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नई कविता से आगे तक पहुंची शमशेर बहादुर की लेखनी
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हिंदी हैं हम...शमशेर बहादुर। फाइल फोटो।
- फोटो : SHAMLI
नई कविता से आगे तक पहुंची शमशेर बहादुर की लेखनी
गिरिराज सिंह
शामली।
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुजफ्फरनगरी है शायद।
शमशेर बहादुर अपनी इन पंक्तियों में जिस खरेपन की बात करते हैं वह उनकी कविताओं में कम ही नजर आता है। हां, कभी-कभी उनकी शैली समाज की मूल्यहीनता, पाखंड और दिखावे के खिलाफ इंकलाबी हो उठती है, लेकिन ज्यादातर रचनाएं स्निग्धता, कोमलता और मांसलता से भरी हुई हैं। शमशेर की भाषा में उनके क्षेत्र का असर साफ नजर आता है। खड़ी बोली का प्रतिनिधित्व करते थे इसलिए भाषा में कोई बनावट नजर नहीं आती। उसी भाषा का प्रयोग किया जो पाठकों तक सरलता से पहुंच सके। वह खुद को हिंदी और उर्दू का दोआब कहते थे।
शामली के कस्बा एलम में जन्में शमशेर बहादुर हिंदी कविता के ऐसे हस्ताक्षर रहे जिनकी बराबरी कर पाना आसान नहीं है। उनकी कविता छायावादोत्तर से शुरू होकर प्रगतिवाद और प्रयोगवाद से होते हुए नई कविता तक पहुंचती है और कई बार इससे भी आगे निकलती दिखती है। शमशेर का जन्म 13 जनवरी 1911 को तारीफ सिंह के यहां हुआ था। उस समय एलम मुजफ्फरनगर जनपद का हिस्सा था। आठ-नौ वर्ष की आयु में ही उनकी मां की मृत्यु हो गई। शमशेर की प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में हुई और इसके बाद वे प्रयाग चले गए। 18 वर्ष की आयु में विवाह हुआ, लेकिन छह वर्ष के साथ के बाद पत्नी दुनिया को अलविदा कह गई। शमशेर का जीवन काफी अभावों में गुजरा, लेकिन उनकी लेखनी इन अभावों से टक्कर लेती नजर आती है। केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन शास्त्री और बाबा नागार्जुन के समकालीन रहे शमशेर बहादुर एलम आते जाते रहे। उनके परिवार के अन्य सदस्य भी उनसे मिलते जाते थे। 12 मई 1993 को उनका गुजरात में निधन हो गया।
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एकांतवास में गए शमशेर को बच्चन ने दिया सहारा
शमशेर बहादुर की अपनी कोई संतान नहीं थी। मध्य प्रदेश में रहने के दौरान उनके भाई डॉ. तेजबहादुर सिंह उनके साथ रहे। बाद में वे गुजरात चले गए और वहां डॉ. रंजना अरगड़े ने अंतिम समय में उनकी देखभाल की। कस्बा एलम में शमशेर के चचेरे भाई बिशंभर सिंह पंवार का परिवार रहता है। बिशंभर सिंह पंवार के पुत्र बलराज सिंह बताते हैं कि एकाकी जीवन से परेशान होकर शमशेर बहादुर एकांतवास में चले गए थे। तब उन्हें हरिवंश राय बच्चन ने सहारा दिया था। 1992 में एक बार पिताजी के साथ उनसे मिलने गए थे। वे उन्हें देखकर बहुत खुश हुए थे। उनके परिवार के सुबोध भारतीय, जयवीर सिंह फौजी शमशेर बहादुर के परिवार का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करते हैं।
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एक तस्वीर, चंद किताबें और एक दीवार पर नाम
दुनिया के प्रख्यात कवि शमशेर बहादुर अपने कस्बे में अनजान ही रहे। उनके परिवारजनों के पास उनकी एक तस्वीर और चंद किताबें हैं जो उन्होंने बिशंभर सिंह को भेंट की थी। इसके अलावा कस्बे में नगर पंचायत तैयार कराए गए सौंदर्यीकरण में एक दीवार पर उनका नाम तथा संक्षिप्त परिचय लिखा है। शमशेर के भतीजे बलराज सिंह बताते हैं कि कस्बे में उनके नाम पर स्मारक बनवाने का प्रयास किया, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई। वह बताते हैं कि कस्बे व क्षेत्र के लोग उनके बारे में ज्यादा नहीं जानते। इसका एक कारण यह भी है कि शुरुआत से ही शमशेर इस क्षेत्र को छोड़कर चले गए थे।
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शमशेर बहादुर की प्रमुख रचनाएं...
शमशेर बहादुर ने अपनी प्रमुख रचना ‘चुका भी हूं नहीं मैं’ 1975 में लिखी। इसके लिए उन्हें 1977 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अलावा मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का तुलसी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार और 1989 में कबीर पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं में दोआब (1948), प्लाट का मोर्चा : कहानियां और स्केच (1952), इतने पास अपने (1980), उदिता : अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980), बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1988), टूटी हुई बिखरी हुई (1990) आदि प्रमुख हैं।
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गिरिराज सिंह
