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सरकारी डाक्टरों के भरोसे चल रहे निजी अस्पताल
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प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़िए, यहां सरकारी डॉक्टरों के भरोसे चल रहे निजी अस्पताल
जिले में सिर्फ सरकारी अस्पतालों में हैं बेहोशी के चार डाक्टर, प्राइवेट अस्पतालों में कैसे हो रहा आपरेशन
ज्यादातर निजी अस्पतालों में सर्जन और फिजीशियन भी नहीं, सरकारी डाक्टरों ने थाम रखी है कमान
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। जिले के ज्यादातर निजी अस्पताल सरकारी डॉक्टर के भरोसे संचालित हो रहे हैं। नर्सिंगहोम और प्राइवेट अस्पतालों में सरकारी डॉक्टर आपरेेशन से लेकर ओपीडी तक सब संभाल रहे हैं। कुछ निजी अस्पताल तो सरकारी डाक्टरों के ही हैं, लेकिन सरकारी सेवा में होने के कारण उन्होंने किसी और के नाम पर रजिस्ट्रेशन करा रखा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही सरकारी डाक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने को लेकर सख्त हैं, लेकिन यहां सब कुछ स्वास्थ्य विभाग की रजामंदी से चल रहा है। सीएमओ ने सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद कर रखी हैं। डाक्टर, एमआर, दवा कंपनियों और स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत से मरीजों को इलाज के नाम पर लूटा जा रहा है।
जिले में 34 निजी अस्पतालों का संचालन हो रहा है। इनमे से एक भी अस्पताल में बेहोशी के डॉक्टर नहीं है। सात अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो किसी में सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ, फिजीशियन समेत अन्य चिकित्सक भी नहीं हैं। तीन नर्सिंगहोम को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर अस्पतालों में प्रसव पीड़िताओं को ही भर्ती किया जाता है। नार्मल या फिर सीजर प्रसव कराया जाता है। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों की ही मानें तो शहर में संचालित हो रहे ज्यादातर नर्सिंगहोम में जिला व महिला अस्पताल में तैनात सर्जन और बेहोशी के डॉक्टर ऑपरेशन करने के लिए जाते हैं। वहीं ग्रामीण इलाके के अस्पतालों में सीएचसी में तैनात सर्जन ऑपरेशन करने जाते हैं।
इनसेट---------
लाइसेंस बनवाने के बाद गायब हो जाते हैं डॉक्टर
नर्सिंगहोम का लाइसेंस एमबीबीएस डिग्री पर सीएमओ जारी कर देते हैं। जिले में संचालित हो रहे ज्यादातर नर्सिंगहोम का लाइसेंस गैर जनपद के चिकित्सकों की डिग्री पर बना हुआ है। जिसके नाम लाइसेंस है वह कभी अस्पताल नहीं आता है। हां प्रति माह 20 से 32 हजार रुपये डॉक्टर के खाते में पहुंच जाते हैं। अस्पताल संचालक सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों को बुलाकर मरीजों का ऑपरेशन कर मोटी रकम वसूलते हैं।
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इनसेट-------
सरकारी अस्पताल में झल्लाते हैं, प्राइवेट में ठीक से करते हैं इलाज
जिला और महिला अस्पताल में तैनात ज्यादातर डॉक्टर मरीजों से झल्लाकर बात करते हैं। फीस न मिलने के कारण कमीशन वाली महंगी दवा लिखते हैं। वहीं प्राइवेट अस्पतालों में यही डॉक्टर मरीजों के साथ बेहद शालीनता के साथ पेश आते हैं।
इनसेट-----------
कइयों ने अपने आवास पर भी बन रखा है क्लीनिक
जिला व महिला अस्पताल में तैनात ज्यादातर डॉक्टरों ने अपने आवास को ही क्लीनिक बना लिया है। जहां मरीजों का फीस लेकर इलाज करते हैं। सुबह सात से नौ तो दोपहर तीन से रात आठ बजे तक मरीजों देखते हैं। मरीजों को आवास तक लाने के लिए बकायदा आदमी भी लगा रखे हैं।
वर्जन-------------
शासन का आदेश मिलने के बाद एक दिन में तीन से चार नर्सिंगहोम का निरीक्षण किया जा रहा है। इस समय निरीक्षण ही कर रहा हूं। किसी क्लीनिक, नर्सिंगहोम या फिर मेडिकल स्टोर पर सरकारी डॉक्टर बैठकर मरीजों का इलाज करते पाए जाते हैं तो तत्काल कार्रवाई के लिए शासन को पत्र लिखा जाएगा। उनके खिलाफ विभाग की ओर से मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।
