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दंगों में जेल गए दो उम्मीदवार भारी मतों से जीते
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Sun, 12 Mar 2017 12:40 AM IST
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खतौली में जश्न मनाते भाजपाई।
- फोटो : अमर उजाला
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भाजपा की अप्रत्याशित जीत की जमीन यूं ही तैयार नहीं हुई। हिंदूवादी चेहरों के सहारे भाजपा ने जिले में भगवा लहराया है। लोकसभा चुनाव में पार्टी को दंगे से जो ऊंचाइयां मिली थीं, वैसी ही कामयाबी विधानसभा चुनाव में दोहराई गई। 2012 में जिले में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। अबकी बार कई मुद्दे ऐसे बने, जिन्होंने भाजपा को सिरमौर बना दिया।
कमल मतदाताओं के दिलों में ऐसे खिलेगा, इसका किसी को अंदाजा नहीं था।
सारे सियासी समीकरण धरे रह गए। मीरापुर सीट को छोड़ दें तो भाजपा के अन्य सभी प्रत्याशी बड़ी जीत के नायक बने। वर्ष 2012 में जिले की किसी सीट पर भाजपा नहीं जीत पाई थी। लोकसभा चुनाव के बाद जब शहर सीट पर उपचुनाव हुआ तो भाजपा ने सपा से सीट जीत ली। भाजपा की अप्रत्याशित जीत की जमीन कई साल पहले ही तैयार होने लगी थी। दंगे के बाद भाजपा ने हिंदुत्व के मुद्दे को भुनाया। दंगे के आरोपी नेताओं को पार्टी ने हाथोंहाथ लिया।
खतौली से चुनाव जीते विक्रम सैनी को कवाल कांड में एक साल तक रासुका में जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा। उनका कोई बड़ा सियासी बैकग्राउंड नहीं है। मगर हिंदूवादी चेहरा होने के कारण पार्टी ने उन्हें खतौली से प्रत्याशी बनाया। बुढ़ाना सीट से जीतने वाले उमेश मलिक भी पार्टी का हिंदू चेहरा हैं। दंगे के आरोप में उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। शहर में छेड़छाड़ की छिटपुट घटनाओं को लेकर सांप्रदायिक बवालों में मोर्चा लेने वाले कपिलदेव अग्रवाल को भी हिंदुत्व के नाम पर वोट मिले हैं।
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चरथावल सीट से विधायक बने विजय कश्यप आरएसएस से जुड़े हुए हैं। हिंदुत्व का सियासी माहौल मुजफ्फरनगर दंगे से तैयार हुआ। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में दंगे की सहानुभूति को ध्रुवीकरण में तब्दील कर दिया, जिसकी वजह से जिले के साथ ही पूरे पश्चिम में भाजपा की लहर चली। हिंदुत्व के दम पर भाजपा ने बसपा और सपा से सीटें छीन ली। किसी को अनुमान नहीं था कि सभी छह सीटों पर भगवा लहरा जाएगा।
सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी से भी मोदी का क्रेज बढ़ा। चुनाव में पार्टी की कोई बड़ी रैली भी जिले में नहीं हुई। चुनाव के अंतिम दिन टाउनहाल में हुई योगी आदित्यनाथ की सभा ने कश्मीर के मुद्दे पर हिंदुओं का ध्रुवीकरण किया। बसपा और सपा के दिग्गजों की बेरुखी ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया। दंगे के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती की चुुप्पी से अतिपिछड़ी जातियां किनारा कर गईं। बहनजी के छह में से तीन सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी खड़े करने से सोशल इंजीनियरिंग गड़बड़ा गई। बार-बार टिकट बदलने से भी बसपा को नुकसान हुआ। पैसे के दम पर टिकट मिलने की परंपरा से भी वोटर खिन्न दिखाई दिए।
दंगे में अखिलेश सरकार के फैसलों को लेकर भी हिंदुओं में गुस्सा था। राजनीतिक तौर पर सपा के दिग्गजों ने बीते पांच साल में जिले में कोई खास रणनीति नहीं बनाई। कुर्सी को लेकर संगठन में कलह और गुटबाजी जमकर रही। बुढ़ाना से सपा के टिकट पर चुनाव जीते पूर्व सांसद अमीर आलम के बेटे नवाजिश का पार्टी छोड़कर बसपा में जाना भी घाटे का सौदा रहा।
पूर्व मंत्री चितरंजन स्वरूप के निधन से खाली हुई शहर सीट पर भी सपा की पकड़ ढीली हो गई। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जिले में कई बार आए, लेकिन संगठन को मजबूती नहीं दे सके। सपा के पास चुनाव में जिले में कोई प्रभावशाली नेता ही नहीं बचा। लंबे समय से सूबे की सत्ता से वनवास झेल रही भाजपा को मिले भारी समर्थन के पीछे जनता में परिवर्तन की चाह भी थी।
जातीय संतुलन से मिली कामयाबी
