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बदलती नहर की सूरत, खुशहाल हो जाते अन्नदाता
Fri, 24 May 2019 10:41 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Fri, 24 May 2019 10:41 PM IST
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चौरी मइनर सिसवा बुजुर्ग की सूखी पड़ी नहर।
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। जिले में नहरों की बदहाल सूरत से किसान परेशान हैं। सिंचाई के लिए नहर और इनसे निकलने वाले माइनर तो जिले में 74 हैं, लेकिन सफाई की व्यवस्था न होने से यह किसी काम के नहीं है। कहने के लिए पानी भी छोड़ा जाता है, लेकिन वह खेतों तक पहुंच नहीं पाता।
लिहाजा किसानों के लिए नहरें अनुपयोगी साबित हो रही हैं। अगर सरकार और जिम्मेदार सिंचाई व्यवस्था पर ध्यान दे दें तो अन्नदाता खुशहाल हो जाएंगे। क्योंकि समय पर फसलों की सिंचाई न हो पाने से फसलें सूख जाती हैं और किसानों को भारी क्षति का सामना करना पड़ता है।
नेपाल सीमा से सटे इस जिले की पहचान तराई क्षेत्रों में होती है। अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर है। उनकी जीविका खेती से चलती है। दो प्रमुख फसलें गेहूं और दूसरा धान। फसलों की सिंचाई में पानी की आवश्यकता को पूरी करने के लिए नहरों का जाल बिछाया गया है जिससे किसानों को सिंचाई में सहूलियत मिल सके। जिले में 74 नहर व माइनर हैं। कुल 627 किलो मीटर नहरों की लंबाई है। इससे लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर भूमि पर होने वाली फसलों की सिंचाई की योजना थी। मगर इस समय इन नहरों का बुरा हाल है। अधिकांश नहरें बेपानी हैं। खेतों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है। किसानों को अन्य साधन से सिंचाई करनी पड़ रही है। वहीं, कुछ स्थानों पर सिंचाई की अन्य व्यवस्था न हो पाने के कारण फसलें सूख जाती हैं। दशकों पूर्व बनी नहरों पर ध्यान नहीं दिया गया जिससे नहरें सिल्ट से पटी पड़ी हैं।
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बनने के बाद सुधार पर नहीं दिया गया ध्यान
नहरों के बनने के दौरान जो फाटक लगे थे। वह कुछ दिनों तक चले थे। लेकिन उसके बाद अधिकांश नहरें व माइनर के फाटक टूट चुके हैं। अगर उनकी मरम्मत हो जाए तो सिंचाई व्यवस्था सुधार जाएगी। जहां किसानों की सिंचाई व्यवस्था बेहतर हुई तो किसानों को अधिक परेशान नहीं होना होगा।
बह जाता है पानी
नहरों की मरम्मत न होने के कारण बड़ी नहरों में पानी छोड़े जाने के बाद अक्सर टूट जाती हैं, जिससे बड़ा भू-भाग प्रभावित हो जाता है। कहीं फसल डूबकर नष्ट हो जाती है तो कहीं बुवाई ही नहीं हो पाती है। वहीं, कुछ स्थानों पर पानी न पहुंचने के कारण सिंचाई प्रभावित होती है।
व्यवस्था के सुधार पर विभाग गंभीर नहीं
शासन की ओर से मनोनीत किए गए सिंचाई बंधु के जिला उपाध्यक्ष महेंद्र लोधी ने बताया कि सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाने और किसानों की समस्या के निदान के लिए समय-समय बैठक होती है, लेकिन अधिकांश अधिकारी बैठक में नहीं आते हैं। व्यवस्था में सुधार पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस मामले को लेकर शासन में आवाज उठाएंगे।
बजट के अभाव में नहीं हो पा रहा काम