एके श्रीवास्तव, सीएमओ।
जिले में सिर्फ सरकारी अस्पतालों में हैं बेहोशी के चार डाक्टर, प्राइवेट अस्पतालों में कैसे हो रहा आपरेशन
ज्यादातर निजी अस्पतालों में सर्जन और फिजीशियन भी नहीं, सरकारी डाक्टरों ने थाम रखी है कमान
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। जिले के ज्यादातर निजी अस्पताल सरकारी डॉक्टर के भरोसे संचालित हो रहे हैं। नर्सिंगहोम और प्राइवेट अस्पतालों में सरकारी डॉक्टर आपरेेशन से लेकर ओपीडी तक सब संभाल रहे हैं। कुछ निजी अस्पताल तो सरकारी डाक्टरों के ही हैं, लेकिन सरकारी सेवा में होने के कारण उन्होंने किसी और के नाम पर रजिस्ट्रेशन करा रखा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही सरकारी डाक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने को लेकर सख्त हैं, लेकिन यहां सब कुछ स्वास्थ्य विभाग की रजामंदी से चल रहा है। सीएमओ ने सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद कर रखी हैं। डाक्टर, एमआर, दवा कंपनियों और स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत से मरीजों को इलाज के नाम पर लूटा जा रहा है।
जिले में 34 निजी अस्पतालों का संचालन हो रहा है। इनमे से एक भी अस्पताल में बेहोशी के डॉक्टर नहीं है। सात अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो किसी में सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ, फिजीशियन समेत अन्य चिकित्सक भी नहीं हैं। तीन नर्सिंगहोम को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर अस्पतालों में प्रसव पीड़िताओं को ही भर्ती किया जाता है। नार्मल या फिर सीजर प्रसव कराया जाता है। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों की ही मानें तो शहर में संचालित हो रहे ज्यादातर नर्सिंगहोम में जिला व महिला अस्पताल में तैनात सर्जन और बेहोशी के डॉक्टर ऑपरेशन करने के लिए जाते हैं। वहीं ग्रामीण इलाके के अस्पतालों में सीएचसी में तैनात सर्जन ऑपरेशन करने जाते हैं।
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लाइसेंस बनवाने के बाद गायब हो जाते हैं डॉक्टर
नर्सिंगहोम का लाइसेंस एमबीबीएस डिग्री पर सीएमओ जारी कर देते हैं। जिले में संचालित हो रहे ज्यादातर नर्सिंगहोम का लाइसेंस गैर जनपद के चिकित्सकों की डिग्री पर बना हुआ है। जिसके नाम लाइसेंस है वह कभी अस्पताल नहीं आता है। हां प्रति माह 20 से 32 हजार रुपये डॉक्टर के खाते में पहुंच जाते हैं। अस्पताल संचालक सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों को बुलाकर मरीजों का ऑपरेशन कर मोटी रकम वसूलते हैं।
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सरकारी अस्पताल में झल्लाते हैं, प्राइवेट में ठीक से करते हैं इलाज
जिला और महिला अस्पताल में तैनात ज्यादातर डॉक्टर मरीजों से झल्लाकर बात करते हैं। फीस न मिलने के कारण कमीशन वाली महंगी दवा लिखते हैं। वहीं प्राइवेट अस्पतालों में यही डॉक्टर मरीजों के साथ बेहद शालीनता के साथ पेश आते हैं।
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कइयों ने अपने आवास पर भी बन रखा है क्लीनिक
जिला व महिला अस्पताल में तैनात ज्यादातर डॉक्टरों ने अपने आवास को ही क्लीनिक बना लिया है। जहां मरीजों का फीस लेकर इलाज करते हैं। सुबह सात से नौ तो दोपहर तीन से रात आठ बजे तक मरीजों देखते हैं। मरीजों को आवास तक लाने के लिए बकायदा आदमी भी लगा रखे हैं।
वर्जन-------------
शासन का आदेश मिलने के बाद एक दिन में तीन से चार नर्सिंगहोम का निरीक्षण किया जा रहा है। इस समय निरीक्षण ही कर रहा हूं। किसी क्लीनिक, नर्सिंगहोम या फिर मेडिकल स्टोर पर सरकारी डॉक्टर बैठकर मरीजों का इलाज करते पाए जाते हैं तो तत्काल कार्रवाई के लिए शासन को पत्र लिखा जाएगा। उनके खिलाफ विभाग की ओर से मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।
एके श्रीवास्तव, सीएमओ।