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तिलहर से बझेड़ा, फिर कट-कटकर बना कटरा
अमर उजाला ब्यूरो शाहजहांपुर।
Updated Fri, 13 Jan 2017 11:21 PM IST
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लंबा-चौड़ा विस्तार रखने वाले इस विधानसभा क्षेत्र में हर बिरादरी के अलग समीकरण
कटरा विधानसभा क्षेत्र को जिले में बुनियादी सुविधाओं के सर्वाधिक अभाव और आर्थिक पिछड़ेपन से ग्रस्त आबादी की बहुतायत वाले इलाके के तौर पर जाना जाता है। यह क्षेत्र जलालाबाद से भी ज्यादा भू-भाग में फैला है। एक ओर खुदागंज है, दूसरी ओर रामगंगा से सटे सुदूर परौर का इलाका। बुधवाना, जैतीपुर, गढ़िया रंगीन इलाका भी इसी में है। जातीय विभिन्नता वाले इस क्षेत्र में हर बिरादरी का अपना दिलचस्प समीकरण है जिसके चलते यहां का मतदाता अलग-अलग कालखंड में अलग-अलग बिरादरी के प्रत्याशी को जनप्रतिनिधि चुनता रहा है। खास यह भी है कि यह क्षेत्र प्रदेश के पहले चुनाव से लेकर अब तक कई बार बना, बिखरा और फिर गठित हुआ।
बार-बार बदला नाम और भूगोल
वर्ष 1951 में पहले विधानसभा चुनाव में यह तिलहर साउथ सीट हुआ करती थी। 1957 में इसे खंडित कर दिया गया और मौजूदा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा खेड़ा बझेड़ा विधानसभा क्षेत्र में चला गया और शेष हिस्सा तिलहर साउथ में रहा। वर्ष 1962 में भी यही स्थिति रही। वर्ष 1967 में इसका नामकरण तिलहर के रूप में हुआ जो वर्ष 2007 के चुनाव तक बरकरार रहा। 2012 के चुनाव में यह कटरा विधानसभा क्षेत्र का गठन किया गया।
पहला चुनाव जातीय आंकड़ों के विरुद्ध
यहां कायस्थ बिरादरी के वोटरों की संख्या पांच हजार भी नहीं है, लेकिन पहले विधानसभा चुनाव में वर्ष 1951 ने कांग्रेस ने इसी बिरादरी के भगवान सहाय को प्रत्याशी बनाया जिन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के रूम सिंह को 1003 मतों से हराकर जीत हासिल की। अगले चुनाव में वर्ष 1957 में इस सीट को खंडित कर बनाए नए निर्वाचन क्षेत्र खेड़ा बझेड़ा से कांग्रेस के सुरेंद्र विक्रम सिंह को कांटे की टक्कर में निर्दलीय रूम सिंह ने 195 मतों से हरा दिया था। वर्ष 1962 में खेड़ा बझेड़ा से कांग्रेस के सुरेंद्र विक्रम सिंह पीएसपी के अमर सिंह को 3260 मतों से हराकर विधायक चुने गए। वर्ष 1967 में तिलहर नाम से पुनर्गठित इस विधानसभा क्षेत्र में भी कांग्रेस के सुरेंद्र विक्रम ने दबदबा बनाए रखा और निर्दलीय भगवान सहाय को 6417 मतों से हराया। वर्ष 1969 में भी एसएसपी प्रत्याशी रूम सिंह को 2256 मतों से पछाड़कर वही विधायक चुने गए।
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चुनाव दर चुनाव दल बदलते रहे सत्यपाल यादव
वर्ष 1974 के चुनाव में यहां से भारतीय जनसंघ के टिकट पर निर्वाचित होकर सत्यपाल सिंह यादव विधानसभा पहुंचे। उन्होंने एनसीओ प्रत्याशी सुरेंद्र विक्रम सिंह को 951 मतों के अंतर से हराया था। बाद में यही विधायक जिले में नए सियासी कुनबे का ऐसा अगुवा बना जिसने अपनी सियासी पारी में किसी भी राजनीतिक दल को अछूता नहीं रहने दिया। 1977 में कांग्रेस के टिकट पर सत्यपाल सिंह यादव जनता पार्टी के रूम सिंह को 1451 मतों से हराकर विधायक बने। वर्ष 1980 में फिर पाला बदलते हुए जनता पार्टी (एससी) के टिकट पर कांग्रेस के जीशान खान को 10759 मतों से पछाड़ा। वर्ष 1985 में पालाबदल बरकरार रखते हुए वह लोकदल के टिकट पर यहां से 20666 मतों के अंतर से विधायक बने लेकिन वर्ष 1989 में उनकी जीत सिलसिला टूट गया। हालांकि 91 में वह इसी सीट पर फिर चुनाव लड़े लेकिन सांसदी और विधायकी दोनों में जीत हासिल करने के कारण विधायकी छोड़ दी। बाद में हुए उपचुनाव में सपा मुखिया मुलायम यहां से खुद मैदान में उतरे और कांग्रेस के वीरेंद्र सिंह मुन्ना को लगभग 6000 मतों से पराजित किया। हालांकि मुलायम जसवंत नगर सीट से जीते थे, इसलिए उन्होंने यह सीट छोड़ दी।
