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मंडी में आंवला की भरमार, फिर भ्ाी परेश्ाान हैं जिले में किसान

Sat, 05 Nov 2016 11:30 PM IST
प्रतापगढ़
प्रतापगढ़ Updated Sat, 05 Nov 2016 11:30 PM IST
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inspite of better crop, aanwla farmers is not happy
pratapgarh
भरपूर पैदावार के बाद भी आंवला किसान बिलख रहे हैं। उनकी उपज औने-पौने दाम पर जा रही है। खेत में लगे पेड़ों से टूटकर आंवला मंडी तो पहुंच गया, लेकिन खुली बोली नहीं लग रही। मजबूरन किसानों को औने-पौने दाम पर बेचना उनकी मजबूरी हो गई है। आंवला पहुंचने के बाद एक तरफ जहां मंडी समिति शुल्क वसूल रही है, वहीं वन विभाग भी आंवले को वन उपज बताकर वसूली करने में लगा है। शासन की ओर से आंवले की बिक्री के लिए कोई ठोस योजना न बनाए जाने से आंवला किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। उनकी लागत का मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। जबकि बिचौलिये मालामाल हो रहे हैं।
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जिले के आंवला किसानों को चपत लगाने में बिचौलियों की सक्रिय भूमिका होती है। आंवला के किसानों की गाढ़ी कमाई का पारिश्रमिक इनके ही द्वारा निर्धारित किया जाता है। साल भर किसान आंवले की फसल आने से लेकर उसके पकने तक मेहनत करते हैं। खाद, पानी और दवा डालकर उम्मीद में रहते हैं कि इस बार फसल लाभ दे जाएगी, मगर बिचौलिए उनकी मंशा पर पानी फेर देते हैं। फसल तैयार होते ही बिचौलिए कंपनियों के संपर्क में आ जाते हैं। इसके बाद मूल्य तय कर देते हैं। उनके तय किए गए मूल्य से ज्यादा कंपनियां देना नहीं चाहतीं। किसान भी फसल तैयार होने पर ज्यादा इंतजार नहीं कर पाते। इसके चलते उसका आंवला कंपनियों को कम रेट पर मिल जाता है। किसानों को पूर्ण पारिश्रमिक तो उसे नहीं मिल पाता लेकिन दलालों की कमाई एक मुश्त हो जाती है। इसके अलावा महुली मंडी में आंवला बेचने के लिए आने वाले किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। निर्धारित मंडी शुल्क किसानों से वसूला ही जाता है। वन विभाग भी आंवले को वन उपज बताते हुए 12 टन के लिए पांच हजार रुपये की रसीद काटता है।
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