ड्रेनेज खंड सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता आरके नेहरा ने बताया कि हर साल बजट भेजा जाता है। लेकिन शासन की ओर से कुछ मिलता नहीं है। इसकी वजह से काम नहीं हो पा रहा है। फिर से बजट भेजा गया है।
फैक्ट फाइल
खेती योग्य भूमि- दो लाख 45 हजार 555 हेक्टेयर
नहरों का जाल- 625 किलोमीटर
नहरों की संख्या- 74
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लिहाजा किसानों के लिए नहरें अनुपयोगी साबित हो रही हैं। अगर सरकार और जिम्मेदार सिंचाई व्यवस्था पर ध्यान दे दें तो अन्नदाता खुशहाल हो जाएंगे। क्योंकि समय पर फसलों की सिंचाई न हो पाने से फसलें सूख जाती हैं और किसानों को भारी क्षति का सामना करना पड़ता है।
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नेपाल सीमा से सटे इस जिले की पहचान तराई क्षेत्रों में होती है। अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर है। उनकी जीविका खेती से चलती है। दो प्रमुख फसलें गेहूं और दूसरा धान। फसलों की सिंचाई में पानी की आवश्यकता को पूरी करने के लिए नहरों का जाल बिछाया गया है जिससे किसानों को सिंचाई में सहूलियत मिल सके। जिले में 74 नहर व माइनर हैं। कुल 627 किलो मीटर नहरों की लंबाई है। इससे लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर भूमि पर होने वाली फसलों की सिंचाई की योजना थी। मगर इस समय इन नहरों का बुरा हाल है। अधिकांश नहरें बेपानी हैं। खेतों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है। किसानों को अन्य साधन से सिंचाई करनी पड़ रही है। वहीं, कुछ स्थानों पर सिंचाई की अन्य व्यवस्था न हो पाने के कारण फसलें सूख जाती हैं। दशकों पूर्व बनी नहरों पर ध्यान नहीं दिया गया जिससे नहरें सिल्ट से पटी पड़ी हैं।
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बनने के बाद सुधार पर नहीं दिया गया ध्यान
नहरों के बनने के दौरान जो फाटक लगे थे। वह कुछ दिनों तक चले थे। लेकिन उसके बाद अधिकांश नहरें व माइनर के फाटक टूट चुके हैं। अगर उनकी मरम्मत हो जाए तो सिंचाई व्यवस्था सुधार जाएगी। जहां किसानों की सिंचाई व्यवस्था बेहतर हुई तो किसानों को अधिक परेशान नहीं होना होगा।
बह जाता है पानी
नहरों की मरम्मत न होने के कारण बड़ी नहरों में पानी छोड़े जाने के बाद अक्सर टूट जाती हैं, जिससे बड़ा भू-भाग प्रभावित हो जाता है। कहीं फसल डूबकर नष्ट हो जाती है तो कहीं बुवाई ही नहीं हो पाती है। वहीं, कुछ स्थानों पर पानी न पहुंचने के कारण सिंचाई प्रभावित होती है।
व्यवस्था के सुधार पर विभाग गंभीर नहीं
शासन की ओर से मनोनीत किए गए सिंचाई बंधु के जिला उपाध्यक्ष महेंद्र लोधी ने बताया कि सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाने और किसानों की समस्या के निदान के लिए समय-समय बैठक होती है, लेकिन अधिकांश अधिकारी बैठक में नहीं आते हैं। व्यवस्था में सुधार पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस मामले को लेकर शासन में आवाज उठाएंगे।
बजट के अभाव में नहीं हो पा रहा काम
ड्रेनेज खंड सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता आरके नेहरा ने बताया कि हर साल बजट भेजा जाता है। लेकिन शासन की ओर से कुछ मिलता नहीं है। इसकी वजह से काम नहीं हो पा रहा है। फिर से बजट भेजा गया है।
फैक्ट फाइल
खेती योग्य भूमि- दो लाख 45 हजार 555 हेक्टेयर
नहरों का जाल- 625 किलोमीटर
नहरों की संख्या- 74