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धूल फांक रही किसान आंदोलन की जमीन

Wed, 13 Jul 2016 12:07 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़ Updated Wed, 13 Jul 2016 12:07 AM IST
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mudda belha ki virasat ka 10
mudda belha ki virasat ka
अंग्रेजों द्वारा वसूली जाने वाली लगाने के विरोध में जिस जमीन से किसानों ने बगावत का बिगुल फूंका वहीं उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। फिरंगियों की लगान का विरोध करने के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर देने वाले वीर सपूतों की याद में स्मारक तो बनवा दिया गया, लेकिन कभी किसी ने उसे सहेजने और संवारने की जरूरत नहीं समझी। यह स्थल धूल फांक रहा है। स्मारक छुट्टा पशुओं के चारागाह बन गया है।
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पट्टी से ही अवध किसान आंदोलन की शुरुआत हुई थी और उसके प्रणेता बाबा रामचंदर महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण थे जिन्होंने रूर आकर ठाकुर झिगुंरी सिंह व सहदेव जैसे किसानों के जरिए आंदोलन को गति दी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत यहीं से की थी। अंग्रेजों द्वारा जिले में लगान वृद्धि व उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर किसानों के एक आंदोलन चलाया। आंदोलन को गति देने के लिए फरवरी 1918 में किसान सभा का गठन किया गया। आगे चलकर 1919 के अंतिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया। अवध की तालुकेदारी में पंचायतों के नेतृत्व में किसान बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया।
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इसमें ठाकुर झिंगुरी सिंह, दुर्गपाल सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन जल्द ही एक चेहरे के रूप में बाबा रामचंद्र उभर का सामने आ गए। प्रदेश के किसान आंदोलन को 1920 के दशक में सर्वाधिक मजबूती बाबा रामचंदर ने प्रदान की। उनके व्यक्तिगत प्रयासों से ही 17 अक्टूबर 1920 को प्रतापगढ़ जिले में अवध किसान सभा का गठन किया गया। जिले का रूर गांव किसान सभा की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। इस संगठन को जवाहर लाल नेहरू, गौरी शंकर मिश्र, माता बदल पांडेय व केदारनाथ आदि नेताओं ने अपने सहयोग से शक्ति प्रदान की थी। किसान आंदोलन के नाम पर रूर गांव में बनवाया गया स्मारक मिटने के कगार पर है। बाउंड्रीवाल ढह चुकी है। स्मारक पर धूल पड़ी है और वहां झाड़ झंखाड़ उगा है।
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फिजी से आए थे बाबा रामचंदर
अवध किसान आंदोलन के नायक बाबा रामचंदर का असली नाम श्रीधर बलवंत था। वह 1915 में फिजी में गिरमिटिया मजदूर के रूप में गए थे जहां उन्होंने मजदूरों की प्रताड़ना पर संगठन खड़ा कर दिया। जिस पर उन्हें कोलकाता भेजा गया। वहां से वह भटकते हुए भाउपुर गांव आ गए और ठाकुर झिंगुरी सिंह से मुलाकात हुई। उनके मिलते ही यह संगठन तेजी से आगे बढ़ गया।
जय सीता राम के नारे में उमड़ता था किसानों का समूह
किसानों को एक सूत्र में पिरोने और इकठ्ठा करने के लिए बाबा रामचंदर ने अनोखा तरीका निकाला था। किसानों को इकठ्ठा करने के लिए जय जय श्रीराम व जय श्री सीताराम का नारा लगाया जाता था। जिससे यह स्पष्ट हो जाता था कि अब किसानों को इकठ्ठा होना है। एक गांव का किसान आवाज लगाता जो हर गांव के जरिए आगे बढ़ती जाती थी। अकेले इस नारे से ही कुछ ही क्षणों में हजारों किसान इकठ्ठा हो जाते थे।

बाबा रामचंदर से मिलने पैदल गए थे पंडित नेहरू
बाबा रामचंदर व पंडित जवाहर लाल नेहरू की मुलाकात संगम में हुई थी। बाबा रामचंदर से प्रभावित होकर वह पैदल रूर गांव आए थे। यहां पर उन्होंने किसानों को संबोधित किया था। उनका भाषण अंग्रेजी में हो रहा था, जिसका अनुवाद बाबा रामचंदर हिंदी में कर किसानों को बता रहे थे।
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