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अजब दस्तूर, बांस के पुल से सफर को मजबूर
प्रतापगढ़ अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 28 Aug 2016 12:08 AM IST
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कहीं हवा में झूलते पुल, कहीं सिर्फ दो खंभों पर लटकते पुल। आम तौर छोटे से लेकर बड़े शहरों में यह नजारा आम है। पुलों के निर्माण में हर दिन नई तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। इसके विपरीत बेल्हा में कुछ पुल ऐसे हैं जो सोलहवीं सदी की याद ताजा कर देते हैं। जिले में तीन दर्जन से भी अधिक गांवों के लोग आज भी चहली (बांस के पट्टों और लकड़ी से तैयार पुल) के सहारे नदी पार करने के लिए मजबूर हैं। इनमें से कई गांव तो ऐसे हैं जहां जाने के लिए सिर्फ चहली ही सहारा है। दोनों तरफ से इन गांवों को नदियों ने घेर रखा है। वहां अब तक पक्के पुल का निर्माण नहीं
कराया जा सका।
कुछ गांवों के लोगों को राजमार्ग या फिर शहर आने के लिए अगर चहली न हो तो 20 किमी का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है। नतीजा यह कि ग्रामीण बरसात के दिनों में नदियों के उफनाने के बाद भारी मुसीबत झेलने के लिए मजबूर हैं। एक-दो जगहों पर चहली भी नदी के पानी में डूब गई है। अब लोग नाव से नदी पार कर रहे हैं।
शहर से मात्र दस 10 किमी की दूरी पर फैजाबाद-इलाहाबाद राजमार्ग पर स्थित राजगढ़ और कोट का पुरवा तिगनाइतपुर के बीच में बकुलाही नदी पड़ती है। हाईवे पर आने के लिए इन गांवों के लोगों के लिए चहली ही एकमात्र सहारा है। महेरी, चौखड़ा, संसारपुर, उगईपुर समेत आसपास के दर्जनभर गांवों के लोग भी इसी बांस के पुल के सहारे पर हाईवे पर आते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि यह पुल दशकों पुराना है। हर साल बनता और टूटता है। अगर पक्के पुल से नदी पारकर हाईवे पर आना हो तो उन्हें 20 किलोमीटर अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ता है।
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इसी तरह के हालात गजेहड़ा गांव के भी हैं। यहां भी बकुलाही नदी पर वर्षों से चहली के सहारे ही ग्रामीण नदी पार कर रहे हैं। फैजाबाद-इलाहाबाद हाईवे की तरफ बसे गजेहड़ा पहाड़पुर, शेखनपुर, भावलपुर, कोहला, भवानीपुर के लोगों को मानाधाता की तरफ जाने के लिए बांस के पुल से नदी पार करनी होती है। उस पार बसे गांव गुलरा, मेंहदौरी, खंडापार, खमपुर, द्वारिका के लोग हाईवे और शनिदेव धाम आने के लिए इसी चहली का इस्तेमाल करते हैं।
चहली न हो तो टूट जाएगा एक ग्रामसभा के लोगों का संपर्कः जिले की मदईपुर ग्राम पंचायत को बकुलाही नदी दो हिस्सों में बांट देती है। नदी के दोनों तरफ ग्राम पंचायत के अलग-अलग पुरवे बसे हैं। इन पुरवों के लोगों का संपर्क बांस के पुल के सहारे ही है। बहरापुर, लाखापुर, परौवा, चंघईपुर, आदि गांवों के लोगों को मानधाता थाने और ब्लाक जाने के लिए यही बांस का पुल सहारा है। मधईपुर ग्राम पंचायत बकुलाही नदी के दोनों तरफ बसा है। इसी पुल से प्रतिदिन पांच सौ से अधिक बच्चे विद्यालय पढ़ने आते हैं। यह पुल न हो तो उनका स्कूल भी छूट जाएगा, क्योंकि फिर पक्के पुल से विद्यालय आने के लिए उन्हें 10 किमी घूमकर आना पड़ेगा।
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कराया जा सका।
कुछ गांवों के लोगों को राजमार्ग या फिर शहर आने के लिए अगर चहली न हो तो 20 किमी का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है। नतीजा यह कि ग्रामीण बरसात के दिनों में नदियों के उफनाने के बाद भारी मुसीबत झेलने के लिए मजबूर हैं। एक-दो जगहों पर चहली भी नदी के पानी में डूब गई है। अब लोग नाव से नदी पार कर रहे हैं।
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शहर से मात्र दस 10 किमी की दूरी पर फैजाबाद-इलाहाबाद राजमार्ग पर स्थित राजगढ़ और कोट का पुरवा तिगनाइतपुर के बीच में बकुलाही नदी पड़ती है। हाईवे पर आने के लिए इन गांवों के लोगों के लिए चहली ही एकमात्र सहारा है। महेरी, चौखड़ा, संसारपुर, उगईपुर समेत आसपास के दर्जनभर गांवों के लोग भी इसी बांस के पुल के सहारे पर हाईवे पर आते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि यह पुल दशकों पुराना है। हर साल बनता और टूटता है। अगर पक्के पुल से नदी पारकर हाईवे पर आना हो तो उन्हें 20 किलोमीटर अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ता है।
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इसी तरह के हालात गजेहड़ा गांव के भी हैं। यहां भी बकुलाही नदी पर वर्षों से चहली के सहारे ही ग्रामीण नदी पार कर रहे हैं। फैजाबाद-इलाहाबाद हाईवे की तरफ बसे गजेहड़ा पहाड़पुर, शेखनपुर, भावलपुर, कोहला, भवानीपुर के लोगों को मानाधाता की तरफ जाने के लिए बांस के पुल से नदी पार करनी होती है। उस पार बसे गांव गुलरा, मेंहदौरी, खंडापार, खमपुर, द्वारिका के लोग हाईवे और शनिदेव धाम आने के लिए इसी चहली का इस्तेमाल करते हैं।
चहली न हो तो टूट जाएगा एक ग्रामसभा के लोगों का संपर्कः जिले की मदईपुर ग्राम पंचायत को बकुलाही नदी दो हिस्सों में बांट देती है। नदी के दोनों तरफ ग्राम पंचायत के अलग-अलग पुरवे बसे हैं। इन पुरवों के लोगों का संपर्क बांस के पुल के सहारे ही है। बहरापुर, लाखापुर, परौवा, चंघईपुर, आदि गांवों के लोगों को मानधाता थाने और ब्लाक जाने के लिए यही बांस का पुल सहारा है। मधईपुर ग्राम पंचायत बकुलाही नदी के दोनों तरफ बसा है। इसी पुल से प्रतिदिन पांच सौ से अधिक बच्चे विद्यालय पढ़ने आते हैं। यह पुल न हो तो उनका स्कूल भी छूट जाएगा, क्योंकि फिर पक्के पुल से विद्यालय आने के लिए उन्हें 10 किमी घूमकर आना पड़ेगा।