{"_id":"5a369fbe4f1c1bc8678c1f8b","slug":"141513529278-pilibhit-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कूड़ा निस्तारण: सालों चली कवायद, नतीजा सिफर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कूड़ा निस्तारण: सालों चली कवायद, नतीजा सिफर
Updated Sun, 17 Dec 2017 11:17 PM IST
विज्ञापन
अमर उजाला
- फोटो : अमर उजाला
पीलीभीत। नगर पालिका परिषद में अब तक दस से अधिक चेयरमैनों ने कुर्सी हथियाई, लेकिन ढाई लाख की आबादी वाले इस शहर को कूड़े की समस्या से निजात नहीं दिला सके। शहर के अस्थाई डलावघरों में डाला जा रहा कूड़ा अब शहरवासियों के लिए नासूर बनने लगा है। खास बात यह है कि अस्थाई डलावघरों के अलावा कई खाली पड़े प्लाटों में भी कूड़ा डाला जा रहा है। शहरवासियों को कूड़ा निस्तारण की समस्या से निजात दिलाने को पिछले बोर्ड कार्यकाल में आश्वासन तो मिलता रहा, लेकिन समस्या का इलाज नहीं हुआ। अब शहरवासियों की निगाहें नवनिर्वाचित अध्यक्ष विमला जायसवाल पर टिकी हुई हैं। बर्षों से चली आ रही इस विकट समस्या से निपटना उनके लिए चुनौती भरा होगा। हालांकि नवनिर्वाचित अध्यक्ष ने इस समस्या को सात आठ महीने के भीतर ही निस्तारण करने का दावा किया है।
-----
नाम के हैं 30 से अधिक अस्थाई डलावघर
शहर में सड़कों के किनारे 30 से अधिक अस्थाई डलावघर बने हुए हैं, लेकिन यह सब महज नाम के ही हैं। पालिका के सफाई कर्मी शहर के 49 मुहल्लों का कूड़ा उठाकर इन्हीं अस्थाई डलावघरों में डाला जा रहा है। पालिका के आंकड़ों के मुताबिक हर रोज इन अस्थाई डलावघरों से करीब आठ मैट्रिक टन कूड़ा उठाकर देवहा नदी की तलहटी में डाला जा रहा है।
----
कहीं विरोध तो कहीं दूरी बनी रुकावट
शहर की आबादी बढ़ने के साथ कूड़े का वजन भी बढ़ता गया, लेकिन इस विकट समस्या से निपटने की कवायद मात्र पिछले बोर्ड के कार्यकाल में ही शुरू हुई। पूर्व चेयरमैन प्रभात जायसवाल ने कार्यकाल के अंतिम दो सालों में स्थाई डलावघर बनाने को लेकर भूमि तलाश की कवायद शुरू की थी। इसको लेकर गांव खरुआ, प्यास, मीरगंज चौराहा, नाकूड़ और ऐमी में भूमि की तलाश की गई। पालिका प्रशासन ने नाकूड़ को शहर से करीब होने के चलते सबसे उपयुक्त भी माना था, लेकिन विरोध के चलते मामला टल गया। इसके बाद ऐमी में डलावघर बनाने के प्रयास हुए, लेकिन शहर से अधिक दूरी होने के चलते इसे भी फेल कर दिया गया।
विज्ञापन
---
वेस्ट ट्रीटमेंट को आई कंपनी का भी अतापता नहीं
गुजरात की एक कंपनी ने करीब साढ़े तीन साल पहले डेनमार्क की एक कंपनी के सहयोग से शहर में वेस्ट मैनेजमेंट प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाने के प्रयास किए थे। कंपनी के विशेषज्ञों ने दो बार यहां पहुंचकर सैंपलिंग भी की। विशेषज्ञों का कहना था कि सैंपल एनालिसिस के बाद वेस्ट ट्रीटमेंट और कूड़े से बिजली उत्पादन आदि की संभावनाओं पर कार्य किया जाएगा, लेकिन इसके बाद न तो कंपनी के विशेषज्ञ लौटे और न ही पालिका प्रशासन ने इसकी कोई सुध ली।
