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ठंड कम हुई, लेकिन बढ़ने लगी चुनावी तपिश
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ठंड कम हुई, लेकिन बढ़ने लगी चुनावी तपिश
डुमरियागंज। जनपद की राजनीति की धुरी माने जाने वाले डुमरियागंज विधानसभा क्षेत्र में अब चुनावी तपिश महसूस होने लगी है। कुछ दिनों तक बारिश, फिर कोहरा पड़ने, गलन के बाद धूप निकलने से ठंड का असर कुछ कम हुआ तो चुनावी तपिश बढ़ने लगी है। अब तक चुप बैठकर आंकलन में जुटे मतदाता धीरे-धीरे मुखर होने लगे हैं। उम्मीदवार की शख्सियत, क्षेत्र की तरक्की के साथ गुंडागर्दी कम होने, छुट्टा पशुओं से समस्या जैसे मुद्दे, इस चुनाव में कहीं-कहीं भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं।
चार लाख आठ हजार 327 मतदाताओं वाले इस विधानसभा क्षेत्र में अब चुनावी रंग चरम पर है। मतदाताओं में जाग रहे उत्साह से अब चुनावी समीकरणों पर चर्चाएं होने लगी हैं और उम्मीदवार भी चुनावी चुनौतियों से निपटने की तरकीब लगाए हैं। धुरंधरों के बीच तैयार हुए मुकाबले के आधार के अनुरूप मतदाताओं को अपने पाले में खींचा जा रहा है। प्रत्याशी, तरह-तरह के शिगूफा के साथ, शब्द बाणों के जरिए प्रतिद्वंद्वी पर हमलावर हैं।
अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावी मुद्दों के अनुरूप पार्टी प्रत्याशी को तौलकर टेंपो हाई हो रहे हैं। इन सबके बावजूद, यह कह पाना मुश्किल है कि मतदाता किस पार्टी को ज्यादा अहमियत दे रहा है। लहर नाम की चीज स्थानीय मुद्दों में उलझी हुई है। जातीय समीकरण साधकर चुनावी वैतरणी पार होने की जुगत में भी प्रत्याशी लगे हैं। मगर किसी भी स्तर पर इनको निर्णायक मानना अभी जल्दबाजी लग रही है। इन सबके बीच दूसरा पक्ष यह है कि इस बार बड़ी तादाद में मतदाता, उम्मीदवार की शख्सियत को तवज्जो दे रहे हैं।
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युवा मतदाताओं का बड़ा तबका क्षेत्र के विकास के मुद्दे पर बात करता दिखाई दे रहा है। प्रमुख राजनीतिक दलों के वोट बैंक माने जाने वाले लोग विभिन्न मुद्दों पर बंटे नजर आ रहे हैं। गली मोहल्लों के अलावा देहात क्षेत्रों में होने वाली चुनावी चर्चाओं से साफ जाहिर हो रहा है कि इस बार, मतदाता जातीय ढर्रे पर वोट देने की आदत से बाहर निकल रहा है।
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डुमरियागंज। जनपद की राजनीति की धुरी माने जाने वाले डुमरियागंज विधानसभा क्षेत्र में अब चुनावी तपिश महसूस होने लगी है। कुछ दिनों तक बारिश, फिर कोहरा पड़ने, गलन के बाद धूप निकलने से ठंड का असर कुछ कम हुआ तो चुनावी तपिश बढ़ने लगी है। अब तक चुप बैठकर आंकलन में जुटे मतदाता धीरे-धीरे मुखर होने लगे हैं। उम्मीदवार की शख्सियत, क्षेत्र की तरक्की के साथ गुंडागर्दी कम होने, छुट्टा पशुओं से समस्या जैसे मुद्दे, इस चुनाव में कहीं-कहीं भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं।
चार लाख आठ हजार 327 मतदाताओं वाले इस विधानसभा क्षेत्र में अब चुनावी रंग चरम पर है। मतदाताओं में जाग रहे उत्साह से अब चुनावी समीकरणों पर चर्चाएं होने लगी हैं और उम्मीदवार भी चुनावी चुनौतियों से निपटने की तरकीब लगाए हैं। धुरंधरों के बीच तैयार हुए मुकाबले के आधार के अनुरूप मतदाताओं को अपने पाले में खींचा जा रहा है। प्रत्याशी, तरह-तरह के शिगूफा के साथ, शब्द बाणों के जरिए प्रतिद्वंद्वी पर हमलावर हैं।
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अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावी मुद्दों के अनुरूप पार्टी प्रत्याशी को तौलकर टेंपो हाई हो रहे हैं। इन सबके बावजूद, यह कह पाना मुश्किल है कि मतदाता किस पार्टी को ज्यादा अहमियत दे रहा है। लहर नाम की चीज स्थानीय मुद्दों में उलझी हुई है। जातीय समीकरण साधकर चुनावी वैतरणी पार होने की जुगत में भी प्रत्याशी लगे हैं। मगर किसी भी स्तर पर इनको निर्णायक मानना अभी जल्दबाजी लग रही है। इन सबके बीच दूसरा पक्ष यह है कि इस बार बड़ी तादाद में मतदाता, उम्मीदवार की शख्सियत को तवज्जो दे रहे हैं।
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युवा मतदाताओं का बड़ा तबका क्षेत्र के विकास के मुद्दे पर बात करता दिखाई दे रहा है। प्रमुख राजनीतिक दलों के वोट बैंक माने जाने वाले लोग विभिन्न मुद्दों पर बंटे नजर आ रहे हैं। गली मोहल्लों के अलावा देहात क्षेत्रों में होने वाली चुनावी चर्चाओं से साफ जाहिर हो रहा है कि इस बार, मतदाता जातीय ढर्रे पर वोट देने की आदत से बाहर निकल रहा है।