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दारुल उलूम सरकारी अनुदान न लेने के पुराने रुख पर कायम: मोहतमिम
Updated Sat, 17 Mar 2018 12:32 AM IST
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देवबंद (सहारनपुर)। दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी बनारसी ने कहा कि दारुल उलूम आज भी अपने पुराने रुख पर कायम है कि वो या उससे संबंधित जितने भी दीनी मदारिस हैं वो सरकारी अनुदान नहीं लेंगे।
शुक्रवार को मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि दारुल उलूम का सरकारी अनुदान लेने का कोई नया प्रस्ताव नहीं है बल्कि पुराने प्रस्ताव को ताजा किया गया है। इससे पहले भी वो कह चुके हैं कि उन्हें दीनी इदारों के लिए सरकारी अनुदान की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि संस्था की आठ बुनियादी चीजों में ये शामिल है कि किसी भी सरकार से अनुदान नहीं लिया जाएगा और इस पर दारुल उलूम आज भी कायम है। कहा कि सरकार किसी भी दल की आई हो, लेकिन इस मामले में उनका रुख स्पष्ट रहा है कि दारुल उलूम और उससे संबंधित मदरसों को सरकारी मद्द की जरुरत नहीं है। मौलाना नोमानी ने कहा कि दीनी इदारे जनता के अनुदान और चंदे पर चलते हैं। जो मदरसे सरकारी मद्द ले रहे हैं उनके अधिकार पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं अब जो सरकार चाहेंगी उन्हें उसी तरह से मदरसों के निजाम को चलेना होगा। सरकारी मद्द लेने से मदरसों की स्वतंत्रता खत्म हो रही है। बता दें कि दारुल उलूम में 12 मार्च को हुए राब्ता-ए-मदारिस-ए-इस्लामिया अरबिया के इजलास में देश के कोने कोने से पहुंचे हजारों प्रमुख उलमा ने सर्वसम्मति से मदरसों को सरकारी अनुदान न लिए जाने का प्रस्ताव भी पारित किया था। जिसके बाद इसे लेकर बहस छिड़ी हुई है।
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शुक्रवार को मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि दारुल उलूम का सरकारी अनुदान लेने का कोई नया प्रस्ताव नहीं है बल्कि पुराने प्रस्ताव को ताजा किया गया है। इससे पहले भी वो कह चुके हैं कि उन्हें दीनी इदारों के लिए सरकारी अनुदान की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि संस्था की आठ बुनियादी चीजों में ये शामिल है कि किसी भी सरकार से अनुदान नहीं लिया जाएगा और इस पर दारुल उलूम आज भी कायम है। कहा कि सरकार किसी भी दल की आई हो, लेकिन इस मामले में उनका रुख स्पष्ट रहा है कि दारुल उलूम और उससे संबंधित मदरसों को सरकारी मद्द की जरुरत नहीं है। मौलाना नोमानी ने कहा कि दीनी इदारे जनता के अनुदान और चंदे पर चलते हैं। जो मदरसे सरकारी मद्द ले रहे हैं उनके अधिकार पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं अब जो सरकार चाहेंगी उन्हें उसी तरह से मदरसों के निजाम को चलेना होगा। सरकारी मद्द लेने से मदरसों की स्वतंत्रता खत्म हो रही है। बता दें कि दारुल उलूम में 12 मार्च को हुए राब्ता-ए-मदारिस-ए-इस्लामिया अरबिया के इजलास में देश के कोने कोने से पहुंचे हजारों प्रमुख उलमा ने सर्वसम्मति से मदरसों को सरकारी अनुदान न लिए जाने का प्रस्ताव भी पारित किया था। जिसके बाद इसे लेकर बहस छिड़ी हुई है।
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