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सैनिकों के पास खाने को थे नमकपारे और खिचड़ी
Updated Wed, 26 Jul 2017 12:03 AM IST
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मुजफ्फरनगर। जंग जितनी गौरवगाथा वाली है, मंजर उतना ही भयावह था। पहाड़ की चोटियों पर बैठी दुश्मन फौज वीर जवानों को निशाना बना रही थी, लेकिन योद्धाओं के आगे टिक नहीं सकी। कारगिल युद्ध के चश्मदीद और दुश्मनों से लोहा लेने वाले ऋषिपाल सिंह कहते हैं कि तीन माह तक भारत मां के सपूतों ने दुश्मन फौज का सीना तानकर मुकाबला किया। हर पल भय था कि दुश्मन न जाने कहां से हमला बोल दे। खाने को नमकपारों के पैकेट और रेडीमेड खिचड़ी के सहारे जवान जंग में डटे रहे।
राजपूताना रायफल 12 जून 1999 की रात्रि आराम कर रही थी, तभी चोटियों से गोलियों की तड़तड़ाहट शुरू हो गई। पलभर में दुश्मन फौज ने गोलाबारी, बारूद बरसाना शुरू कर दिया। दुश्मन फौज श्रीनगर में 300 मीटर दरा तक पहुंच गई। भारतीय सेना के मुख्य रास्ते को कब्जा लिया और फायरिंग छोड़ दी। राजपूताना रायफल में शामिल करीब 1100 सैनिकों ने दुश्मनों का मुकाबला किया। कारगिल युद्ध में सबसे अधिक मुश्किल घड़ी ऋषिपाल सिंह के सामने तब आई, जब दुश्मनों की गोलियों ने उनकी बहन के सुहाग को उजाड़ दिया। देश की रक्षा के आगे रिश्तों के गमों का घूंट पीकर ऋषिपाल सिंह ने दुश्मनों के छक्के छुड़ाए। कारगिल युद्ध का मंजर याद कर भावुक हो गए। कहते हैं कि वीर सपूतों ने विकट परिस्थितियों से जूझ कर पाक सेना को घुटने टेकने पर मजबूर किया था। सैनिकों के पास गोलियां, बारूद तो भरपूर रहे, लेकिन भूख-प्यास ने भी कम बेहाल नहीं किया। सैनिकों ने जंग के दौरान पहाड़िय़ों पर खड़े दुश्मनों से मुकाबला करने के लिए पैकेट बंद नमकपारे और रेडीमेट खिचड़ी खाकर गुजारा किया। अंत में भारत के वीर योद्धाओं ने पाक सेना को खदेड़कर विजय गाथा लिखी। उन्होंने कहा कि पाक सेना 30 मिनट का भी सामान नहीं है। पहले के मुकाबले आज भारतीय सेना मजबूत और दृढ़ है।
रिश्तों की डोर में बांधी थी दोस्ती
मुजफ्फरनगर। ऋषिपाल सिंह ने बताया कि द्वितीय राजपूताना रायफल में पचेंडा निवासी बचन सिंह उनसे जूनियर थे। देश की रक्षा के लिए जज्बा और बचन सिंह की हिम्मत के ऋषिपाल कायल हो गए। पहले बचन सिंह दोस्त बने और बाद में ऋषिपाल सिंह के परिवार ने दोस्ती को रिश्तों के धागों में बांध दिया। कारगिल युद्ध से पहले ऋषिपाल ने अपनी बहन कामेश बाला की शादी बचन सिंह कर दी।
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राजपूताना रायफल 12 जून 1999 की रात्रि आराम कर रही थी, तभी चोटियों से गोलियों की तड़तड़ाहट शुरू हो गई। पलभर में दुश्मन फौज ने गोलाबारी, बारूद बरसाना शुरू कर दिया। दुश्मन फौज श्रीनगर में 300 मीटर दरा तक पहुंच गई। भारतीय सेना के मुख्य रास्ते को कब्जा लिया और फायरिंग छोड़ दी। राजपूताना रायफल में शामिल करीब 1100 सैनिकों ने दुश्मनों का मुकाबला किया। कारगिल युद्ध में सबसे अधिक मुश्किल घड़ी ऋषिपाल सिंह के सामने तब आई, जब दुश्मनों की गोलियों ने उनकी बहन के सुहाग को उजाड़ दिया। देश की रक्षा के आगे रिश्तों के गमों का घूंट पीकर ऋषिपाल सिंह ने दुश्मनों के छक्के छुड़ाए। कारगिल युद्ध का मंजर याद कर भावुक हो गए। कहते हैं कि वीर सपूतों ने विकट परिस्थितियों से जूझ कर पाक सेना को घुटने टेकने पर मजबूर किया था। सैनिकों के पास गोलियां, बारूद तो भरपूर रहे, लेकिन भूख-प्यास ने भी कम बेहाल नहीं किया। सैनिकों ने जंग के दौरान पहाड़िय़ों पर खड़े दुश्मनों से मुकाबला करने के लिए पैकेट बंद नमकपारे और रेडीमेट खिचड़ी खाकर गुजारा किया। अंत में भारत के वीर योद्धाओं ने पाक सेना को खदेड़कर विजय गाथा लिखी। उन्होंने कहा कि पाक सेना 30 मिनट का भी सामान नहीं है। पहले के मुकाबले आज भारतीय सेना मजबूत और दृढ़ है।
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रिश्तों की डोर में बांधी थी दोस्ती
मुजफ्फरनगर। ऋषिपाल सिंह ने बताया कि द्वितीय राजपूताना रायफल में पचेंडा निवासी बचन सिंह उनसे जूनियर थे। देश की रक्षा के लिए जज्बा और बचन सिंह की हिम्मत के ऋषिपाल कायल हो गए। पहले बचन सिंह दोस्त बने और बाद में ऋषिपाल सिंह के परिवार ने दोस्ती को रिश्तों के धागों में बांध दिया। कारगिल युद्ध से पहले ऋषिपाल ने अपनी बहन कामेश बाला की शादी बचन सिंह कर दी।
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