शामली।
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुजफ्फरनगरी है शायद।
शमशेर बहादुर अपनी इन पंक्तियों में जिस खरेपन की बात करते हैं वह उनकी कविताओं में कम ही नजर आता है। हां, कभी-कभी उनकी शैली समाज की मूल्यहीनता, पाखंड और दिखावे के खिलाफ इंकलाबी हो उठती है, लेकिन ज्यादातर रचनाएं स्निग्धता, कोमलता और मांसलता से भरी हुई हैं। शमशेर की भाषा में उनके क्षेत्र का असर साफ नजर आता है। खड़ी बोली का प्रतिनिधित्व करते थे इसलिए भाषा में कोई बनावट नजर नहीं आती। उसी भाषा का प्रयोग किया जो पाठकों तक सरलता से पहुंच सके। वह खुद को हिंदी और उर्दू का दोआब कहते थे।
शामली के कस्बा एलम में जन्में शमशेर बहादुर हिंदी कविता के ऐसे हस्ताक्षर रहे जिनकी बराबरी कर पाना आसान नहीं है। उनकी कविता छायावादोत्तर से शुरू होकर प्रगतिवाद और प्रयोगवाद से होते हुए नई कविता तक पहुंचती है और कई बार इससे भी आगे निकलती दिखती है। शमशेर का जन्म 13 जनवरी 1911 को तारीफ सिंह के यहां हुआ था। उस समय एलम मुजफ्फरनगर जनपद का हिस्सा था। आठ-नौ वर्ष की आयु में ही उनकी मां की मृत्यु हो गई। शमशेर की प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में हुई और इसके बाद वे प्रयाग चले गए। 18 वर्ष की आयु में विवाह हुआ, लेकिन छह वर्ष के साथ के बाद पत्नी दुनिया को अलविदा कह गई। शमशेर का जीवन काफी अभावों में गुजरा, लेकिन उनकी लेखनी इन अभावों से टक्कर लेती नजर आती है। केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन शास्त्री और बाबा नागार्जुन के समकालीन रहे शमशेर बहादुर एलम आते जाते रहे। उनके परिवार के अन्य सदस्य भी उनसे मिलते जाते थे। 12 मई 1993 को उनका गुजरात में निधन हो गया।
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एकांतवास में गए शमशेर को बच्चन ने दिया सहारा
शमशेर बहादुर की अपनी कोई संतान नहीं थी। मध्य प्रदेश में रहने के दौरान उनके भाई डॉ. तेजबहादुर सिंह उनके साथ रहे। बाद में वे गुजरात चले गए और वहां डॉ. रंजना अरगड़े ने अंतिम समय में उनकी देखभाल की। कस्बा एलम में शमशेर के चचेरे भाई बिशंभर सिंह पंवार का परिवार रहता है। बिशंभर सिंह पंवार के पुत्र बलराज सिंह बताते हैं कि एकाकी जीवन से परेशान होकर शमशेर बहादुर एकांतवास में चले गए थे। तब उन्हें हरिवंश राय बच्चन ने सहारा दिया था। 1992 में एक बार पिताजी के साथ उनसे मिलने गए थे। वे उन्हें देखकर बहुत खुश हुए थे। उनके परिवार के सुबोध भारतीय, जयवीर सिंह फौजी शमशेर बहादुर के परिवार का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करते हैं।
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एक तस्वीर, चंद किताबें और एक दीवार पर नाम
दुनिया के प्रख्यात कवि शमशेर बहादुर अपने कस्बे में अनजान ही रहे। उनके परिवारजनों के पास उनकी एक तस्वीर और चंद किताबें हैं जो उन्होंने बिशंभर सिंह को भेंट की थी। इसके अलावा कस्बे में नगर पंचायत तैयार कराए गए सौंदर्यीकरण में एक दीवार पर उनका नाम तथा संक्षिप्त परिचय लिखा है। शमशेर के भतीजे बलराज सिंह बताते हैं कि कस्बे में उनके नाम पर स्मारक बनवाने का प्रयास किया, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई। वह बताते हैं कि कस्बे व क्षेत्र के लोग उनके बारे में ज्यादा नहीं जानते। इसका एक कारण यह भी है कि शुरुआत से ही शमशेर इस क्षेत्र को छोड़कर चले गए थे।
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शमशेर बहादुर की प्रमुख रचनाएं...
शमशेर बहादुर ने अपनी प्रमुख रचना ‘चुका भी हूं नहीं मैं’ 1975 में लिखी। इसके लिए उन्हें 1977 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अलावा मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का तुलसी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार और 1989 में कबीर पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं में दोआब (1948), प्लाट का मोर्चा : कहानियां और स्केच (1952), इतने पास अपने (1980), उदिता : अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980), बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1988), टूटी हुई बिखरी हुई (1990) आदि प्रमुख हैं।

हिंदी हैं हम...स्व. शमशेर बहादुर के चित्र के साथ उनके पारिवारिक भतीजे बलराज पंवार और सुबोध भारतीय।- फोटो : SHAMLI

हिंदी हैं हम...एलम गांव में अपने परिवार के सदस्यों के साथ शमशेर बहादुर (कुर्सी पर बैठे एवं बच्चे को ?- फोटो : SHAMLI

हिंदी हैं हम...शमशेर बहादुर द्वारा अपने भाई कैप्टन बिशंभर को भेंट की गई पुस्तक।- फोटो : SHAMLI