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बस्ती में अल्ट्रासाउंड, गोरखपुर में सर्जरी
अमर उजाला ब्यूरो/ सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 05 Dec 2015 11:43 PM IST
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जिला अस्पताल सिर्फ नाम मात्र का है। इसकी हालत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से बेहतर नहीं है। सर्जरी करानी हो या फिर अल्ट्रासाउंड तो मरीजों को जिले से बाहर जाना पड़ेगा।
आम तौर यहां के मरीज बस्ती जाते हैं। सर्जन की सेवा के लिए उन्हें गोरखपुर की दौड़ लगानी पड़ रही है। कई महीनों से ऑपरेशन थिएटर में सन्नाटा पसरा हुआ। अल्ट्रासाउंड कक्ष का ताला नहीं खुल पा रहा है।
लेकिन जिम्मेदार बेपरवाह हैं। जिले का सबसे बड़ा अस्पताल होने के कारण बेहतर इलाज की अपेक्षाएं लाजिमी हैं। सरकार की सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज जिला अस्पताल में आते हैं, मगर यहां से निराश लौट रहे हैं।
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दरअसल, अस्पताल में किसी सर्जन की तैनाती नहीं है। दोनों पद रिक्त पड़े हुए हैं। करीब चार माह पहले सर्जन डा.विवेक मिश्रा का तबादला क्या हुआ, अस्पताल का ऑपरेशन थिएटर ही सूना हो गया। अब मरीज आते हैं तो उन्हें सीधे गोरखपुर रेफर कर दिया जाता है। सर्जन के अभाव में मामूली ऑपरेशन के लिए भी मरीजों को गोरखपुर तक की दौड़ लगानी पड़ रही है। कुछ ऐसा ही हाल अल्ट्रासाउंड का भी है।
लाखों रुपये की मशीनें अस्पताल में हैं, लेकिन ताले में बंद हैं। उसे चलाने वाला कोई नहीं है। ऐसे हाल में अल्ट्रासाउंड कराने वाले मरीजों को या तो निजी केन्द्रों की महंगी सेवाओं की शरण लेनी पड़ती है या फिर लंबी दूरी तय कर बस्ती जाना पड़ रहा है।
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आम तौर यहां के मरीज बस्ती जाते हैं। सर्जन की सेवा के लिए उन्हें गोरखपुर की दौड़ लगानी पड़ रही है। कई महीनों से ऑपरेशन थिएटर में सन्नाटा पसरा हुआ। अल्ट्रासाउंड कक्ष का ताला नहीं खुल पा रहा है।
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लेकिन जिम्मेदार बेपरवाह हैं। जिले का सबसे बड़ा अस्पताल होने के कारण बेहतर इलाज की अपेक्षाएं लाजिमी हैं। सरकार की सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज जिला अस्पताल में आते हैं, मगर यहां से निराश लौट रहे हैं।
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दरअसल, अस्पताल में किसी सर्जन की तैनाती नहीं है। दोनों पद रिक्त पड़े हुए हैं। करीब चार माह पहले सर्जन डा.विवेक मिश्रा का तबादला क्या हुआ, अस्पताल का ऑपरेशन थिएटर ही सूना हो गया। अब मरीज आते हैं तो उन्हें सीधे गोरखपुर रेफर कर दिया जाता है। सर्जन के अभाव में मामूली ऑपरेशन के लिए भी मरीजों को गोरखपुर तक की दौड़ लगानी पड़ रही है। कुछ ऐसा ही हाल अल्ट्रासाउंड का भी है।
लाखों रुपये की मशीनें अस्पताल में हैं, लेकिन ताले में बंद हैं। उसे चलाने वाला कोई नहीं है। ऐसे हाल में अल्ट्रासाउंड कराने वाले मरीजों को या तो निजी केन्द्रों की महंगी सेवाओं की शरण लेनी पड़ती है या फिर लंबी दूरी तय कर बस्ती जाना पड़ रहा है।