी पुल के दोनों तरफ गाद का दायरा तकरीबन एक किलोमीटर में टापू का शक्ल ले चुका है। इससे नदी दो समानांतर धाराओं में बंट गई है।
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लंबी दूरी में नदी का रूप सपाट सा दिखने लगा है। गाद से उथली होती नदी के कटान से तटवर्ती गांव गोविंदपुर, खादर बसंतपुर गांव, नौगंवातीर भंडरा, जज्जौर, मुडुआ, अगई, कोलिया व बगियवा आदि के बाशिंदों की चिंता बढ़ गई है।
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खादर बसंतपुर निवासी बम बहादुर सिंह व उमेश का कहना है कि पांच वर्षों से नदी में जल भंडारण की क्षमता काफी कम हुई है। भारी बरसात के बाद नदी का पानी गांव की तरफ रुख कर लेता है जिससे फसलों के साथ रिहायशी इलाके में घर व पेड़ों को काफी क्षति पहुंचती है।
भंडरा के नयन बहादुर और सतई कहते हैं कि बरसात आते ही बाढ़ का पानी गांव में पहुंच जाता है। नौगंवा के रणविजय सिंह कहते हैं कि नदी में गाद के चलते पानी का बहाव काफी धीमा रहता है। इसके कारण नदी के दोनों किनारों पर कटान होता है। फसलों का नुकसान काफी होता है।
अमउ निवासी उमाकांत शुकुल कहते हैं कि नदी का पानी प्रत्येक वर्ष बरसात में ओवरफ्लो होकर बगियवा, कोलिया गांव को प्रभावित करता है। कटान तेज हो जाता है, प्रतिवर्ष कृषि योग्य कई बीघे जमीन नदी में समा जाती है।
1952 में इसी हालात में छह किमी. दूर चली गई थी नदी
बुजुर्ग बताते हैं कि गोमती में इसी तरह की परिस्थितियां सन 1952 में बनी थीं। गाद के चलते पुरानी गोमती जो केवटली से ढबिया, माधवपुर वाया मडहा, खाझापुर, चंदौर, तीरगांव होते हुए बहती थी, उसने 1952 में अपना तकरीबन नया रास्ता और नई धारा बनाकर सात किलोमीटर दूर से बहना शुरू कर दिया था। यही नदी अब बरासिन, खादर व बसंतपुर होकर बहती है। लोगों को चिंता है कि उथली होती नदी कहीं सन 1952 की अपनी कहानी न दोहरा दे।