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कोविद के चेहरे से वेस्ट में दलितों में मजबूत पैठ बनाएगी भाजपा
Updated Tue, 20 Jun 2017 12:43 AM IST
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‘कोविंद दांव’ से वेस्ट के दलितों में पैठ बनाएगी भाजपा
शशांक मिश्र
सहारनपुर। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ महीने से जातीय हिंसा की घटनाओं के बाद गर्माए सियासी माहौल में दलित राजनीति एक बड़ा मुद्दा बन गई है। भाजपा को भी विधान सभा चुनाव में मिला दलित वोट खिसकता नजर आ रहा था। ऐसे माहौल में राष्ट्रपति पद पर दलित चेहरा सामने लाकर भाजपा ने ऐसा दांव खेला है, जिससे विपक्ष के दलित एजेंडे और भीम आर्मी की धार कुंद होगी, साथ ही जातीय हिंसा की घटनाओं के बाद नाराज चल रहे दलितों की नाराजगी भी कुछ हद तक दूर होगी। हालांकि यह देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का सबसे बड़ा चुनाव है मगर, इससे छनकर आने वाला संदेश दलितों तक जरूर पहुंचेगा और इसका फायदा भी भाजपा को मिलेगा।
दलित समाज के बुद्धिजीवी भी भाजपा की इस पहल को सराह रहे हैं।
सहारनपुर से निकली जातीय हिंसा की लपटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ हरियाणा और पंजाब तक पहुंचने लगी हैं। सहारनपुर में हुए उपद्रव के बाद भाजपा के पाले से दलित मत खिसकता भी दिखाई दे रहा था। अलग-अलग जगहों पर राजनीतिक दल भीम आर्मी और अन्य संगठनों की मदद से दलितों में सेंधमारी की कोशिश में जुट गए हैं। अब भाजपा ने देश के सबसे बड़ेे संवैधानिक राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को प्रत्याशी चुना है। हालांकि इस चुनाव से आम जनता का सीधा संबंध नहीं है, बावजूद इसके भाजपा के इस चेहरे से दलितों की सहानुभूति जरूर आएगी। इससे सहारनपुर सहित वेस्ट यूपी में जातीय हिंसा से भाजपा को हो रहे नुकसान की भरपाई की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
दलित बहुल क्षेत्र होने के कारण सहारनपुर बसपा का मजबूत गढ़ रह है और सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर बसपा ने वेस्ट यूपी में अपनी पैठ बना ली थी। हिंदुत्व एजेंडे के साथ मैदान में डटी भाजपा को लोकसभा के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में बंपर सफलता मिली। दलित मतों में जबरदस्त सेंधमारी के चलते उसे उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली। मगर, सहारनपुर में पिछले दो महीने में हुई जातीय हिंसा की घटनाओं से पूूरे देश में भाजपा के खिलाफ दलितों में माहौल बनने लगा था। सहारनपुर की भीम आर्मी को हिंसा का मुख्य आरोपी बनाए जाने के बाद दलित भाजपा से दूर जाने लगा था। उधर, बसपा अपने दलित वोट को एकजुट करने के लिए मैदान में है और कांग्रेस भीम आर्मी के जरिए सेंधमारी की कवायद में है। मगर, अब जब देश के सर्वोच्च पद के लिए भाजपा दलित चेहरे को सामने ला रही है तो भीम आर्मी और विपक्षी दलों की मेहनत पर जरूर पानी फिर सकता है।
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शशांक मिश्र
सहारनपुर। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ महीने से जातीय हिंसा की घटनाओं के बाद गर्माए सियासी माहौल में दलित राजनीति एक बड़ा मुद्दा बन गई है। भाजपा को भी विधान सभा चुनाव में मिला दलित वोट खिसकता नजर आ रहा था। ऐसे माहौल में राष्ट्रपति पद पर दलित चेहरा सामने लाकर भाजपा ने ऐसा दांव खेला है, जिससे विपक्ष के दलित एजेंडे और भीम आर्मी की धार कुंद होगी, साथ ही जातीय हिंसा की घटनाओं के बाद नाराज चल रहे दलितों की नाराजगी भी कुछ हद तक दूर होगी। हालांकि यह देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का सबसे बड़ा चुनाव है मगर, इससे छनकर आने वाला संदेश दलितों तक जरूर पहुंचेगा और इसका फायदा भी भाजपा को मिलेगा।
दलित समाज के बुद्धिजीवी भी भाजपा की इस पहल को सराह रहे हैं।
सहारनपुर से निकली जातीय हिंसा की लपटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ हरियाणा और पंजाब तक पहुंचने लगी हैं। सहारनपुर में हुए उपद्रव के बाद भाजपा के पाले से दलित मत खिसकता भी दिखाई दे रहा था। अलग-अलग जगहों पर राजनीतिक दल भीम आर्मी और अन्य संगठनों की मदद से दलितों में सेंधमारी की कोशिश में जुट गए हैं। अब भाजपा ने देश के सबसे बड़ेे संवैधानिक राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को प्रत्याशी चुना है। हालांकि इस चुनाव से आम जनता का सीधा संबंध नहीं है, बावजूद इसके भाजपा के इस चेहरे से दलितों की सहानुभूति जरूर आएगी। इससे सहारनपुर सहित वेस्ट यूपी में जातीय हिंसा से भाजपा को हो रहे नुकसान की भरपाई की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
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दलित बहुल क्षेत्र होने के कारण सहारनपुर बसपा का मजबूत गढ़ रह है और सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर बसपा ने वेस्ट यूपी में अपनी पैठ बना ली थी। हिंदुत्व एजेंडे के साथ मैदान में डटी भाजपा को लोकसभा के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में बंपर सफलता मिली। दलित मतों में जबरदस्त सेंधमारी के चलते उसे उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली। मगर, सहारनपुर में पिछले दो महीने में हुई जातीय हिंसा की घटनाओं से पूूरे देश में भाजपा के खिलाफ दलितों में माहौल बनने लगा था। सहारनपुर की भीम आर्मी को हिंसा का मुख्य आरोपी बनाए जाने के बाद दलित भाजपा से दूर जाने लगा था। उधर, बसपा अपने दलित वोट को एकजुट करने के लिए मैदान में है और कांग्रेस भीम आर्मी के जरिए सेंधमारी की कवायद में है। मगर, अब जब देश के सर्वोच्च पद के लिए भाजपा दलित चेहरे को सामने ला रही है तो भीम आर्मी और विपक्षी दलों की मेहनत पर जरूर पानी फिर सकता है।
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