मुजफ्फरनगर। टिकट वितरण में भाजपा ने जो जातीय संतुलन बनाया था, उससे भी पार्टी को कामयाबी मिली। हालांकि मीरापुर और चरथावल सीट पर प्रत्याशियों की घोषणा के बाद पार्टी नेताओं के पुतले भी फूंके गए थे। छह सीटों पर भाजपा ने खतौली और चरथावल में अतिपिछड़ी जातियों को मौका दिया। विक्रम सैनी और विजय कश्यप पहली बार विधायक बने हैं। पुरकाजी सुरक्षित सीट पर वाल्मीकि प्रमोद ऊंटवाल को टिकट दिए जाने से भाजपा को हर सीट पर अति दलित जातियों के भी वोट मिले। जाटों को लुभाने के लिए बुढ़ाना से उमेश मलिक को दोबारा प्रत्याशी बनाया गया।
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कमल मतदाताओं के दिलों में ऐसे खिलेगा, इसका किसी को अंदाजा नहीं था।
सारे सियासी समीकरण धरे रह गए। मीरापुर सीट को छोड़ दें तो भाजपा के अन्य सभी प्रत्याशी बड़ी जीत के नायक बने। वर्ष 2012 में जिले की किसी सीट पर भाजपा नहीं जीत पाई थी। लोकसभा चुनाव के बाद जब शहर सीट पर उपचुनाव हुआ तो भाजपा ने सपा से सीट जीत ली। भाजपा की अप्रत्याशित जीत की जमीन कई साल पहले ही तैयार होने लगी थी। दंगे के बाद भाजपा ने हिंदुत्व के मुद्दे को भुनाया। दंगे के आरोपी नेताओं को पार्टी ने हाथोंहाथ लिया।
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खतौली से चुनाव जीते विक्रम सैनी को कवाल कांड में एक साल तक रासुका में जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा। उनका कोई बड़ा सियासी बैकग्राउंड नहीं है। मगर हिंदूवादी चेहरा होने के कारण पार्टी ने उन्हें खतौली से प्रत्याशी बनाया। बुढ़ाना सीट से जीतने वाले उमेश मलिक भी पार्टी का हिंदू चेहरा हैं। दंगे के आरोप में उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। शहर में छेड़छाड़ की छिटपुट घटनाओं को लेकर सांप्रदायिक बवालों में मोर्चा लेने वाले कपिलदेव अग्रवाल को भी हिंदुत्व के नाम पर वोट मिले हैं।
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चरथावल सीट से विधायक बने विजय कश्यप आरएसएस से जुड़े हुए हैं। हिंदुत्व का सियासी माहौल मुजफ्फरनगर दंगे से तैयार हुआ। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में दंगे की सहानुभूति को ध्रुवीकरण में तब्दील कर दिया, जिसकी वजह से जिले के साथ ही पूरे पश्चिम में भाजपा की लहर चली। हिंदुत्व के दम पर भाजपा ने बसपा और सपा से सीटें छीन ली। किसी को अनुमान नहीं था कि सभी छह सीटों पर भगवा लहरा जाएगा।
सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी से भी मोदी का क्रेज बढ़ा। चुनाव में पार्टी की कोई बड़ी रैली भी जिले में नहीं हुई। चुनाव के अंतिम दिन टाउनहाल में हुई योगी आदित्यनाथ की सभा ने कश्मीर के मुद्दे पर हिंदुओं का ध्रुवीकरण किया। बसपा और सपा के दिग्गजों की बेरुखी ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया। दंगे के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती की चुुप्पी से अतिपिछड़ी जातियां किनारा कर गईं। बहनजी के छह में से तीन सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी खड़े करने से सोशल इंजीनियरिंग गड़बड़ा गई। बार-बार टिकट बदलने से भी बसपा को नुकसान हुआ। पैसे के दम पर टिकट मिलने की परंपरा से भी वोटर खिन्न दिखाई दिए।
दंगे में अखिलेश सरकार के फैसलों को लेकर भी हिंदुओं में गुस्सा था। राजनीतिक तौर पर सपा के दिग्गजों ने बीते पांच साल में जिले में कोई खास रणनीति नहीं बनाई। कुर्सी को लेकर संगठन में कलह और गुटबाजी जमकर रही। बुढ़ाना से सपा के टिकट पर चुनाव जीते पूर्व सांसद अमीर आलम के बेटे नवाजिश का पार्टी छोड़कर बसपा में जाना भी घाटे का सौदा रहा।
पूर्व मंत्री चितरंजन स्वरूप के निधन से खाली हुई शहर सीट पर भी सपा की पकड़ ढीली हो गई। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जिले में कई बार आए, लेकिन संगठन को मजबूती नहीं दे सके। सपा के पास चुनाव में जिले में कोई प्रभावशाली नेता ही नहीं बचा। लंबे समय से सूबे की सत्ता से वनवास झेल रही भाजपा को मिले भारी समर्थन के पीछे जनता में परिवर्तन की चाह भी थी।
जातीय संतुलन से मिली कामयाबी
मुजफ्फरनगर। टिकट वितरण में भाजपा ने जो जातीय संतुलन बनाया था, उससे भी पार्टी को कामयाबी मिली। हालांकि मीरापुर और चरथावल सीट पर प्रत्याशियों की घोषणा के बाद पार्टी नेताओं के पुतले भी फूंके गए थे। छह सीटों पर भाजपा ने खतौली और चरथावल में अतिपिछड़ी जातियों को मौका दिया। विक्रम सैनी और विजय कश्यप पहली बार विधायक बने हैं। पुरकाजी सुरक्षित सीट पर वाल्मीकि प्रमोद ऊंटवाल को टिकट दिए जाने से भाजपा को हर सीट पर अति दलित जातियों के भी वोट मिले। जाटों को लुभाने के लिए बुढ़ाना से उमेश मलिक को दोबारा प्रत्याशी बनाया गया।