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नहाय-खाय से आज शुरू होगा छठ पर्व
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़।
Updated Thu, 03 Nov 2016 11:41 PM IST
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नगर के पुरानी कोतवाली स्थीत शिव मंदिर में भैया दूज की पूजा करती महिलायें।
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मनोकामना की सिद्धि और सूर्य के देवता के आशीर्वाद की कामना के लिए मनाया जाने वाले डाला छठ पूजन पर्व की शुरुआत शुक्रवार से होगी। इस दिन व्रती महिलाएं दिन में एक बार लहसुन और प्याज रहित शुद्ध भोजन से इसकी शुरुआत करेंगी। इसी के साथ ही तीन दिन तक चलने वाले डाला छठ पूजन की शुरुआत हो जाएगी। सात नवंबर की सुबह पूजा समाप्त होगी।
सुख संपत्ति के साथ ही परिवार पर सूर्यदेव की कृपा बनी रहे इसलिये डाला छठ पूजन की परंपरा चली आ रही है। इसको रवि पष्ठी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सप्तमी युक्त होने पर सर्व मनोरथ सिद्धि के लिये महिलाएं यह व्रत रखती हैं। पंचमी के दिन नियम से व्रत रहकर सायंकाल में खीर का भोजन करके व्रतधारी महिलाओं को पृथ्वी पर सोना चाहिए। छठ के दिन व्रत रहें। दिन में चार रंगों से सुशोभित मंडप में सूर्य नारायण का पूजन करें और रात्र में जागरण करें। अनेक प्रकार के फल और पकवान आदि का नैवेद्य लगावें। डाला छठ का अभिप्राय: कलसूप या सूप से है।
इसमें गन्ना, फल, चुनरी, नारियल, कदलीफल चंदन इत्यादि रखकर उसको हाथ में लेकर महिलाएं नदी के पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देती हैं। तीन दिन चलने वाले डाला छठ पर्व की शुरुआत शुक्रवार से महिलाएं करेंगी। व्रतधारण करने वाली महिलाएं इस दिन तड़के स्नान करके सूर्य देव को अर्घ्य देंगी। उसके बाद लकड़ी की आंच पर पका हुआ शुद्ध भोजन जो बिना लहसुन प्याज का होगा। इसीलिए इस दिन को नहाय-खाय भी कहते हैं।
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अव्यवस्था के बीच होगी पूजा
डाला छठ पूजन का त्योहार अव्यवस्था के बीच सई नदी घाट पर मनाया जाएगा। घाट के चारों तरफ भीषण गंदगी फैली हुई है। जगह-जगह कूड़ा-करकट का ढेर लगा हुआ है। तमाम प्रयासों के बाद भी लोग नदी में गंदगी डालने से बाज नहीं आ रहे हैं। गुरुवार को घाट की पड़ताल में इस तरह की अव्यवस्था देखने को मिली।
डाला छठ पूजन में केवल एक दिन ही शेष है। मगर अभी तक सई नदी घाट की सफाई नहीं हो पाई। इसी घाट पर छह और सात नवंबर को सुबह से शाम तक छठ पूजन की धूम रहेगी। इस मौके पर सैकड़ों की संख्या में व्रतधारी महिलाएं और श्रद्धालु जुटेंगे। नदी के पानी में घंटों खड़े रहकर महिलाएं भगवान को सूर्य देव को अर्घ्य देंगी। सफाई के नाम पर घाट पर ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। अलबत्ता जगह-जगह गंदगी जरूर दिखी। जिस सई नदी को पवित्र मानकर उसके जल में खड़ी होकर महिलाएं अर्घ्य देंगी उसको नाले का पानी दूषित कर रहा है।
