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मोदी जी! ऐसे तो टीबी के खिलाफ नहीं लड़ पाएंगे जंग
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पीलीभीत। प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2025 तक देश को टीबी मुक्त करने की मुहिम चला रखी है, लेकिन जनपद में इस मुहिम को झटका लग सकता है। टीबी से संबंधित चल रही योजना का क्रियान्वयन को सृजित किए गए डिस्ट्रिक प्रोग्राम कोआर्डिनेटर की तैनाती अब तक नहीं हो सकी। 21 जांच केंद्रों में से सात केंद्रों पर लैब टेक्नीशियन नहीं हैं। इसके चलते विभाग क्षय रोगियों तक अपनी पकड़ नहीं बना सका है।
देश को वर्ष 2025 तक क्षय रोग मुक्त करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के पुनरीक्षित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) को अब राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के रूप में तब्दील किया गया है। सतत विकास लक्ष्य को हासिल करने को शासन स्तर से आदेश जारी किए जा चुके हैं, लेकिन जिले का क्षय रोग विभाग किन मुसीबतों से दो-चार हो रहा है। इस पर अफसरों का ध्यान नहीं है। 721 ग्राम पंचायतों में 21 डीएमएस (डेजगनेटेेड माइक्रो सेंटर) और 11 यूनिट हैं।
जिले में 21 डीएमएस सेंटर हैं, जहां संभावित क्षय रोगियों की जांच होती है। इन्हीं संभावित क्षय रोगियों में पॉजिटिव पाए गए क्षय रोगियों का पंजीकरण कर उन्हें दवा मुहैय्या कराई जाती है। खास बात यह है कि जिले में सात डीएमएस सेंटर पर लैब टेक्नीशियन ही नहीं है। जाहिर है इन डीएमएस सेंटरों पर आने वाले रोगियों की जांच नहीं होती होगी। फिलहाल विभाग का दावा है कि इन सेंटरों पर रोस्टर बनाकर दूसरे सेंटरों के लैब टेक्नीशियनों को भेजा जाता है। यही वजह यह है कि हर साल टीबी मरीजों का बढ़ती संख्या वर्ष 2019 में घटी है।
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टीबी रोग के निदान को लेकर चलाई जा रही योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम कोआर्डिनेटर (डीपीसी) की है। यह पद तीन साल पहले सृजित किया था। बिडंबना यह है कि इस पद पर यहां आज तक किसी की तैनाती नहीं की गई। यह सारा कार्य जिला क्षय रोग अधिकारी और उनके कर्मचारी करते हैं।
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देश को वर्ष 2025 तक क्षय रोग मुक्त करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के पुनरीक्षित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) को अब राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के रूप में तब्दील किया गया है। सतत विकास लक्ष्य को हासिल करने को शासन स्तर से आदेश जारी किए जा चुके हैं, लेकिन जिले का क्षय रोग विभाग किन मुसीबतों से दो-चार हो रहा है। इस पर अफसरों का ध्यान नहीं है। 721 ग्राम पंचायतों में 21 डीएमएस (डेजगनेटेेड माइक्रो सेंटर) और 11 यूनिट हैं।
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जिले में 21 डीएमएस सेंटर हैं, जहां संभावित क्षय रोगियों की जांच होती है। इन्हीं संभावित क्षय रोगियों में पॉजिटिव पाए गए क्षय रोगियों का पंजीकरण कर उन्हें दवा मुहैय्या कराई जाती है। खास बात यह है कि जिले में सात डीएमएस सेंटर पर लैब टेक्नीशियन ही नहीं है। जाहिर है इन डीएमएस सेंटरों पर आने वाले रोगियों की जांच नहीं होती होगी। फिलहाल विभाग का दावा है कि इन सेंटरों पर रोस्टर बनाकर दूसरे सेंटरों के लैब टेक्नीशियनों को भेजा जाता है। यही वजह यह है कि हर साल टीबी मरीजों का बढ़ती संख्या वर्ष 2019 में घटी है।
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टीबी रोग के निदान को लेकर चलाई जा रही योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम कोआर्डिनेटर (डीपीसी) की है। यह पद तीन साल पहले सृजित किया था। बिडंबना यह है कि इस पद पर यहां आज तक किसी की तैनाती नहीं की गई। यह सारा कार्य जिला क्षय रोग अधिकारी और उनके कर्मचारी करते हैं।