...और 1993 के बाद
वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वीरेंद्र प्रताप सिंह मुन्ना को यहां से प्रत्याशी बनाया तो वह सपा के रविंद्र सिंह यादव को हराकर विधायक चुने गए और वर्ष 1996 तथा 2002 के चुनाव में भी वही यहां से विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2007 में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने यहां के पूर्व विधायक सत्यपाल सिंह यादव के दिवंगत होने पर उनके बेटे राजेश यादव को अपना प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा तो लगातार दूसरी बार वर्ष 2012 में भी यहां से सपा के विधायक बने एवं इस बार भी मैदान में हैं।
यह है जातीय गणित
जिले में 15 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव के मतदान के लिए घोषित वोटर सूची में कटरा क्षेत्र में कुल तीन लाख 13 हजार 280 मतदाता हैं। जानकारों के अनुसार जातीय लिहाज से यहां ठाकुर वोटर सबसे ज्यादा करीब 61 हजार हैं जबकि हरिजन करीब 45 हजार, यादव 42 हजार, कश्यप 36 हजार, कुर्मी 24 हजार, ब्राह्मण 14 हजार, राठौर - तेली करीब 13 हजार, गुर्जर करीब साढ़े 12 हजार और वैश्य करीब सवा आठ हजार हैं।
लोकसभा चुनाव में कटरा विधानसभा से दलों को मिले वोट फीसदी
कुल वोटर : 310370
कुल पड़े वोट : 171793 (55.35 फीसदी)
भाजपा : 44.05 फीसदी (75687 वोट मिले)
कांग्रेस : 3.21 फीसदी (5525 वोट मिले)
सपा : 24.32 फीसदी (41794 वोट मिले)
बसपा : 25.97 फीसदी (44629 वोट मिले)
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कटरा विधानसभा क्षेत्र को जिले में बुनियादी सुविधाओं के सर्वाधिक अभाव और आर्थिक पिछड़ेपन से ग्रस्त आबादी की बहुतायत वाले इलाके के तौर पर जाना जाता है। यह क्षेत्र जलालाबाद से भी ज्यादा भू-भाग में फैला है। एक ओर खुदागंज है, दूसरी ओर रामगंगा से सटे सुदूर परौर का इलाका। बुधवाना, जैतीपुर, गढ़िया रंगीन इलाका भी इसी में है। जातीय विभिन्नता वाले इस क्षेत्र में हर बिरादरी का अपना दिलचस्प समीकरण है जिसके चलते यहां का मतदाता अलग-अलग कालखंड में अलग-अलग बिरादरी के प्रत्याशी को जनप्रतिनिधि चुनता रहा है। खास यह भी है कि यह क्षेत्र प्रदेश के पहले चुनाव से लेकर अब तक कई बार बना, बिखरा और फिर गठित हुआ।
बार-बार बदला नाम और भूगोल
वर्ष 1951 में पहले विधानसभा चुनाव में यह तिलहर साउथ सीट हुआ करती थी। 1957 में इसे खंडित कर दिया गया और मौजूदा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा खेड़ा बझेड़ा विधानसभा क्षेत्र में चला गया और शेष हिस्सा तिलहर साउथ में रहा। वर्ष 1962 में भी यही स्थिति रही। वर्ष 1967 में इसका नामकरण तिलहर के रूप में हुआ जो वर्ष 2007 के चुनाव तक बरकरार रहा। 2012 के चुनाव में यह कटरा विधानसभा क्षेत्र का गठन किया गया।
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पहला चुनाव जातीय आंकड़ों के विरुद्ध
