{"_id":"6acd40ab6f90c825a00abe1e","slug":"the-mirror-shattered-and-you-didnt-even-notice-raebareli-news-c-101-1-slko1034-169721-2026-10-13","type":"story","status":"publish","title_hn":"Raebareli News: आइना टूट गया, आपने देखा भी नहीं...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Raebareli News: आइना टूट गया, आपने देखा भी नहीं...
Tue, 13 Oct 2026 01:48 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रायबरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, रायबरेली
Updated Tue, 13 Oct 2026 01:48 AM IST
विज्ञापन
रायबरेली। इदार-ए-एहबाब के तत्वावधान में रविवार देर शाम गुलाब रोड स्थित एक लॉन में गोष्ठी का आयोजन किया गया। पहले चरण में डॉ. मोहम्मद जाहिद ने त्रैमासिक पत्रिका इंतेखाब इंटरनेशनल के अनवर नदीम अल्वी विशेषांक का विमोचन बाबू कृष्णानंद श्रीवास्तव ‘अदीब’ से कराया। दूसरे चरण में कवियों और शायरों ने ‘आइना टूट गया, आपने देखा भी नहीं’ पंक्ति पर आधारित रचनाएं प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
मुख्य अतिथि सईदुज्जमा नकवी ने पढ़ा, ‘सर पे है मां की दुआ, बाप की उम्मीदें हैं, मैं अकेला हूं मगर इतना अकेला भी नहीं।’ शायर हसन रायबरेलवी ने कहा, ‘अश्क आंखों से क्यों बहने लगे, बतलाएं, आपका हाल तो मैंने अभी पूछा भी नहीं।’ शिव बहादुर सिंह दिलबर ने सुनाया, ‘दम तो भरता है सदा खूब वो अपनेपन का, साथ अपनों के सुना है कि वो रहता भी नहीं।’
बाबू कृष्णानंद श्रीवास्तव ने कहा, ‘ये नजाकत है कोई तोहमत-ए-बेजा भी नहीं, हुस्न अपना ही कभी आपने देखा भी नहीं।’ गोष्ठी का संचालन कर रहे मोहम्मद लईक अंसारी ने पढ़ा, ‘कितना दुश्वार सा लगता है सफर सांसों का, कब ठहर जाए कोई, इसका भरोसा भी नहीं।’ हसन अब्बास जायसी ने अपनी रचना में कहा, ‘कुछ गलत भी तो नहीं, बात ये बेजा भी नहीं, आदमी तुझसे तो अफजल ये फरिश्ता भी नहीं।’
विज्ञापन
आगा जायसी ने गजल के पारंपरिक अंदाज में कहा, ‘छोड़कर अब दरे-जानां को कहां जाऊं मैं, दरे-जानां के सिवा कोई ठिकाना भी नहीं।’ राघवेंद्र सिंह राघव ने व्यंग्यात्मक अंदाज में सुनाया, ‘सोचता हूं कि वो रहता है क्यों नाराज भला, इतने नाराज तो रहते मेरे फूफा भी नहीं।’ शब्बीर अहमद सूरी अमेठवी ने कहा, ‘तुझको पाने के लिए खाई है ठोकर दर-दर, तू मेरे दिल में रहा, मैंने तो देखा भी नहीं।’ हफीज अमेठवी ने पढ़ा, ‘पास आया भी नहीं, दिल में बसाया भी नहीं, उम्र भर साथ रहे, अपना बनाया भी नहीं।’
