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ध्रुव चरित्र से मिली धैर्य और भक्ति की सीख : शास्त्री
Sat, 24 Oct 2026 02:12 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, संभल
संवाद न्यूज एजेंसी, संभल
Updated Sat, 24 Oct 2026 02:12 AM IST
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चंदौसी के गांव गुमथल में भागवत कथा सुनाते कथा वाचक व उपस्थित श्रद्धालु। संवाद
- फोटो : shiv tripathi
चंदौसी। गुमथल गांव के ब्रह्मपुरी स्थल पर चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन आचार्य गौरव कुमार शास्त्री ने ध्रुव चरित्र, सती चरित्र और अजामिल प्रसंग का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि ध्रुव चरित्र से धैर्य और भक्ति की सीख मिली। साथ ही उन्होंने श्रद्धालुओं को भक्ति, धैर्य और पारिवारिक मर्यादा का महत्व समझाया।
ध्रुव चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य ने बताया कि राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव को उनकी सौतेली मां सुरुचि ने अपमानित किया था। इसके बावजूद उनकी माता सुनीति ने धैर्य और संयम बनाए रखा। उन्होंने कहा कि परिवार को संकट से बचाने और रिश्तों को बनाए रखने के लिए धैर्य एवं संयम बेहद जरूरी हैं। बालक ध्रुव ने कठोर तपस्या से भगवान को प्रसन्न किया। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि भक्ति के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती। बच्चों में बचपन से ही भक्ति और अच्छे संस्कारों के बीज बोने चाहिए, क्योंकि बचपन कच्ची मिट्टी की तरह होता है, जिसे उचित मार्गदर्शन देकर मनचाहा आकार दिया जा सकता है।
आचार्य गौरव कुमार शास्त्री ने सती चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि बिना निमंत्रण किसी स्थान पर जाने से पहले यह विचार कर लेना चाहिए कि वहां अपने इष्टदेव या गुरु का अपमान तो नहीं होगा। यदि ऐसी आशंका हो तो उस स्थान पर जाने से बचना चाहिए, भले ही वह अपने जन्मदाता पिता का घर ही क्यों न हो।
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उन्होंने बताया कि भगवान शिव की सलाह न मानकर पिता के घर पहुंची सती को वहां अपमान का सामना करना पड़ा। इससे आहत होकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। आचार्य ने अजामिल प्रसंग के माध्यम से पाप और प्रायश्चित की महत्ता भी समझाई। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत में प्रायश्चित को पापों से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण उपाय बताया गया है। कथा के समापन पर श्रीमद्भागवत की आरती की गई और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। अजय पाठक, विवेक शर्मा, आनंद शर्मा, अनमोल पाठक, अवनेश शर्मा, डॉ. हरि सिंह, दीपक शर्मा, शशिकांत, आदर्श पाठक, ज्योति शर्मा, सर्वेश शर्मा, डॉली शर्मा, पूनम शर्मा, शिवानी शर्मा, आशा शर्मा, पुष्पा शर्मा, सोनी शर्मा, अंजली शर्मा और प्रिया शर्मा सहित अन्य श्रद्धालु मौजूद रहे।
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ध्रुव चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य ने बताया कि राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव को उनकी सौतेली मां सुरुचि ने अपमानित किया था। इसके बावजूद उनकी माता सुनीति ने धैर्य और संयम बनाए रखा। उन्होंने कहा कि परिवार को संकट से बचाने और रिश्तों को बनाए रखने के लिए धैर्य एवं संयम बेहद जरूरी हैं। बालक ध्रुव ने कठोर तपस्या से भगवान को प्रसन्न किया। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि भक्ति के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती। बच्चों में बचपन से ही भक्ति और अच्छे संस्कारों के बीज बोने चाहिए, क्योंकि बचपन कच्ची मिट्टी की तरह होता है, जिसे उचित मार्गदर्शन देकर मनचाहा आकार दिया जा सकता है।
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आचार्य गौरव कुमार शास्त्री ने सती चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि बिना निमंत्रण किसी स्थान पर जाने से पहले यह विचार कर लेना चाहिए कि वहां अपने इष्टदेव या गुरु का अपमान तो नहीं होगा। यदि ऐसी आशंका हो तो उस स्थान पर जाने से बचना चाहिए, भले ही वह अपने जन्मदाता पिता का घर ही क्यों न हो।
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उन्होंने बताया कि भगवान शिव की सलाह न मानकर पिता के घर पहुंची सती को वहां अपमान का सामना करना पड़ा। इससे आहत होकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। आचार्य ने अजामिल प्रसंग के माध्यम से पाप और प्रायश्चित की महत्ता भी समझाई। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत में प्रायश्चित को पापों से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण उपाय बताया गया है। कथा के समापन पर श्रीमद्भागवत की आरती की गई और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। अजय पाठक, विवेक शर्मा, आनंद शर्मा, अनमोल पाठक, अवनेश शर्मा, डॉ. हरि सिंह, दीपक शर्मा, शशिकांत, आदर्श पाठक, ज्योति शर्मा, सर्वेश शर्मा, डॉली शर्मा, पूनम शर्मा, शिवानी शर्मा, आशा शर्मा, पुष्पा शर्मा, सोनी शर्मा, अंजली शर्मा और प्रिया शर्मा सहित अन्य श्रद्धालु मौजूद रहे।