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नोटबंदी से टूटी उद्योगों की कमर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Sat, 26 Nov 2016 12:37 AM IST
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बैंक के बाहर लगी ग्राहकों की लाइन।
- फोटो : अमर उजाला
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नोटबंदी से लोहा और पेपर उद्योग की कमर टूट गई है। स्टील की सभी फैक्ट्री बंद हो गई हैं। पेपर उद्योग नकदी न होने से रॉ मैटीरियल की समस्या से जूझ रहा है। जनपद में हजारों मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट बना हुआ है। मार्केट में पैसे का फ्लो नहीं बन पाने से उद्योगपति भी परेशानी में हैं।
जनपद की लोहा उद्योग में अपनी एक पहचान रही है। सैकड़ों की संख्या में लोहा फैक्ट्री यहां हजारों लोगों को रोजगार दे रही थी। प्रदेश सरकार द्वारा बिजली के दाम बढ़ा दिए जाने से आधे से अधिक लोहा फैक्ट्री बंद हो गई और मालिकों ने उत्तराखंड या अन्य स्थानों पर नई फैक्ट्री लगा ली। जो लोग हिम्मत कर फैक्ट्री चला रहे थे, नोट बंदी ने उन्हें तोड़ दिया। इस समय लोहे की समस्त फैक्ट्री बंद है।
मालिकों के सामने जहां समस्या खड़ी हो गई है, वहीं मजदूर रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहे हैं। लोहा के बाद पेपर उद्योग में जिले की पहचान रही है। इस समय 28 पेपर मिल चल रही है। पेपर मिलों के सामने इस समय रॉ मैटीरियल की समस्या खड़ी हो गई है। इनका रॉ मैटीरियल एग्रीकल्चर बेस्ड है। किसान को अपने उत्पाद का नकद मूल्य चाहिए। एक फैक्ट्री को सप्ताह में केवल 50 हजार रुपये ही मिल पा रहे हैं। खर्चा लाखों रुपये रोज का है।
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ऐसे हालात में पेपर मिल भी संकट से गुजर रही है। यही हाल रहा तो पेपर मिल भी बंद हो जाएंगी। आईआईए के पूर्व अध्यक्ष कुशपुरी का कहना है कि जनपद के उद्योग इस समय संकट में हैं। कैश का फ्लो नहीं बन पाने के कारण समस्या उत्पन्न हुई है। फैक्ट्रियों का 90 प्रतिशत कार्य कैश पर चलता है। मजदूरों को नकद पैसा देना पड़ता है। लेबर को चेक दे दिया तो वह बैंक में ही पूरा दिन खराब कर रहा है। ऐसे हालात में उद्योगों को चला पाना मुश्किल हो गया है।
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जनपद की लोहा उद्योग में अपनी एक पहचान रही है। सैकड़ों की संख्या में लोहा फैक्ट्री यहां हजारों लोगों को रोजगार दे रही थी। प्रदेश सरकार द्वारा बिजली के दाम बढ़ा दिए जाने से आधे से अधिक लोहा फैक्ट्री बंद हो गई और मालिकों ने उत्तराखंड या अन्य स्थानों पर नई फैक्ट्री लगा ली। जो लोग हिम्मत कर फैक्ट्री चला रहे थे, नोट बंदी ने उन्हें तोड़ दिया। इस समय लोहे की समस्त फैक्ट्री बंद है।
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मालिकों के सामने जहां समस्या खड़ी हो गई है, वहीं मजदूर रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहे हैं। लोहा के बाद पेपर उद्योग में जिले की पहचान रही है। इस समय 28 पेपर मिल चल रही है। पेपर मिलों के सामने इस समय रॉ मैटीरियल की समस्या खड़ी हो गई है। इनका रॉ मैटीरियल एग्रीकल्चर बेस्ड है। किसान को अपने उत्पाद का नकद मूल्य चाहिए। एक फैक्ट्री को सप्ताह में केवल 50 हजार रुपये ही मिल पा रहे हैं। खर्चा लाखों रुपये रोज का है।
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ऐसे हालात में पेपर मिल भी संकट से गुजर रही है। यही हाल रहा तो पेपर मिल भी बंद हो जाएंगी। आईआईए के पूर्व अध्यक्ष कुशपुरी का कहना है कि जनपद के उद्योग इस समय संकट में हैं। कैश का फ्लो नहीं बन पाने के कारण समस्या उत्पन्न हुई है। फैक्ट्रियों का 90 प्रतिशत कार्य कैश पर चलता है। मजदूरों को नकद पैसा देना पड़ता है। लेबर को चेक दे दिया तो वह बैंक में ही पूरा दिन खराब कर रहा है। ऐसे हालात में उद्योगों को चला पाना मुश्किल हो गया है।