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खुद बदली हाथों की लकीर, अब बन गईं नजीर
Updated Mon, 28 Aug 2017 08:08 PM IST
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प्रतापगढ़। वो गिनती में कुल बारह थीं। एक-दूसरे से अपरिचित और अनभिज्ञ। सिर्फ एक चीज में समानता थी। सभी घर में चूल्हा-चौका करती थीं। उनकी जिंदगी भी यहीं तक सीमित थी, लेकिन बीते ढाई सालों में उन्होंने जो कर दिखाया, उससे दूसरों के लिए नजीर बन गई हैं। कालाकांकर ब्लाक के अलग-अलग गांवों की 12 महिलाओं ने तीन साल में ही स्टार्टअप इंडिया के सपने को सच कर दिखाया है। पांच-पांच सौ रुपये चंदे से शुरू हुए उनके कारोबार का पिछला टर्नओवर साढ़े चार लाख से भी अधिक रहा। सिलाई-कढ़ाई से चला कारवां अब फूड पैकेट्स और अगरबत्ती के निर्माण तक पहुंच गया है। इस काम में कालांकाकर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र की गृह वैज्ञानिक डा. स्वाती दीपक दूबे भी उनकी पूरी मदद कर रही हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र कालाकांकर की तरफ से साल भर में दो बार दो महीने का व्यवसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है। ट्रेनिंग के दौरान हुनरमंद महिलाओं का चयन कर उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जाता है। केंद्र की गृह वैज्ञानिक डा. स्वाती दीपक दूबे ने 14 जनवरी 2015 को घर-गृहस्थी में जमी ने 12 महिलाओं को चयनित कर उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया। शुरुआत सिलाई-कढ़ाई से हुई और महिलाओं ने पांच-पांच सौ रुपये इकट्ठे कर समूह बनाया, जिसका नाम रखा गया कालाकांकर महिला अभिरुचि समूह। इन महिलाओं की मेहनत रंग लाई और ढाई साल में ही सिलाई-कढ़ाई से व्यवसाय अगरबत्ती और फूड पैकेट्स तक पहुंच गया। अगरबत्ती के लिए केवीके ने एक लाख की मशीन उपलब्ध कराई तो समूह के जरिए महिलाओं ने मैटेरियल के लिए 40 हजार रुपये दिए। इस मशीन से एक दिन में एक क्विंटल अगरबत्ती बनाई जा सकती है। अगरबत्ती बनाने के साथ इसकी पैकिंग भी यहीं होती है। इसे थोक के साथ खुदरा रेट पर भी बेचा जा रहा है।
पांच रुपये के एक पैकेट में अगरबत्ती की 11 स्टिक्स होती हैं। इसके जरिए हर महीने करीब साठ हजार रुपये की आमदनी हो रही है। केंद्र की गृह वैज्ञानिक डा. स्वाती दीपक दूबे ने बताया कि इसके अलावा ये महिलाएं छोटे नाश्ता पैकेट भी तैयार कर रही हैं, जिसकी स्थानीय बाजारों की दुकानों पर सप्लाई की जाती है। गौर करने वाली बात यह है कि घर का काम निपटाने के बाद हर दिन ये महिलाएं कृषि विज्ञान केंद्र के विपणन केंद्र में सुबह 10 से शाम पांच बजे तक काम करती हैं। इनमें कई महिलाएं दूर से पैदल चलकर आती है। जब कभी बिजली का संकट हुआ तो सुबह सात बजे से भी काम शुरू हो जाता है। महिलाओं की मेहनत के कारण समूह लगातार बढ़ रहा है।
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कृषि विज्ञान केंद्र कालाकांकर की तरफ से साल भर में दो बार दो महीने का व्यवसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है। ट्रेनिंग के दौरान हुनरमंद महिलाओं का चयन कर उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जाता है। केंद्र की गृह वैज्ञानिक डा. स्वाती दीपक दूबे ने 14 जनवरी 2015 को घर-गृहस्थी में जमी ने 12 महिलाओं को चयनित कर उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया। शुरुआत सिलाई-कढ़ाई से हुई और महिलाओं ने पांच-पांच सौ रुपये इकट्ठे कर समूह बनाया, जिसका नाम रखा गया कालाकांकर महिला अभिरुचि समूह। इन महिलाओं की मेहनत रंग लाई और ढाई साल में ही सिलाई-कढ़ाई से व्यवसाय अगरबत्ती और फूड पैकेट्स तक पहुंच गया। अगरबत्ती के लिए केवीके ने एक लाख की मशीन उपलब्ध कराई तो समूह के जरिए महिलाओं ने मैटेरियल के लिए 40 हजार रुपये दिए। इस मशीन से एक दिन में एक क्विंटल अगरबत्ती बनाई जा सकती है। अगरबत्ती बनाने के साथ इसकी पैकिंग भी यहीं होती है। इसे थोक के साथ खुदरा रेट पर भी बेचा जा रहा है।
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पांच रुपये के एक पैकेट में अगरबत्ती की 11 स्टिक्स होती हैं। इसके जरिए हर महीने करीब साठ हजार रुपये की आमदनी हो रही है। केंद्र की गृह वैज्ञानिक डा. स्वाती दीपक दूबे ने बताया कि इसके अलावा ये महिलाएं छोटे नाश्ता पैकेट भी तैयार कर रही हैं, जिसकी स्थानीय बाजारों की दुकानों पर सप्लाई की जाती है। गौर करने वाली बात यह है कि घर का काम निपटाने के बाद हर दिन ये महिलाएं कृषि विज्ञान केंद्र के विपणन केंद्र में सुबह 10 से शाम पांच बजे तक काम करती हैं। इनमें कई महिलाएं दूर से पैदल चलकर आती है। जब कभी बिजली का संकट हुआ तो सुबह सात बजे से भी काम शुरू हो जाता है। महिलाओं की मेहनत के कारण समूह लगातार बढ़ रहा है।
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