यहां कायस्थ बिरादरी के वोटरों की संख्या पांच हजार भी नहीं है, लेकिन पहले विधानसभा चुनाव में वर्ष 1951 ने कांग्रेस ने इसी बिरादरी के भगवान सहाय को प्रत्याशी बनाया जिन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के रूम सिंह को 1003 मतों से हराकर जीत हासिल की। अगले चुनाव में वर्ष 1957 में इस सीट को खंडित कर बनाए नए निर्वाचन क्षेत्र खेड़ा बझेड़ा से कांग्रेस के सुरेंद्र विक्रम सिंह को कांटे की टक्कर में निर्दलीय रूम सिंह ने 195 मतों से हरा दिया था। वर्ष 1962 में खेड़ा बझेड़ा से कांग्रेस के सुरेंद्र विक्रम सिंह पीएसपी के अमर सिंह को 3260 मतों से हराकर विधायक चुने गए। वर्ष 1967 में तिलहर नाम से पुनर्गठित इस विधानसभा क्षेत्र में भी कांग्रेस के सुरेंद्र विक्रम ने दबदबा बनाए रखा और निर्दलीय भगवान सहाय को 6417 मतों से हराया। वर्ष 1969 में भी एसएसपी प्रत्याशी रूम सिंह को 2256 मतों से पछाड़कर वही विधायक चुने गए।
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चुनाव दर चुनाव दल बदलते रहे सत्यपाल यादव
वर्ष 1974 के चुनाव में यहां से भारतीय जनसंघ के टिकट पर निर्वाचित होकर सत्यपाल सिंह यादव विधानसभा पहुंचे। उन्होंने एनसीओ प्रत्याशी सुरेंद्र विक्रम सिंह को 951 मतों के अंतर से हराया था। बाद में यही विधायक जिले में नए सियासी कुनबे का ऐसा अगुवा बना जिसने अपनी सियासी पारी में किसी भी राजनीतिक दल को अछूता नहीं रहने दिया। 1977 में कांग्रेस के टिकट पर सत्यपाल सिंह यादव जनता पार्टी के रूम सिंह को 1451 मतों से हराकर विधायक बने। वर्ष 1980 में फिर पाला बदलते हुए जनता पार्टी (एससी) के टिकट पर कांग्रेस के जीशान खान को 10759 मतों से पछाड़ा। वर्ष 1985 में पालाबदल बरकरार रखते हुए वह लोकदल के टिकट पर यहां से 20666 मतों के अंतर से विधायक बने लेकिन वर्ष 1989 में उनकी जीत सिलसिला टूट गया। हालांकि 91 में वह इसी सीट पर फिर चुनाव लड़े लेकिन सांसदी और विधायकी दोनों में जीत हासिल करने के कारण विधायकी छोड़ दी। बाद में हुए उपचुनाव में सपा मुखिया मुलायम यहां से खुद मैदान में उतरे और कांग्रेस के वीरेंद्र सिंह मुन्ना को लगभग 6000 मतों से पराजित किया। हालांकि मुलायम जसवंत नगर सीट से जीते थे, इसलिए उन्होंने यह सीट छोड़ दी।
...और 1993 के बाद
वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वीरेंद्र प्रताप सिंह मुन्ना को यहां से प्रत्याशी बनाया तो वह सपा के रविंद्र सिंह यादव को हराकर विधायक चुने गए और वर्ष 1996 तथा 2002 के चुनाव में भी वही यहां से विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2007 में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने यहां के पूर्व विधायक सत्यपाल सिंह यादव के दिवंगत होने पर उनके बेटे राजेश यादव को अपना प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा तो लगातार दूसरी बार वर्ष 2012 में भी यहां से सपा के विधायक बने एवं इस बार भी मैदान में हैं।
यह है जातीय गणित
जिले में 15 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव के मतदान के लिए घोषित वोटर सूची में कटरा क्षेत्र में कुल तीन लाख 13 हजार 280 मतदाता हैं। जानकारों के अनुसार जातीय लिहाज से यहां ठाकुर वोटर सबसे ज्यादा करीब 61 हजार हैं जबकि हरिजन करीब 45 हजार, यादव 42 हजार, कश्यप 36 हजार, कुर्मी 24 हजार, ब्राह्मण 14 हजार, राठौर - तेली करीब 13 हजार, गुर्जर करीब साढ़े 12 हजार और वैश्य करीब सवा आठ हजार हैं।
लोकसभा चुनाव में कटरा विधानसभा से दलों को मिले वोट फीसदी
कुल वोटर : 310370
कुल पड़े वोट : 171793 (55.35 फीसदी)
भाजपा : 44.05 फीसदी (75687 वोट मिले)
कांग्रेस : 3.21 फीसदी (5525 वोट मिले)
सपा : 24.32 फीसदी (41794 वोट मिले)
बसपा : 25.97 फीसदी (44629 वोट मिले)