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पत्नी, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण व्यक्ति का पवित्र कर्तव्य : हाईकोर्ट

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 30 Oct 2026 01:19 AM IST
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Providing maintenance for one's wife, children, and elderly parents is a sacred duty: High Court
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण पोषण से जुड़े मामले में मनुस्मृति के अध्याय 11 के श्लोक 10 का हवाला दिया। कहा कि पत्नी, नाबालिग बच्चों और आर्थिक रूप से असमर्थ बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण करना किसी भी व्यक्ति का पवित्र कर्तव्य है। इसे केवल महज कानूनी जिम्मेदारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने पत्नी की ओर से भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग वाली पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया। कानपुर नगर की फैमिली कोर्ट की ओर से निर्धारित भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग की गई थी।
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पत्नी ने की थी भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग
मामला कानपुर नगर का है। परिवार न्यायालय ने पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए 19 हजार रुपये प्रतिमाह निर्धारित किए थे। पत्नी ने इस राशि को बढ़ाकर 40 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। दावा किया कि पति उन्नाव जिले में इंडियन बैंक में विंडो ऑपरेटर के पद पर कार्यरत है। लिहाजा, वह पति की आय के आधार पर भरण पोषण पाने की अधिकारी है।
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वहीं, पति की ओर से बैंक के कर्ज का हवाला देते हुए भरण पोषण राशि बढ़ाने की मांग का विरोध किया गया। पति के वकील ने दलील दी कि याची पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए अपने वेतन का 25 प्रतिशत राशि कटवाने को तैयार है।
आय के आधार पर भरण-पोषण तय करने पर जोर
अदालत ने स्पष्ट किया कि परिवार के आश्रित सदस्यों की देखभाल को केवल कानूनी औपचारिकता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पत्नी, छोटे बच्चों और आर्थिक रूप से निर्भर बुजुर्ग माता-पिता की आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी इस जिम्मेदारी का हिस्सा है। अदालत ने भरण-पोषण के निर्धारण के संबंध में पति की आय को ध्यान में रखते हुए निर्देश दिया कि उसके सकल वेतन में से आयकर घटाने के बाद बची राशि का 25 प्रतिशत पत्नी के सत्यापित बैंक खाते में जमा किया जाए।


सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी किया उल्लेख
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के अंजू गर्ग एवं अन्य बनाम दीपक कुमार गर्ग मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। कहा कि भरण-पोषण से जुड़े मामलों में संबंधित पक्षों की आर्थिक स्थिति और आश्रितों की जरूरतों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होता है।


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