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जुझारू सिखों ने यूबा सिटी को बना दिया मिनी पंजाब
ब्यूरो/अमर उजाला, पीलीभीत
Updated Thu, 02 Jun 2016 10:57 PM IST
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खेतीबाड़ी
- फोटो : pilibhit, beureu
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कैलिफोर्निया (अमेरिका)। भारत से आए पंजाबियों ने अपनी मेहनत के दम पर अमेरिका के कैलीफोर्निया प्रांत के यूबा सिटी को बेहद उपजाऊ बनाकर नई पहचान दी है। यह इलाका अब अमेरिका के मिनी पंजाब के नाम से जाना जाने लगा है।
उत्तर में चीको से लेकर दक्षिण स्थित बेकर्सफील्ड तक पड़ने वाले यूबा सिटी, सैक्रोमैंटो, सेनजोग, मर्सिड, फ्रिजनो आदि इलाके में लाखों एकड़ जमीन पर हो रही अधिकतर खेती भारत से आए पंजाबी/सिख ही कर रहे हैं। एक लाख की आबादी वाले दो मुख्य शहर यूबा सिटी व मैरिसवेल सिखों की गतिविधियों व विकास के मुख्य केंद्र हैं। लगभग 60 हजार की आबादी वाले यूबा सिटी में पांच गुरुद्वारे हैं। वहीं पंजाब न्यूज, पंजाब टाइम, प्रदेश टाइम्स, सांझी सोच, अजीत सहित आधा दर्जन अच्छे स्तर के पंजाबी भाषा के साप्ताहिक अखबार निकलते हैं। इस इलाके में मुख्य रूप से अखरोट, बादाम, आड़ू और धान की खेती है। सैकड़ों मील तक उनके बाग और खेत ही नजर आते हैं।
मॉडर्न टेक्नोलॉजी बनी वरदान
खेती के धंधे में यहां पूरी तरह छा जाने की वजह सिखों की कड़ी मेहनत व खेती में हाई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना है। जमीन की मिट्टी के परीक्षण में जिस फसल को सबसे ज्यादा पैदा होने लायक पाया जाता है, वही फसल खेत में बोई जाती है। भारत की तरह यहां छोटे-छोटे चकों में फसलें नहीं बोई जातीं। यहां भारत के सिखों के कृषि फार्मों की अपेक्षा कई-कई हजार एकड़ के इलाके में एक ही तरह की फसल की जाती है। खेत तैयार करने, पैकेजिंग से लेकर फसल बाजार में पहुंचाने तक का सारा प्रोसेस खेतों पर ही किया जाता है।
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खेत से शुरू होकर सबकुछ खेत में ही
उदाहरण के लिए धान की खेती ही ले लीजिए। धान का बीज बोने के लिए खेत तैयार करने का काम मशीन से होता है। जो पूरे खेत में नौ इंच की नाली बना देती है। फिर खेत को पानी से भर देेते हैं। बाद में प्लेन के माध्यम से पूरे खेत में बीज बोया जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे खेत का पानी बाहर निकाला जाता है, जिससे नम जमीन में बीज धंसकर अंकुरित हो जाता है। फिर पौधे के बड़ा होने पर खाद और दवा का समय-समय पर स्प्रे प्लेन के जरिए ही किया जाता है। खेतों के बीच में प्लेन के उड़ने के लिए रनवे बनाए जाते हैं, जिसके पास खड़े खाद और दवा के टैंकर प्लेन को लोड करते रहते हैं।
खेतों में ही हैं राइस मिलें
फसल तैयार होने पर उसको काटने और दाना अलग करने, दानों को जुटाकर ट्रकों पर लोड करने का कार्य भी मशीनों से होता है। खेतों में ही स्थित माडर्न राइस मिलें उनकी प्रोसेसिंग कर चावल निकाल लेती हैं और उन्हें अलग-अलग समूहों में बांटकर बाजार की आवश्यकतानुसार उनकी पैकिंग करती हैं। पैकिंग के बाद उन्हें राइस मिल यार्ड में ही बने कोल्ड स्टोरेज में रख दिया जाता है और फिर बाजार में जरूरत और भाव देखकर बिक्री किया जाता है।
एग्रीकल्चर प्रोडक्ट से बने इंडस्ट्रियलिस्ट
किसानों को अपनी कच्ची फसल मंडी में नहीं ले जानी पड़ती और कम लागत में ज्यादा उत्पादन व फसल की प्रोसेसिंग करने तक का सारा काम मुश्किल से 40-50 कर्मचारी ही संभालते हैं। यहां अधिकांश किसान अपनी ही फसल से एग्रीकल्चर प्रोडक्ट से इंडस्ट्रियलिस्ट भी बने हैं।
पानी की बर्बादी रोकने को माइक्रो इरीगेशन सिस्टम
खेती में किसानों ने डिप व माइक्रो इरीगेशन सिस्टम अपनाया हुआ है। फलों के पेड़ों में पानी देने के लिए समीप ही पाइप लाइनें बिछी हुई हैं। इसमें लगे फव्वारे पेड़ों को पानी देते हैं। बाग में लगे एंटीना के माध्यम से किसानों के कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर में आने वाले सिग्नलों से पता चलता रहता है कि जमीन में कितनी नमी है और उसे कब और कितना पानी चाहिए। इस पद्धति से बिजली खर्च भी बचता है और मैन पॉवर भी। यहां लेबर काफी महंगी है, इसलिए यह पद्धति किसानों के लिए वरदान बन रही है। भारतीयों के लिए इस तरह की खेती करना एक स्वप्न जैसा हो सकता है, पर इसमें से काफी कुछ हम अपने यहां अपनाकर भारतीय किसानों को भी रईस बना सकते हैं।
