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216 गांवों में मनरेगा ठप, 27 हजार को ही मिला रोजगार
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रायबरेली। जिले में मनरेगा बदहाल हो रही है। 988 ग्राम पंचायतों में बुधवार को 772 गांवों के ही श्रमिकों को रोजगार दिया गया। 216 गांवों में श्रमिक खाली रहे। बुधवार को काम पर महज 27,818 श्रमिक ही लगाए गए।
समय से मजदूरी का भुगतान न मिलने व अन्य खामियों के कारण श्रमिकों का मनरेगा से मोह भंग हो रहा है। ब्लॉकों के अधिकारियों और कर्मचारियों की सुस्ती के कारण श्रमिकों को काम नहीं मिल रहा है।
गांवों से श्रमिकों के पलायन को रोकने के लिए मनरेगा संचालित की गई थी। सभी श्रमिकों को गांवों में ही सौ-सौ दिन का रोजगार देने की मंशा थी, लेकिन सीधे-धीरे मनरेगा से श्रमिकों का मोह भंग हो रहा है।
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श्रमिकों को मनरेगा की तुलना में बाहर ज्यादा मजदूरी भी मिल रही है और समय से भुगतान भी मिल रहा है, लेकिन मनरेगा में काम करने के बाद श्रमिकों को मजदूरी के भुगतान के लिए भटकना पड़ता है। इसी कारण मनरेगा का काम प्रभावित हो रहा है।
पिछले साल एक-एक दिन में एक लाख से अधिक श्रमिकों को काम दिया गया, लेकिन बुधवार को 27,818 श्रमिक ही काम पर लगाए गए। पिछले एक सप्ताह ये यह संख्या 30 हजार के पार नहीं पहुंच सकी। ब्लॉकों के अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही के कारण श्रमिकों को रोजगार के लिए भटकना पड़ रहा है।
इन ब्लॉकों के गांवों में सबसे कम काम
ब्लॉक कुल पंचायतें इन पंचायतों में काम
अमावां 55 37
डलमऊ 76 60
ऊंचाहार 54 35
सरेनी 81 57
राही 73 53
खीरों 60 40
हरचंदपुर 56 45
जगतपुर 39 25
छतोह 44 36
सतांव 50 39
शिवगढ़ 43 24
14 लाख मजदूरी व तीन करोड़ सामग्री का भुगतान अटका
मनरेगा में श्रमिकों को मजदूरी तो सामग्री की आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों का समय से भुगतान नहीं मिल पा रहा है। पिछले महीने तक स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन जुलाई माह में भुगतान में तेजी आई है। इसके बाद भी 14 लाख से अधिक मजदूरी और तीन करोड़ से अधिक सामग्री का भुगतान बाकी है। समय से भुगतान न मिल पाने के कारण गांवों में श्रमिकों का मनरेगा से मोह भंग हो रहा है।
श्रमिकों को भुगतान कराया जा रहा है। सभी बीडीओ को सभी गांवों में मनरेगा का काम शुरू कराने के आदेश दिए गए हैं। अधिक से अधिक श्रमिकों को गांव में भी रोजगार भी देने के आदेश दिए गए हैं।
जीपी कुशवाहा, उपायुक्त (मनरेगा)
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समय से मजदूरी का भुगतान न मिलने व अन्य खामियों के कारण श्रमिकों का मनरेगा से मोह भंग हो रहा है। ब्लॉकों के अधिकारियों और कर्मचारियों की सुस्ती के कारण श्रमिकों को काम नहीं मिल रहा है।
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गांवों से श्रमिकों के पलायन को रोकने के लिए मनरेगा संचालित की गई थी। सभी श्रमिकों को गांवों में ही सौ-सौ दिन का रोजगार देने की मंशा थी, लेकिन सीधे-धीरे मनरेगा से श्रमिकों का मोह भंग हो रहा है।
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श्रमिकों को मनरेगा की तुलना में बाहर ज्यादा मजदूरी भी मिल रही है और समय से भुगतान भी मिल रहा है, लेकिन मनरेगा में काम करने के बाद श्रमिकों को मजदूरी के भुगतान के लिए भटकना पड़ता है। इसी कारण मनरेगा का काम प्रभावित हो रहा है।
पिछले साल एक-एक दिन में एक लाख से अधिक श्रमिकों को काम दिया गया, लेकिन बुधवार को 27,818 श्रमिक ही काम पर लगाए गए। पिछले एक सप्ताह ये यह संख्या 30 हजार के पार नहीं पहुंच सकी। ब्लॉकों के अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही के कारण श्रमिकों को रोजगार के लिए भटकना पड़ रहा है।
इन ब्लॉकों के गांवों में सबसे कम काम
ब्लॉक कुल पंचायतें इन पंचायतों में काम
अमावां 55 37
डलमऊ 76 60
ऊंचाहार 54 35
सरेनी 81 57
राही 73 53
खीरों 60 40
हरचंदपुर 56 45
जगतपुर 39 25
छतोह 44 36
सतांव 50 39
शिवगढ़ 43 24
14 लाख मजदूरी व तीन करोड़ सामग्री का भुगतान अटका
मनरेगा में श्रमिकों को मजदूरी तो सामग्री की आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों का समय से भुगतान नहीं मिल पा रहा है। पिछले महीने तक स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन जुलाई माह में भुगतान में तेजी आई है। इसके बाद भी 14 लाख से अधिक मजदूरी और तीन करोड़ से अधिक सामग्री का भुगतान बाकी है। समय से भुगतान न मिल पाने के कारण गांवों में श्रमिकों का मनरेगा से मोह भंग हो रहा है।
श्रमिकों को भुगतान कराया जा रहा है। सभी बीडीओ को सभी गांवों में मनरेगा का काम शुरू कराने के आदेश दिए गए हैं। अधिक से अधिक श्रमिकों को गांव में भी रोजगार भी देने के आदेश दिए गए हैं।
जीपी कुशवाहा, उपायुक्त (मनरेगा)