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रामगंगा का जलस्तर बढ़ा भू-कटान की गति तेज
शाहजहांपुर
Updated Fri, 10 Jul 2015 12:13 AM IST
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रामगंगा नदी का जलस्तर बृहस्पतिवार सुबह से फिर बढ़ रहा है। इससे गांव पहरूआ, मौजमपुर, कुनिया शाहनजीरपुर और हरिहरपुर के समीप भू-कटाव की गति काफी बढ़ गई है। रामगंगा गांव हरिहरपुर में प्राथमिक विद्यालय टेढ़ा और गांव पहरूआ में शिव मंदिर को अपने में समाने के लिए आगे बढ़ रही है। लोगों का मानना है कि रामगंगा इसी तरह भू-कटान करती हुई आगे बढ़ती रही तो सुबह तक स्कूल और मंदिर नदी में समा जाएंगे।
मंगलवार को विभिन्न बैराजों से रामगंगा में बहाया गया लगभग 18 हजार क्यूसिक पानी का असर यहां बृहस्पतिवार को दिखाई दिया। सुबह से बढ़ी रामगंगा भू-कटाव करती हुई गांव पहरूआ में लगभग 28 वर्ष पुराना शिव मंदिर से नदी की दूरी मात्र तीन मीटर रह गई है। इसी तरह गांव हरिहरपुर में नदी भू-कटाव करती हुई प्राथमिक स्कूल टेढ़ा की तरफ बढ़ रही है। रामगंगा और स्कूल की दूरी महज 25-30 मीटर रह गई है। भू-कटाव की गति देखते हुए ग्रामीणों का अनुमान है कि इसी तरह नदी भू-कटाव करती रही तो एक दो दिन में यह स्कूल भी बड़े पहरूआ के स्कूल की तरह नदी में समा जाएगा।
कुनिया में रामगंगा गांव के पूरब की ओर भू कटाव कर रही है। इससे ध्रुवपाल सिंह, रमेश सिंह, शिवराम सिंह, रामचंद्र सिंह, बृजेश सिंह, वीरपाल सिंह आदि के पक्के मकान नदी से कुछ मीटर की दूरी पर ही रह गए हैं। नदी के तटवर्ती मकानों से लोग अपनी घर गृहस्थी तो पहले ही सुरक्षित जगह पहुंचा चुके हैं अब मकान तोड़कर ईंट और लकड़ी निकालकर किसी दूसरी जगह आशियाना बनाने की जुगत में हैं।
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मंगलवार को विभिन्न बैराजों से रामगंगा में बहाया गया लगभग 18 हजार क्यूसिक पानी का असर यहां बृहस्पतिवार को दिखाई दिया। सुबह से बढ़ी रामगंगा भू-कटाव करती हुई गांव पहरूआ में लगभग 28 वर्ष पुराना शिव मंदिर से नदी की दूरी मात्र तीन मीटर रह गई है। इसी तरह गांव हरिहरपुर में नदी भू-कटाव करती हुई प्राथमिक स्कूल टेढ़ा की तरफ बढ़ रही है। रामगंगा और स्कूल की दूरी महज 25-30 मीटर रह गई है। भू-कटाव की गति देखते हुए ग्रामीणों का अनुमान है कि इसी तरह नदी भू-कटाव करती रही तो एक दो दिन में यह स्कूल भी बड़े पहरूआ के स्कूल की तरह नदी में समा जाएगा।
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कुनिया में रामगंगा गांव के पूरब की ओर भू कटाव कर रही है। इससे ध्रुवपाल सिंह, रमेश सिंह, शिवराम सिंह, रामचंद्र सिंह, बृजेश सिंह, वीरपाल सिंह आदि के पक्के मकान नदी से कुछ मीटर की दूरी पर ही रह गए हैं। नदी के तटवर्ती मकानों से लोग अपनी घर गृहस्थी तो पहले ही सुरक्षित जगह पहुंचा चुके हैं अब मकान तोड़कर ईंट और लकड़ी निकालकर किसी दूसरी जगह आशियाना बनाने की जुगत में हैं।
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