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लेखपालों ने आवास विकास का किया बंटाधार
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Fri, 15 Jul 2016 12:27 AM IST
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- फोटो : Demo pic
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जिले में आवास विकास परिषद का ऑफिस खुलते ही अपने मकान का सपना देखने वाले मध्यम वर्गीय लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। दरअसल, आवास विकास की योजना को बंटाधार करने वाला और कोई नहीं, बल्कि सदर तहसील में बीस-बीस साल से जमे लेखपाल हैं। भूमाफिया की श्रेणी में शामिल यह लेखपाल पत्नी और बेटे के नाम पर प्रापर्टी डीलिंग का धंधा करके करोड़पति बन गए हैं।
लगता है कि जिले के लोगों को अब सस्ता आवास नहीं मिलेगा। आवास विकास परिषद को जब जमीन ही नहीं मिलेगी तो वह कालोनी कहां से बनाएगा। आवास विकास परिषद को जमीन नहीं मिलने में सदर तहसील के लेखपाल रोड़ा बने हुए हैं। विभागीय अफसरों की मानें तो जहां खरीदने की पहल होती है उसे विवादित दिखा दिया जाता है। सदर तहसील में बीस-बीस साल से तैनात लेखपालों की जिले में तूती बोलती है। करोड़पतियों में शुमार इन लेखपालों की शहर में आलीशान कोठियां हैं।
सरकारी जमीन की नवैयत बदलकर आबादी लैंड घोषित करना और फिर उसकी प्लॉटिंग कर ऊंचे दाम पर बेचना इनकी कमाई का मुख्य जरिया है। स्वयं सरकारी कर्मचारी होने के कारण पत्नी, बेटे, बहू और रिश्तेदार के नाम प्रापर्टी डीलिंग का धंधा जोरशोर से चल रहा है। लेखपालों की यह काली कमाई में विभाग के अफसरों का भी हाथ होता है।
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तीन माह बाद सदर में आ धमके लेखपाल
सदर तहसीलों में बीस-बीस साल से जमे लेखपाल दूसरी तहसील में जाना पसंद नहीं करते हैं। दो वर्ष पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी ने सदर तहसील में जमे लेखपालों को लालगंज और कुंडा तहसील में तबादला कर दिया था, मगर डीएम का स्थानान्तरण होते ही तीन माह के अंदर पुन: सदर तहसील में आकर जम गए।
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लगता है कि जिले के लोगों को अब सस्ता आवास नहीं मिलेगा। आवास विकास परिषद को जब जमीन ही नहीं मिलेगी तो वह कालोनी कहां से बनाएगा। आवास विकास परिषद को जमीन नहीं मिलने में सदर तहसील के लेखपाल रोड़ा बने हुए हैं। विभागीय अफसरों की मानें तो जहां खरीदने की पहल होती है उसे विवादित दिखा दिया जाता है। सदर तहसील में बीस-बीस साल से तैनात लेखपालों की जिले में तूती बोलती है। करोड़पतियों में शुमार इन लेखपालों की शहर में आलीशान कोठियां हैं।
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सरकारी जमीन की नवैयत बदलकर आबादी लैंड घोषित करना और फिर उसकी प्लॉटिंग कर ऊंचे दाम पर बेचना इनकी कमाई का मुख्य जरिया है। स्वयं सरकारी कर्मचारी होने के कारण पत्नी, बेटे, बहू और रिश्तेदार के नाम प्रापर्टी डीलिंग का धंधा जोरशोर से चल रहा है। लेखपालों की यह काली कमाई में विभाग के अफसरों का भी हाथ होता है।
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तीन माह बाद सदर में आ धमके लेखपाल
सदर तहसीलों में बीस-बीस साल से जमे लेखपाल दूसरी तहसील में जाना पसंद नहीं करते हैं। दो वर्ष पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी ने सदर तहसील में जमे लेखपालों को लालगंज और कुंडा तहसील में तबादला कर दिया था, मगर डीएम का स्थानान्तरण होते ही तीन माह के अंदर पुन: सदर तहसील में आकर जम गए।