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जिंदगी संवारनी है तो जाने मकसदे कर्बला
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Tue, 18 Oct 2016 10:20 PM IST
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हल्लौर में मजलिस में खेताब करते ईरान से आए मौलाना रजा साहब।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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डुमरियागंज। हल्लौर स्थित दरगाह चौक पर नवेद रिजवी के संयोजन में आयोजित तीन रोजा मजलिस का इंतजाम किया गया। इसमें ईरान से आए मौलाना रजा हैदर साहब किबला ने सोमवार की रात मकसदे कर्बला पर आधारित तीसरी मजलिस को खिताब किया। इस दौरान कई गांवों के अकीदतमंद मौजूद रहे।
मजलिस में मौलाना रजा हैदर साहब ने कहा कि अगर इंसान मकसदे कर्बला को समझ जाए तो वे अपनी जिंदगी को कामयाब बना सकता है, क्योंकि जिसने मकसदे कर्बला समझ लिया समझो उसने इस्लाम, कुरान, नमाज, रोजा, कर्बला समझ लिया। कर्बला में इमाम हुसैन अपने 71 साथियों की कुर्बानी देकर अजमते खुदा के साथ-साथ पूरे आलमे इंसनियत की हिफाजत की है। आज पूरी दुनिया रसूल के नवासे इमाम इमाम हुसैन की याद मनाकर इस बात की गवाही दे रही है कि यजीद हार गया और हुसैन जीत गए। यही है मकसदे कर्बला जिसने पूरी इंसानियत को अमन का पैगाम देने पर मजबूर कर दिया।
मौलाना ने अकीदतमंदों को बताया कि इमाम हुसैन भूखे व प्यासे इस्लाम को बचाने के लिए मैदान में यजीदी फौज से टक्कर लेते रहे। इमाम हुसैन के बाद उनके घर वालों पर इतने जुल्म ढाए गए कि बयान करना मुश्किल हो जाता है। इतना अकीदतमंदों की आंखों से जारो कतार आंसू बहने लगे। मजलिस की शुरुआत पेशख्वानी से हुई, जिसे बेताब हल्लौरी, नफीस हल्लौरी, नौषाद हल्लौरी, कायनात हल्लौरी, मोजिज मोलाई ने अपने अपने कलाम पर खूब वाह-वाही बटोरी। इसके बाद मर्सियाख्वानी को अंबर मेंहदी व अब्बास अली, शब्बीर हैदर ने पढ़ा। नवेद रिजवी की ओर से आयोजित तीन रोजा मजलिस में हल्लौर सहित वासा दरगाह, टंड़वा, जमौतिया, रामभारी, नव्वागांव, भटंगवा और हटवा सहित आस-पास के गांव के लोग मौजूद रहे।
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मजलिस में मौलाना रजा हैदर साहब ने कहा कि अगर इंसान मकसदे कर्बला को समझ जाए तो वे अपनी जिंदगी को कामयाब बना सकता है, क्योंकि जिसने मकसदे कर्बला समझ लिया समझो उसने इस्लाम, कुरान, नमाज, रोजा, कर्बला समझ लिया। कर्बला में इमाम हुसैन अपने 71 साथियों की कुर्बानी देकर अजमते खुदा के साथ-साथ पूरे आलमे इंसनियत की हिफाजत की है। आज पूरी दुनिया रसूल के नवासे इमाम इमाम हुसैन की याद मनाकर इस बात की गवाही दे रही है कि यजीद हार गया और हुसैन जीत गए। यही है मकसदे कर्बला जिसने पूरी इंसानियत को अमन का पैगाम देने पर मजबूर कर दिया।
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मौलाना ने अकीदतमंदों को बताया कि इमाम हुसैन भूखे व प्यासे इस्लाम को बचाने के लिए मैदान में यजीदी फौज से टक्कर लेते रहे। इमाम हुसैन के बाद उनके घर वालों पर इतने जुल्म ढाए गए कि बयान करना मुश्किल हो जाता है। इतना अकीदतमंदों की आंखों से जारो कतार आंसू बहने लगे। मजलिस की शुरुआत पेशख्वानी से हुई, जिसे बेताब हल्लौरी, नफीस हल्लौरी, नौषाद हल्लौरी, कायनात हल्लौरी, मोजिज मोलाई ने अपने अपने कलाम पर खूब वाह-वाही बटोरी। इसके बाद मर्सियाख्वानी को अंबर मेंहदी व अब्बास अली, शब्बीर हैदर ने पढ़ा। नवेद रिजवी की ओर से आयोजित तीन रोजा मजलिस में हल्लौर सहित वासा दरगाह, टंड़वा, जमौतिया, रामभारी, नव्वागांव, भटंगवा और हटवा सहित आस-पास के गांव के लोग मौजूद रहे।
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