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38 साल बाद प्रमोद की सियासी पारी पर ब्रेक
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Sun, 01 Apr 2018 12:25 AM IST
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प्रमोद तिवारी
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एक ही पार्टी से नौ बार लगातार विधायक और फिर राज्यसभा सदस्य बने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी की सियासी पारी पर सोमवार को ब्रेक लग जाएगा। उनका राज्यसभा का कार्यकाल 2 अप्रैल को समाप्त हो रहा है। बीते 38 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब प्रमोद तिवारी किसी सदन के सदस्य नहीं होंगे। उनको दोबारा संसद पहुंचने के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
प्रमोद तिवारी ने 1979 में राजनीति में कदम रखा। 1979 में पहली बार वह साधन सहकारी समिति संग्रामगढ़ के अध्यक्ष चुने गए। 1980 में विधानसभा के आम चुनाव में रामपुरखास क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे। पहले चुनाव में ही उन्हें क्षेत्र के लोगों का जबरदस्त समर्थन मिला। इसी का नतीजा रहा कि उन्होंने राजेंद्र सिंह को भारी मतों से परास्त कर विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 1980 से शुरू हुआ जीत का सिलसिला आज तक नहीं थम सका है।
वह रामपुर खास विधानसभा से ही 2013 तक कांग्रेस से ही लगातार नौ बार विधायक चुने गए। इतना ही नहीं उन्होंने आदर्श विधायक का खिताब भी हासिल किया। उत्तर प्रदेश सरकार में वह तीन बार मंत्री भी रहे। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. श्रीपति मिश्र, स्व.वीर बहादुर सिंह और नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में 9 वर्षों तक विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। विधानसभा की विभिन्न समितियों में शामिल होने के साथ ही उन्हें पांच बार कांग्रेस विधानमंडल का नेता चुना गया।
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1993 से जून 1995 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में भी काम किया। 2013 में वह सपा के सहयोग से राज्यसभा पहुंचे थे। सोमवार को उनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है। लगातार 38 साल तक जनप्रतिनिधि रहने के बाद यह पहला मौका होगा जब वह किसी सदन के सदस्य नहीं होंगे। लोकसभा चुनाव 2019 में होने हैं। राज्यसभा जाने के लिए भी उन्हें दूसरे राज्य के भरोसे रहना होगा। ऐसे में दोबारा संसद पहुंचने के लिए भी उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
बेटी आराधना को सौंप दी रामपुरखास की कमान
13 दिसंबर 2013 को प्रमोद तिवारी ने राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई सीट पर अपनी बेटी आराधना उर्फ मोना मिश्रा को मैदान में उतारा और वह पिता की विरासत पर काबिज हैं। पहली बार उपचुनाव में आराधना मिश्रा मोना बड़े अंतर से जीती थीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी और भाजपा प्रत्याशी नागेश प्रताप सिंह उर्फ छोटे सरकार को करारी शिकस्त दी।
प्रमोद के माता-पिता आजीवन रहे प्रधान
जिले के संग्रामगढ़ गांव के निवासी प्रमोद तिवारी के पिता सरयू प्रसाद तिवारी और उनकी मां इंद्राणी देवी आजीवन प्रधान रहीं। प्रमोद तिवारी के विकास कार्य और जिले में सक्रियता को देखकर कई बार उन्हें निर्विरोध प्रधान बनने का मौका मिला था।
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प्रमोद तिवारी ने 1979 में राजनीति में कदम रखा। 1979 में पहली बार वह साधन सहकारी समिति संग्रामगढ़ के अध्यक्ष चुने गए। 1980 में विधानसभा के आम चुनाव में रामपुरखास क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे। पहले चुनाव में ही उन्हें क्षेत्र के लोगों का जबरदस्त समर्थन मिला। इसी का नतीजा रहा कि उन्होंने राजेंद्र सिंह को भारी मतों से परास्त कर विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 1980 से शुरू हुआ जीत का सिलसिला आज तक नहीं थम सका है।
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वह रामपुर खास विधानसभा से ही 2013 तक कांग्रेस से ही लगातार नौ बार विधायक चुने गए। इतना ही नहीं उन्होंने आदर्श विधायक का खिताब भी हासिल किया। उत्तर प्रदेश सरकार में वह तीन बार मंत्री भी रहे। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. श्रीपति मिश्र, स्व.वीर बहादुर सिंह और नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में 9 वर्षों तक विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। विधानसभा की विभिन्न समितियों में शामिल होने के साथ ही उन्हें पांच बार कांग्रेस विधानमंडल का नेता चुना गया।
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1993 से जून 1995 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में भी काम किया। 2013 में वह सपा के सहयोग से राज्यसभा पहुंचे थे। सोमवार को उनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है। लगातार 38 साल तक जनप्रतिनिधि रहने के बाद यह पहला मौका होगा जब वह किसी सदन के सदस्य नहीं होंगे। लोकसभा चुनाव 2019 में होने हैं। राज्यसभा जाने के लिए भी उन्हें दूसरे राज्य के भरोसे रहना होगा। ऐसे में दोबारा संसद पहुंचने के लिए भी उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
बेटी आराधना को सौंप दी रामपुरखास की कमान
13 दिसंबर 2013 को प्रमोद तिवारी ने राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई सीट पर अपनी बेटी आराधना उर्फ मोना मिश्रा को मैदान में उतारा और वह पिता की विरासत पर काबिज हैं। पहली बार उपचुनाव में आराधना मिश्रा मोना बड़े अंतर से जीती थीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी और भाजपा प्रत्याशी नागेश प्रताप सिंह उर्फ छोटे सरकार को करारी शिकस्त दी।
प्रमोद के माता-पिता आजीवन रहे प्रधान
जिले के संग्रामगढ़ गांव के निवासी प्रमोद तिवारी के पिता सरयू प्रसाद तिवारी और उनकी मां इंद्राणी देवी आजीवन प्रधान रहीं। प्रमोद तिवारी के विकास कार्य और जिले में सक्रियता को देखकर कई बार उन्हें निर्विरोध प्रधान बनने का मौका मिला था।