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बारिश के बाद खादर क्षेत्र में बुखार का खतरा बढ़ा
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Tue, 19 Jul 2016 12:35 AM IST
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मां शांकभरी के खोल में आए पानी में बहते लोगों को बचाते हुए
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर में बारिश के बाद मौसम में आई नमी के कारण सहारनपुर के खादर क्षेत्र में बुखार का खतरा बढ़ गया है। स्वास्थ्य विभाग के ही आंकलन में मलेरिया से लेकर अन्य तरह के बुखार के मामले में जनपद में चार लाख से अधिक की आबादी हाई रिस्क एरिया में हैं।
इसमें गंगोह, नकुड़, देवबंद, नागल, सरसावा समेत अन्य ब्लॉक के 50 से अधिक संवेदनशील गांव शामिल हैं, जहां हर साल बुखार से मौतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। हर साल की तरह इस बार भी स्वास्थ्य विभाग आने वाले खतरे से बेखबर है।
बरसात के मौसम में हर साल बुखार से मौतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। जुलाई से सितंबर तक मलेरिया का बिगड़ा रुप हर साल सैकड़ों जान ले चुका है। पिछले 13 साल से यही सिलसिला चल रहा है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इस बीमारी पर नियंत्रण का सबक तक नहीं ले पाया है।
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वर्ष 2002 से 2010 तक दिमागी बुखार से 500 से अधिक मासूमों की मौतों ने भी पूरे प्रदेश को हिला दिया था। वहीं बुखार से मरने वालों की संख्या 2000 से ऊपर पहुंच गई है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन केवल पानी में ही लाठी पीट रहा है।
बुखार के कहर को झेल रहे जिले में केवल कागजी प्लान और कागजी कवायद होती रही है। यही कारण है कि अब तक बुखार से निपटने के लिए अब तक कोई कार्ययोजना नहीं बनी है।
जिले में मुजफ्फराबाद, साढ़ौली कदीम, नकुड़ और गंगोह में बुखार का अधिक प्रकोप रहता है। सुनने में सामान्य लगने वाले बुखार के खतरनाक होने का कारण सरकारी डॉक्टरों की कमी, समय पर चिकित्सा के लिए कदम नहीं उठाना और नियंत्रण के नाम पर कागजी खेल है।
सूत्रों के अनुसार जनपद में चार लाख से अधिक की आबादी मलेरिया और डेंगू में संवेदनशील है। मुजफ्फराबाद, साढ़ौली कदीम, नकुड़, गंगोह, सरसावा और देवबंद के कई गांव हाईरिस्क एरिया में है।
इन ब्लॉकों के भी गांव कुंडा कलां, कुंडा खुर्द, बेगी नाजर, दौलतपुर, मिर्जापुर, कालूवाला, रानीपुर बरसी, अलीपुरा, खेड़ा अफगान आदि अन्य बुखार से अधिक प्रभावित रहते हैं।
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इसमें गंगोह, नकुड़, देवबंद, नागल, सरसावा समेत अन्य ब्लॉक के 50 से अधिक संवेदनशील गांव शामिल हैं, जहां हर साल बुखार से मौतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। हर साल की तरह इस बार भी स्वास्थ्य विभाग आने वाले खतरे से बेखबर है।
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बरसात के मौसम में हर साल बुखार से मौतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। जुलाई से सितंबर तक मलेरिया का बिगड़ा रुप हर साल सैकड़ों जान ले चुका है। पिछले 13 साल से यही सिलसिला चल रहा है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इस बीमारी पर नियंत्रण का सबक तक नहीं ले पाया है।
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वर्ष 2002 से 2010 तक दिमागी बुखार से 500 से अधिक मासूमों की मौतों ने भी पूरे प्रदेश को हिला दिया था। वहीं बुखार से मरने वालों की संख्या 2000 से ऊपर पहुंच गई है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन केवल पानी में ही लाठी पीट रहा है।
बुखार के कहर को झेल रहे जिले में केवल कागजी प्लान और कागजी कवायद होती रही है। यही कारण है कि अब तक बुखार से निपटने के लिए अब तक कोई कार्ययोजना नहीं बनी है।
जिले में मुजफ्फराबाद, साढ़ौली कदीम, नकुड़ और गंगोह में बुखार का अधिक प्रकोप रहता है। सुनने में सामान्य लगने वाले बुखार के खतरनाक होने का कारण सरकारी डॉक्टरों की कमी, समय पर चिकित्सा के लिए कदम नहीं उठाना और नियंत्रण के नाम पर कागजी खेल है।
सूत्रों के अनुसार जनपद में चार लाख से अधिक की आबादी मलेरिया और डेंगू में संवेदनशील है। मुजफ्फराबाद, साढ़ौली कदीम, नकुड़, गंगोह, सरसावा और देवबंद के कई गांव हाईरिस्क एरिया में है।
इन ब्लॉकों के भी गांव कुंडा कलां, कुंडा खुर्द, बेगी नाजर, दौलतपुर, मिर्जापुर, कालूवाला, रानीपुर बरसी, अलीपुरा, खेड़ा अफगान आदि अन्य बुखार से अधिक प्रभावित रहते हैं।