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Saharanpur News: लखनौती किले पर एसडीएम कोर्ट का आदेश बरकार, याचिका खारिज

Thu, 21 Aug 2025 12:58 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर Updated Thu, 21 Aug 2025 12:58 AM IST
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SDM court's order on Lakhnauti fort is upheld, petition rejected
सहारनपुर। अदालत ने गंगोह के लखनौती किले पर याचिकाकर्ता के अवैध कब्जाधारी मानने के आदेश को बरकरार रखा है। याचिकाकर्ताओं ने लखनौती किले को विरासत में प्राप्त बताया था। हालांकि इस मामले में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके। अदालत ने जमींदारी उन्मूलन अधिनियम की धारा छह के प्रावधानों के तहत उनकी याचिका को ठुकरा दिया है।
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मामला लखनौती के ऐतिहासिक किले से जुड़ा है। उपजिलाधिकारी सदर न्यायालय ने वर्ष 2021 में सुनवाई के बाद फरजंद अली, शाह हसन, मोहम्मद कारिब, मोहम्मद शारिब और कुमैल निवासी लखनौती को एक माह के अंदर किले को खाली करने के आदेश दिए थे। आदेश के खिलाफ सभी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अदालत में दायर मामले में याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कहा कि उपजिलाधिकारी की ओर से जारी आदेश गलत है।
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आदेश में यह नहीं बताया गया कि संपत्ति स्थानीय निकाय से संबंधित है। उन्होंने कहा कि भूराजस्व अभिलेखों में भूमि खसरा नंबर 174 रकबा 1.772 हेक्टेयर अकृषक के रूप में दर्ज है। यह जमीन उन्हें उनके पूर्वजों से विरासत में मिली है। वर्ष 1809 में तत्कालीन राजा की ओर से शाही फरमान जारी किया गया था। तभी से इस जमीन पर काबिज चले आ रहे हैं।
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शासकीय अधिवक्ता ने यह दी दलील


जिला शासकीय अधिवक्ता ने अपनी दलील में कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से अपने तथ्यों के पक्ष में कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे साबित हो कि संपत्ति जमींदारा खात्मा या चकबंदी प्रक्रिया में उनके नाम हो। उन्होंने कहा कि जहां तक वर्ष 1809 के शाही फरमान के आधार पर वैध कब्जाधारी होने का तर्क दिया गया है। वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के तहत साक्ष्य ग्रहण के योग्य नहीं है। कथित शाही फरमान 1809 के हिंदी अनुवादकर्ता ने अपने अनुवाद में यह बताया कि यह दस्तावेज ठीक से पठनीय नहीं है एवं मुहर भी कटी हुई है। शासकीय अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं का कुछ अधिकार जमीन पर है भी तो वह जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के तहत स्वतः समाप्त हो जाता है। ऐसे में इस दस्तावेज का कोई लाभ विधिक दृष्टि से प्रार्थियों को प्राप्त नहीं हो सकता। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश आलोक शर्मा की अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और पत्रावलियों पर आए साक्ष्यों पर प्रार्थियों की अपील खारिज करते हुए उपजिलाधिकारी के आदेशों को बरकरार रखा है। मामले की पैरवी जिला शासकीय अधिवक्ता उमेश त्यागी कर रहे हैं।
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