-----
पहली बोर्ड की बैठक में ही कराएगा जाएगा निदान
यह सच है कि कूड़े के समस्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। गत वर्ष भी स्थाई डलावघर को लेकर प्रयास किए गए थे, लेकिन जमीन नहीं मिल सकी थी। शहरवासियों को इस समस्या से निजात दिलाने को पहली बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव कर जमीन खरीद के प्रयास शुरू किए जाएंगे। ताकि सात-आठ माह में इस बड़ी समस्या से छुटकारा मिल सके।
विमला जायसवाल, अध्यक्ष, नगरपालिका परिषद
विज्ञापन
-----
नाम के हैं 30 से अधिक अस्थाई डलावघर
शहर में सड़कों के किनारे 30 से अधिक अस्थाई डलावघर बने हुए हैं, लेकिन यह सब महज नाम के ही हैं। पालिका के सफाई कर्मी शहर के 49 मुहल्लों का कूड़ा उठाकर इन्हीं अस्थाई डलावघरों में डाला जा रहा है। पालिका के आंकड़ों के मुताबिक हर रोज इन अस्थाई डलावघरों से करीब आठ मैट्रिक टन कूड़ा उठाकर देवहा नदी की तलहटी में डाला जा रहा है।
विज्ञापन
----
कहीं विरोध तो कहीं दूरी बनी रुकावट
शहर की आबादी बढ़ने के साथ कूड़े का वजन भी बढ़ता गया, लेकिन इस विकट समस्या से निपटने की कवायद मात्र पिछले बोर्ड के कार्यकाल में ही शुरू हुई। पूर्व चेयरमैन प्रभात जायसवाल ने कार्यकाल के अंतिम दो सालों में स्थाई डलावघर बनाने को लेकर भूमि तलाश की कवायद शुरू की थी। इसको लेकर गांव खरुआ, प्यास, मीरगंज चौराहा, नाकूड़ और ऐमी में भूमि की तलाश की गई। पालिका प्रशासन ने नाकूड़ को शहर से करीब होने के चलते सबसे उपयुक्त भी माना था, लेकिन विरोध के चलते मामला टल गया। इसके बाद ऐमी में डलावघर बनाने के प्रयास हुए, लेकिन शहर से अधिक दूरी होने के चलते इसे भी फेल कर दिया गया।
विज्ञापन
---
वेस्ट ट्रीटमेंट को आई कंपनी का भी अतापता नहीं
गुजरात की एक कंपनी ने करीब साढ़े तीन साल पहले डेनमार्क की एक कंपनी के सहयोग से शहर में वेस्ट मैनेजमेंट प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाने के प्रयास किए थे। कंपनी के विशेषज्ञों ने दो बार यहां पहुंचकर सैंपलिंग भी की। विशेषज्ञों का कहना था कि सैंपल एनालिसिस के बाद वेस्ट ट्रीटमेंट और कूड़े से बिजली उत्पादन आदि की संभावनाओं पर कार्य किया जाएगा, लेकिन इसके बाद न तो कंपनी के विशेषज्ञ लौटे और न ही पालिका प्रशासन ने इसकी कोई सुध ली।
-----
पहली बोर्ड की बैठक में ही कराएगा जाएगा निदान
यह सच है कि कूड़े के समस्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। गत वर्ष भी स्थाई डलावघर को लेकर प्रयास किए गए थे, लेकिन जमीन नहीं मिल सकी थी। शहरवासियों को इस समस्या से निजात दिलाने को पहली बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव कर जमीन खरीद के प्रयास शुरू किए जाएंगे। ताकि सात-आठ माह में इस बड़ी समस्या से छुटकारा मिल सके।
विमला जायसवाल, अध्यक्ष, नगरपालिका परिषद