जिस पानी को पीने से जानवर भी परहेज करते हैं उसी पानी से अचमन किया जाऽगा। नेताओं और प्रशासन के उदासीन रवैया के चलते नदी का पानी शुद्ध नहीं हो सका। घाट पर गंदगी फैली हुई है। बता दें कि बेल्हादेवी घाट पर कोई न कोई धार्मिक आयोजन होता ही रहता है। इस मौके पर पौराणिक नदी सई के जल का भी प्रयोग पूजा पाठ में किया जाता है। उसके बाद भी स्वच्छ रखने का कोई प्रयास नहीं दिख रहा है।
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सुख संपत्ति के साथ ही परिवार पर सूर्यदेव की कृपा बनी रहे इसलिये डाला छठ पूजन की परंपरा चली आ रही है। इसको रवि पष्ठी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सप्तमी युक्त होने पर सर्व मनोरथ सिद्धि के लिये महिलाएं यह व्रत रखती हैं। पंचमी के दिन नियम से व्रत रहकर सायंकाल में खीर का भोजन करके व्रतधारी महिलाओं को पृथ्वी पर सोना चाहिए। छठ के दिन व्रत रहें। दिन में चार रंगों से सुशोभित मंडप में सूर्य नारायण का पूजन करें और रात्र में जागरण करें। अनेक प्रकार के फल और पकवान आदि का नैवेद्य लगावें। डाला छठ का अभिप्राय: कलसूप या सूप से है।
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इसमें गन्ना, फल, चुनरी, नारियल, कदलीफल चंदन इत्यादि रखकर उसको हाथ में लेकर महिलाएं नदी के पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देती हैं। तीन दिन चलने वाले डाला छठ पर्व की शुरुआत शुक्रवार से महिलाएं करेंगी। व्रतधारण करने वाली महिलाएं इस दिन तड़के स्नान करके सूर्य देव को अर्घ्य देंगी। उसके बाद लकड़ी की आंच पर पका हुआ शुद्ध भोजन जो बिना लहसुन प्याज का होगा। इसीलिए इस दिन को नहाय-खाय भी कहते हैं।
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अव्यवस्था के बीच होगी पूजा
डाला छठ पूजन का त्योहार अव्यवस्था के बीच सई नदी घाट पर मनाया जाएगा। घाट के चारों तरफ भीषण गंदगी फैली हुई है। जगह-जगह कूड़ा-करकट का ढेर लगा हुआ है। तमाम प्रयासों के बाद भी लोग नदी में गंदगी डालने से बाज नहीं आ रहे हैं। गुरुवार को घाट की पड़ताल में इस तरह की अव्यवस्था देखने को मिली।
डाला छठ पूजन में केवल एक दिन ही शेष है। मगर अभी तक सई नदी घाट की सफाई नहीं हो पाई। इसी घाट पर छह और सात नवंबर को सुबह से शाम तक छठ पूजन की धूम रहेगी। इस मौके पर सैकड़ों की संख्या में व्रतधारी महिलाएं और श्रद्धालु जुटेंगे। नदी के पानी में घंटों खड़े रहकर महिलाएं भगवान को सूर्य देव को अर्घ्य देंगी। सफाई के नाम पर घाट पर ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। अलबत्ता जगह-जगह गंदगी जरूर दिखी। जिस सई नदी को पवित्र मानकर उसके जल में खड़ी होकर महिलाएं अर्घ्य देंगी उसको नाले का पानी दूषित कर रहा है।
जिस पानी को पीने से जानवर भी परहेज करते हैं उसी पानी से अचमन किया जाऽगा। नेताओं और प्रशासन के उदासीन रवैया के चलते नदी का पानी शुद्ध नहीं हो सका। घाट पर गंदगी फैली हुई है। बता दें कि बेल्हादेवी घाट पर कोई न कोई धार्मिक आयोजन होता ही रहता है। इस मौके पर पौराणिक नदी सई के जल का भी प्रयोग पूजा पाठ में किया जाता है। उसके बाद भी स्वच्छ रखने का कोई प्रयास नहीं दिख रहा है।