रमजान अली सफीर ने सुनाया, ‘ख्वाब आंखों के सफीर आज बड़े महंगे हैं, इसकी ताबीर मगर अब मैं बताता भी नहीं।’ साहिल रायबरेलवी ने कहा, ‘राहबर तुमको बनाया था भरोसा करके, इस तरह काफिला लुट जाएगा, सोचा भी नहीं।’ नूरजहां खान ने अपनी रचना में कहा, ‘तूने ये कत्ल किया है या करामात बता, आस्तीनों पे तेरी खून का धब्बा भी नहीं।’
कार्यक्रम में आफाक सुल्तानपुरी, राज बहादुर राज, हिदायत उल्ला शौक, गोहर सुल्तानपुरी और नजर रायबरेलवी ने भी काव्यपाठ किया। इस मौके पर आमिर सिकंदर नसीराबादी, अबरार अहमद जायसी, तौहीद हुनर सुल्तानपुरी, इसरार अहमद और मोहम्मद अकबर खां मौजूद रहे। अंत में शिशिर श्रीवास्तव ने सभी के प्रति आभार जताया।
विज्ञापन
मुख्य अतिथि सईदुज्जमा नकवी ने पढ़ा, ‘सर पे है मां की दुआ, बाप की उम्मीदें हैं, मैं अकेला हूं मगर इतना अकेला भी नहीं।’ शायर हसन रायबरेलवी ने कहा, ‘अश्क आंखों से क्यों बहने लगे, बतलाएं, आपका हाल तो मैंने अभी पूछा भी नहीं।’ शिव बहादुर सिंह दिलबर ने सुनाया, ‘दम तो भरता है सदा खूब वो अपनेपन का, साथ अपनों के सुना है कि वो रहता भी नहीं।’
विज्ञापन
बाबू कृष्णानंद श्रीवास्तव ने कहा, ‘ये नजाकत है कोई तोहमत-ए-बेजा भी नहीं, हुस्न अपना ही कभी आपने देखा भी नहीं।’ गोष्ठी का संचालन कर रहे मोहम्मद लईक अंसारी ने पढ़ा, ‘कितना दुश्वार सा लगता है सफर सांसों का, कब ठहर जाए कोई, इसका भरोसा भी नहीं।’ हसन अब्बास जायसी ने अपनी रचना में कहा, ‘कुछ गलत भी तो नहीं, बात ये बेजा भी नहीं, आदमी तुझसे तो अफजल ये फरिश्ता भी नहीं।’
विज्ञापन
आगा जायसी ने गजल के पारंपरिक अंदाज में कहा, ‘छोड़कर अब दरे-जानां को कहां जाऊं मैं, दरे-जानां के सिवा कोई ठिकाना भी नहीं।’ राघवेंद्र सिंह राघव ने व्यंग्यात्मक अंदाज में सुनाया, ‘सोचता हूं कि वो रहता है क्यों नाराज भला, इतने नाराज तो रहते मेरे फूफा भी नहीं।’ शब्बीर अहमद सूरी अमेठवी ने कहा, ‘तुझको पाने के लिए खाई है ठोकर दर-दर, तू मेरे दिल में रहा, मैंने तो देखा भी नहीं।’ हफीज अमेठवी ने पढ़ा, ‘पास आया भी नहीं, दिल में बसाया भी नहीं, उम्र भर साथ रहे, अपना बनाया भी नहीं।’
रमजान अली सफीर ने सुनाया, ‘ख्वाब आंखों के सफीर आज बड़े महंगे हैं, इसकी ताबीर मगर अब मैं बताता भी नहीं।’ साहिल रायबरेलवी ने कहा, ‘राहबर तुमको बनाया था भरोसा करके, इस तरह काफिला लुट जाएगा, सोचा भी नहीं।’ नूरजहां खान ने अपनी रचना में कहा, ‘तूने ये कत्ल किया है या करामात बता, आस्तीनों पे तेरी खून का धब्बा भी नहीं।’
कार्यक्रम में आफाक सुल्तानपुरी, राज बहादुर राज, हिदायत उल्ला शौक, गोहर सुल्तानपुरी और नजर रायबरेलवी ने भी काव्यपाठ किया। इस मौके पर आमिर सिकंदर नसीराबादी, अबरार अहमद जायसी, तौहीद हुनर सुल्तानपुरी, इसरार अहमद और मोहम्मद अकबर खां मौजूद रहे। अंत में शिशिर श्रीवास्तव ने सभी के प्रति आभार जताया।