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उत्तर में चीको से लेकर दक्षिण स्थित बेकर्सफील्ड तक पड़ने वाले यूबा सिटी, सैक्रोमैंटो, सेनजोग, मर्सिड, फ्रिजनो आदि इलाके में लाखों एकड़ जमीन पर हो रही अधिकतर खेती भारत से आए पंजाबी/सिख ही कर रहे हैं। एक लाख की आबादी वाले दो मुख्य शहर यूबा सिटी व मैरिसवेल सिखों की गतिविधियों व विकास के मुख्य केंद्र हैं। लगभग 60 हजार की आबादी वाले यूबा सिटी में पांच गुरुद्वारे हैं। वहीं पंजाब न्यूज, पंजाब टाइम, प्रदेश टाइम्स, सांझी सोच, अजीत सहित आधा दर्जन अच्छे स्तर के पंजाबी भाषा के साप्ताहिक अखबार निकलते हैं। इस इलाके में मुख्य रूप से अखरोट, बादाम, आड़ू और धान की खेती है। सैकड़ों मील तक उनके बाग और खेत ही नजर आते हैं।
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मॉडर्न टेक्नोलॉजी बनी वरदान
खेती के धंधे में यहां पूरी तरह छा जाने की वजह सिखों की कड़ी मेहनत व खेती में हाई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना है। जमीन की मिट्टी के परीक्षण में जिस फसल को सबसे ज्यादा पैदा होने लायक पाया जाता है, वही फसल खेत में बोई जाती है। भारत की तरह यहां छोटे-छोटे चकों में फसलें नहीं बोई जातीं। यहां भारत के सिखों के कृषि फार्मों की अपेक्षा कई-कई हजार एकड़ के इलाके में एक ही तरह की फसल की जाती है। खेत तैयार करने, पैकेजिंग से लेकर फसल बाजार में पहुंचाने तक का सारा प्रोसेस खेतों पर ही किया जाता है।
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खेत से शुरू होकर सबकुछ खेत में ही
उदाहरण के लिए धान की खेती ही ले लीजिए। धान का बीज बोने के लिए खेत तैयार करने का काम मशीन से होता है। जो पूरे खेत में नौ इंच की नाली बना देती है। फिर खेत को पानी से भर देेते हैं। बाद में प्लेन के माध्यम से पूरे खेत में बीज बोया जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे खेत का पानी बाहर निकाला जाता है, जिससे नम जमीन में बीज धंसकर अंकुरित हो जाता है। फिर पौधे के बड़ा होने पर खाद और दवा का समय-समय पर स्प्रे प्लेन के जरिए ही किया जाता है। खेतों के बीच में प्लेन के उड़ने के लिए रनवे बनाए जाते हैं, जिसके पास खड़े खाद और दवा के टैंकर प्लेन को लोड करते रहते हैं।
खेतों में ही हैं राइस मिलें
फसल तैयार होने पर उसको काटने और दाना अलग करने, दानों को जुटाकर ट्रकों पर लोड करने का कार्य भी मशीनों से होता है। खेतों में ही स्थित माडर्न राइस मिलें उनकी प्रोसेसिंग कर चावल निकाल लेती हैं और उन्हें अलग-अलग समूहों में बांटकर बाजार की आवश्यकतानुसार उनकी पैकिंग करती हैं। पैकिंग के बाद उन्हें राइस मिल यार्ड में ही बने कोल्ड स्टोरेज में रख दिया जाता है और फिर बाजार में जरूरत और भाव देखकर बिक्री किया जाता है।
एग्रीकल्चर प्रोडक्ट से बने इंडस्ट्रियलिस्ट
किसानों को अपनी कच्ची फसल मंडी में नहीं ले जानी पड़ती और कम लागत में ज्यादा उत्पादन व फसल की प्रोसेसिंग करने तक का सारा काम मुश्किल से 40-50 कर्मचारी ही संभालते हैं। यहां अधिकांश किसान अपनी ही फसल से एग्रीकल्चर प्रोडक्ट से इंडस्ट्रियलिस्ट भी बने हैं।
पानी की बर्बादी रोकने को माइक्रो इरीगेशन सिस्टम
खेती में किसानों ने डिप व माइक्रो इरीगेशन सिस्टम अपनाया हुआ है। फलों के पेड़ों में पानी देने के लिए समीप ही पाइप लाइनें बिछी हुई हैं। इसमें लगे फव्वारे पेड़ों को पानी देते हैं। बाग में लगे एंटीना के माध्यम से किसानों के कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर में आने वाले सिग्नलों से पता चलता रहता है कि जमीन में कितनी नमी है और उसे कब और कितना पानी चाहिए। इस पद्धति से बिजली खर्च भी बचता है और मैन पॉवर भी। यहां लेबर काफी महंगी है, इसलिए यह पद्धति किसानों के लिए वरदान बन रही है। भारतीयों के लिए इस तरह की खेती करना एक स्वप्न जैसा हो सकता है, पर इसमें से काफी कुछ हम अपने यहां अपनाकर भारतीय किसानों को भी रईस बना सकते हैं।