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जंगल क्षेत्र पर भी चायनीज धान की काली छाया
ब्यूरो/अमर उजाला, पीलीभीत
Updated Mon, 25 Apr 2016 11:28 PM IST
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टाइगर रिजर्व के वन अफसर ने दावा किया है कि चायनीज धान की पैदावार से जंगल क्षेत्र में वाटर लेबल दस फिट नीचे पहुंच चुका है। अगर यदि इस तरह की इस खतरनाक फसल की पैदावार को नहीं रोका गया तो मैदानी क्षेत्र की सोना उगलने वाली जमीन तो बंजर हो ही जाएगी।, जंगलों में वन्यजीवों के लिए भी पानी का संकट पैदा हो जाएगा।
पीलीभीत के हरे भरे जंगलों की देश-विदेश में खास पहचान रही है। भले ही यहां के जंगल को टाइगर रिजर्व का दर्जा काफी देर से मिला हो, लेकिन यहां के जंगलों में बड़ी संख्या में बाघ, तेंदुआ, भालू सहित तमाम वन्यजीव पाए जाते हैं। बेमौसम कृषि फसलों की पैदावार के लिए अंधाधुंध पानी के दोहन से जंगलों में भी पानी का लेबल नीचे खिसकता जा रहा है। पंजाब और हरियाणा में चायनीज धान बड़े पैमाने पर पैदा किया गया। इसके चलते वहां की जमीन बंजर होने लगी और अब हरियाली से लबरेज पीलीभीत का भी यही हाल होता जा रहा है।
गर्मी के मौसम में गेहूं काटकर उसकी नरई को आग लगाने, चायनीज धान की रोपाई और उसे जिंदा रखने के लिए लगातार पानी देने के चलते पर्यावरण पर तो बुरा प्रभाव पड़ ही रहा है, साथ ही वाटर लेबल भी काफी नीचे पहुंच गया है। जंगलों में वन्यजीवों को प्यास बुझाने को इन दिनों तालाबों की खुदाई का कार्य चल रहा है। बोरिंग किए जा रहे हैं। इससे यह बात साफ हो रही है कि पहले की अपेक्षा वाटर लेबल दस फीट नीचे जा चुका है। यह एक बड़े खतरे की घंटी है। यदि चायनीज धान की पैदावार पर कानूनन पाबंदी नहीं लगाई गई तो स्थिति और जटिल हो जाएगी। बेजुवान वन्यजीवों को पानी कहां से मिलेगा। जंगल क्षेत्र में नजर डाले तो जलाशयों के किनारे जो झीलें हैं, वे भी सूखने लगी हैं। भाकियू के प्रांतीय उपाध्यक्ष मंजीत सिंह कहते हैं कि सरकार ने चायनीज धान की कभी आबपाशी भी नहीं ली, तो ऐसे फसल लगाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। वन अफसरों के मुताबिक टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों की प्यास बुझाने को तालाब खुदवा रहे हैं। निजी खर्च पर बोरिंग भी करवा रहे हैं।
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वर्जन:
जंगल क्षेत्र में पहले जहां 120 फीट पर पानी मिल जाता था, वहां अब 130 फीट बोरिंग कराना पड़ रहा है। यह चायनीज धान की पैदावार के चलते हो रहा है। वाटर लेवल घटने से दलदली भूमि भी सूखने लगी है। ऐसी स्थिति में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिहाज से चायनीज धान की पैदावार न की जाए तो ही बेहतर होगा।
-अनिल शाह वनक्षेत्राधिकारी, बराही
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पीलीभीत के हरे भरे जंगलों की देश-विदेश में खास पहचान रही है। भले ही यहां के जंगल को टाइगर रिजर्व का दर्जा काफी देर से मिला हो, लेकिन यहां के जंगलों में बड़ी संख्या में बाघ, तेंदुआ, भालू सहित तमाम वन्यजीव पाए जाते हैं। बेमौसम कृषि फसलों की पैदावार के लिए अंधाधुंध पानी के दोहन से जंगलों में भी पानी का लेबल नीचे खिसकता जा रहा है। पंजाब और हरियाणा में चायनीज धान बड़े पैमाने पर पैदा किया गया। इसके चलते वहां की जमीन बंजर होने लगी और अब हरियाली से लबरेज पीलीभीत का भी यही हाल होता जा रहा है।
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गर्मी के मौसम में गेहूं काटकर उसकी नरई को आग लगाने, चायनीज धान की रोपाई और उसे जिंदा रखने के लिए लगातार पानी देने के चलते पर्यावरण पर तो बुरा प्रभाव पड़ ही रहा है, साथ ही वाटर लेबल भी काफी नीचे पहुंच गया है। जंगलों में वन्यजीवों को प्यास बुझाने को इन दिनों तालाबों की खुदाई का कार्य चल रहा है। बोरिंग किए जा रहे हैं। इससे यह बात साफ हो रही है कि पहले की अपेक्षा वाटर लेबल दस फीट नीचे जा चुका है। यह एक बड़े खतरे की घंटी है। यदि चायनीज धान की पैदावार पर कानूनन पाबंदी नहीं लगाई गई तो स्थिति और जटिल हो जाएगी। बेजुवान वन्यजीवों को पानी कहां से मिलेगा। जंगल क्षेत्र में नजर डाले तो जलाशयों के किनारे जो झीलें हैं, वे भी सूखने लगी हैं। भाकियू के प्रांतीय उपाध्यक्ष मंजीत सिंह कहते हैं कि सरकार ने चायनीज धान की कभी आबपाशी भी नहीं ली, तो ऐसे फसल लगाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। वन अफसरों के मुताबिक टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों की प्यास बुझाने को तालाब खुदवा रहे हैं। निजी खर्च पर बोरिंग भी करवा रहे हैं।
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जंगल क्षेत्र में पहले जहां 120 फीट पर पानी मिल जाता था, वहां अब 130 फीट बोरिंग कराना पड़ रहा है। यह चायनीज धान की पैदावार के चलते हो रहा है। वाटर लेवल घटने से दलदली भूमि भी सूखने लगी है। ऐसी स्थिति में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिहाज से चायनीज धान की पैदावार न की जाए तो ही बेहतर होगा।
-अनिल शाह वनक्षेत्राधिकारी, बराही