मरने के बाद पिंडदान, जीते जी नहीं मिल रहा सम्मान

Allahabad Bureauइलाहाबाद ब्यूरो Updated Wed, 26 Sep 2018 02:00 AM IST
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मरने के बाद पिंडदान, जीते जी नहीं मिल रहा सम्मान
बेटों की बेरुखी से परिवार की खुशियां छोडक़र वृद्धा आश्रम रहने को मजबूर हैं माता-पिता
तिरस्कार के चलते हैं गमगीन, अंतिम समय में झेलनी पड़ रही जलालत
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। मंगलवार से पितृपक्ष शुरू हो गया है। पितरों की शांति के लिए लोग पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद भयावह है। जीवन के अंतिम समय में कई बुजुर्ग अपनों की बेरुखी के कारण परिवार की खुशियों से दूर है। बेटे हैं, बहू हैं, भरापूरा परिवार है, लेकिन अपनों की बेरुखी के कारण जीवन के अंतिम समय में वह परिवार छोडक़र वृद्धाआश्रम में रहने को मजबूर है।
मंगलवार को ‘अमर उजाला’ की टीम ने रूपापुर स्थित वृद्धाआश्रम में पहुंचकर ऐसे बुजुर्गों से बातचीत की तो उनका दर्द जुबान पर आ गया। उनका कहना था कि जीतेजी जो बेटे मां-बाप को सम्मान नहीं देते, वह मरने के बाद तर्पण और पिंडदान क्यों करते है। हमें तो जीतेजी सम्मान चाहिए।
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छूट गई पुरानी बखरी, बेटा-बहू चले गए मायानगरी
नगर कोतवाली क्षेत्र के पटखौली निवासी रामदुलार यादव (68) का गांव में दूध का अच्छा खासा व्यवसाय था। पत्नी छोटका भी कामकाज में सहयेाग करती थी। कमाई अच्छी थी, मगर कोख सूनी थी। काफी मन्नतों के बाद उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। घर में मंगलगीत व भोज का आयेाजन कर खुशियां मनाईं। बेटे को पढ़ा-लिखाकर पैरों पर खड़ा किया। धूमधाम से विवाह कर घर बसाया। इस बीच बेटे को मायानगरी मुंबई में नौकरी मिली तो वह पत्नी को लेकर वहीं बस गया। फिर लौटकर नहीं आया। अब उम्र के अंतिम पड़ाव में रामदुलार (72) व उसकी पत्नी छोटका (68) असमर्थ हो गए हैं। उन्हें देखरेख की जरूरत है। मगर उनकी सेवा करने वाला घर पर कोई नहीं है। वह वृद्धाआश्रम में रहने को मजबूर हैं।
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ताउम्र परिवार संभाला, चौथे पड़ाव में नहीं मिला सहारा
नगर कोतवाली के विक्रमाजीत (70) बैंक में कर्मचारी थे। जब तक कमाई थी, उन्होनें परिवार को संभाला। भरण-पोषण किया। मगर उम्र के चौथे पड़ाव में परिवार ने उनका साथ छोड़ दिया। जबकि उनका भरापूरा परिवार था। उन्होंने कहा कि माता-पिता भगवान स्वरूप होते है। मां-बाप की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है। जीतेजी जिनकी आत्मा को दुखाया जाता है, मरने के बाद कर्मकांड के जरिए आखिर उन्हें कैसे शांति मिलेगी। तर्पण व पिंडदान महज दिखावा है।
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बूढ़ापे में सेवा करें, नहीं चाहिए तर्पण
नगर कोतवाली क्षेत्र के भदोही गांव निवासी सोमवारी (69) कहती हैं कि बूढ़ापे में मां-बाप की सेवा और सम्मान चाहिए। घर में तिरस्कार सहन नहीं है। घर में अपमान, पीड़ा, बेबसी की जिंदगी गुजारनी पड़े और मरने के बाद बेटे कर्मकांड कराएं, यह कहां तक ठीक है। ऐसी मान्यताओ में विश्वास नहीं किया जा सकता है।
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याद आता घर, फिर भी है बेघर
शहर से सटे चिलबिला बाजार की रहने वाली 68 वर्ष सुमन देवी करीब 7 महीने से वृद्धाआश्रम में रह रही हैं। उनका कहना है कि बेटे-बहू के रहने से बूढ़ापे में संबल मिलता है। मगर अंतिम पड़ाव में ऐसा होता नहीं है। परिवार सेवाभाव से मुंहमोड़ लेता है। जरूरतों को पूरा नहीं करते। उल्टे डांट व फटकार मिलती है। मरने के बाद तर्पण व कर्मकांड का दिखावा किया जाता है।
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