यूपी: पीलीभीत टाइगर रिजर्व में पहली बार दिखा दुर्लभ हरे रंग का सांप, अंधेरे में भी खोज लेता है शिकार
पीलीभीत टाइगर रिजर्व की वन सीमा के पास पहली बार दुर्लभ हरा सालाजार पिट वाइपर सांप दिखा। वन विभाग की टीम ने विषैले सांप का सुरक्षित रेस्क्यू कर उसे प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया है।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) की जैव विविधता में दुर्लभ सरीसृप की मौजूदगी ने वन्यजीव विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। टाइगर रिजर्व की वन सीमा के पास पहली बार हरे रंग का दुर्लभ सालाजार पिट वाइपर सांप देखा गया। हैरी पॉटर फिल्म श्रृंखला के काल्पनिक पात्र सालाजार स्लिथेरिन के नाम से जुड़ी पहचान रखने वाली इस प्रजाति को वन विभाग की टीम ने सावधानीपूर्वक रेस्क्यू किया और सुरक्षित प्राकृतिक वास में छोड़ दिया। इसकी मौजूदगी को तराई के जंगलों में सरीसृपों की विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सालाजार पिट वाइपर अपनी आकर्षक हरी रंगत के साथ शिकार को पहचानने की खास क्षमता के लिए जाना जाता है। इसकी आंख और नाक के बीच मौजूद विशेष अंग आसपास के तापमान में होने वाले बदलाव को महसूस करता है। इसी हीट सेंसिंग पिट की मदद से यह अंधेरे में भी गर्म खून वाले शिकार का पता लगा सकता है। यह विषैला सांप है, इसलिए इसके मिलने पर सावधानी बरतना जरूरी है।
डीएफओ मनीष सिंह ने बताया कि सालाजार पिट वाइपर की मौजूदगी टाइगर रिजर्व के प्राकृतिक वातावरण और समृद्ध जैव विविधता का प्रमाण है। यह दुर्लभ और विषैली प्रजाति है। टाइगर रिजर्व में सरीसृपों की नई प्रजातियों की मौजूदगी सामने आना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उत्साहजनक संकेत है।
तराई के जंगलों में दुर्लभ सरीसृपों का बसेरा
पीलीभीत टाइगर रिजर्व और आसपास का तराई क्षेत्र बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीवों के साथ कई दुर्लभ सरीसृपों का भी प्राकृतिक आवास है। वन्यजीव एवं पक्षी संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था टरक्वाइज वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी के वर्ष 2003 से अब तक किए गए अध्ययनों में क्षेत्र में 18 से 20 दुर्लभ प्रजातियों को चिह्नित किया गया है। इनमें अनुसूची-एक में शामिल अजगर और देश में कम दिखाई देने वाला रेड कोरल कुकरी सांप भी शामिल है।
सालाजार पिट वाइपर की भारत में मौजूदगी पहली बार वर्ष 2019 में अरुणाचल प्रदेश में दर्ज की गई थी। इससे संबंधित शोध को नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज, बेंगलुरु और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के वैज्ञानिकों ने अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र में प्रकाशित किया था। अब पीटीआर की वन सीमा के पास इसकी मौजूदगी सामने आने से क्षेत्र के सरीसृपों की विविधता पर नए सिरे से ध्यान गया है।