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भारत-चीन 1962 युद्ध के दौरान बढ़ गई थी रेडियो की डिमांड, डाकघर में कराना होता था पंजीकरण

Sun, 21 Jun 2020 04:30 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़ Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 21 Jun 2020 04:30 PM IST
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India China 1962 War: During the Indo-China War, The Demand For Radio had Increased
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : ट्विटर
आज की तरह 1962 में संचार के संसाधन नहीं थे। घटनाओं की तुरंत जानकारी कई दिनों बाद मिल पाती थी। देश दुनिया की जानकारी शहरियों व ग्रामीणों को रेडियो से हुआ करती थी। 1962 में भारत-चीन युद्ध के हालात जानने के लिए हर कोई परेशान रहता था। वहां क्या हो रहा है।
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देश के सैनिक कैसे चीनी सैनिकों का मुकाबला कर रहे हैं। वहां के हालात क्या हैं। इस युद्ध का हाल जानने के लिए रेडियो की डिमांड बढ़ गई थी। शहर में रेडियो की दो गिनी-चुनी दुकानें थीं। जहां रेडियो एक सप्ताह के भीतर रेडियो का स्टाक खत्म हो गया था।
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India China 1962 War: During the Indo-China War, The Demand For Radio had Increased
भारत चीन वॉर - फोटो : self
15 दिन तक लोगों को रेडियो खरीदने का इंतजार करना पड़ा था। गांव में रेडियो रखने वाले के घर समाचार सुनने के लिए लोगों की भीड़ जुटती थी। रेडियो व रेडुआ की कीमत 50 से लेकर 150 रुपये हुआ करती थी।

भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना में जिले के भी सैकड़ों सैनिक सरहदों पर तैनात थे। देश दुनिया में होने वाली गतिविधियों के साथ ही भारत-चाइना युद्ध का हाल जानने के लिए लोग रेडियो पर समाचार सुना करते थे। व्यापारी राजेंद्र अग्रवाल के अनुसार शहर में 1962 के दौरान रेडियो की केवल दो दुकानें हुआ करती थी।
निर्मल तिराहे पर सेठ धर्मदेव अग्रवाल की तो दूसरी पंजाबी मार्केट में जाफरी की।

 

India China 1962 War: During the Indo-China War, The Demand For Radio had Increased
indian china war 1962
सेठ धर्मदेव की दुकान पर मरफी तो अहमद सुहैल जाफरी की दुकान पर फिलिप्स कंपनी का रेडियो व रेडुआ मिलता था। राजेंद्र अग्रवाल उर्फ राजू ने बताया कि उस समय रेडियो व रेडुआ 50 से लेकर 150 रुपये के बीच बिकता था। जिसे लेने के लिए गांव से चार पांच लोग आया करते थे।

रेडियो खरीदने के बाद तीन रसीद कटती थी। एक रसीद स्टेशन रोड स्थित डाकघर जाती थी। जहां रेडियो का पंजीकरण होता था। बिना पंजीकरण के रेडियो का प्रयोग पूरी तरह वर्जित था।

युद्ध का हाल जानने के लिए लोग रेडियो खरीद रहे थे। एक सप्ताह में ही स्टाक समाप्त हो गया था। पंद्रह दिन बाद रेडियो का स्टाक आने पर लोगों की भीड़ लग गई। चूंकि बिना पंजीकरण के बिक्री मना थी। इसलिए लोगों को रेडियो लेने के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाना पड़ता रहा। 


 
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रेडियो को घुमा-घुमाकर पकड़ाते थे सिग्नल

रानीगंज तहसील क्षेत्र के भटपुरवा निवासी राजेंद्र मिश्र बताते हैं कि भारत-चीन युद्ध के हालात जानने के लिए दो चार गांव के लोग एक जगह एकत्र होते थे। अममून चौपाल वाले स्थानों पर ही लोग रेडियो लेकर पहुंच जाते थे। जहां समाचार प्रारंभ होने के पहले से ही रेडियो को घुमाकर सिग्नल पकड़ाया जाता था। बीच में रेडियो रखा जाता था।

 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

युद्ध का हाल जानने को जुटते थे ग्रामीण

बेलखरनाथ धाम विकासखंड के ओझला निवासी बृजेश बहादुर सिंह यूपी पुलिस से सेवानिवृत्त हैं। 95 वर्षीय बृजेश सिंह बताते हैं कि भारत-चाइना युद्ध के दौरान बरगद के पेड़ के नीचे युवक शाम को अलाव की लकड़ी एकत्र कर देते थे। शाम होते ही रात आठ बजे समाचार की बुलेटिन सुनने के लोग बहुत से लोग आ जाते थे। समाचार सुनने के दौरान सन्नाटा पसर जाता था।

 

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वह बताते हैं कि जब समाचार सुनते हुए यह पता चलता था कि देश का सैनिक शहीद हुआ है तो लोगों की आंखों से आंसू निकल आते थे और लोग जोश में आ जाते थे। जैसे ही समाचार का बुलेटिन समाप्त होता। जोश से लबरेज लोग सीमा पर जाकर जंग लडने की बातें करने लगते थे। तीन समय बुलेटिन सुनने के लिए लोग बरगदहा बाबा के घर के सामने स्थित बरगद के पेड़ के नीचे जुटते थे।
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