Munawwar Rana: जब मुनव्वर ने मुशायरे के पेमेंट में लिए हलीम-चावल, 1988 में पहली बार मुरादाबाद आए थे राना
शायर मुनव्वर राना के निधन से मुरादाबाद में उनके चाहने वाले आहत हैं। राना पहली बार 1988 में शहर में हुए एक कार्यक्रम में भाग लेने आए थे। उस दौरान उन्होंने इसके पैमेंट में सिर्फ हलीम चावल की फरमाइश की थी। शानदार कार्यक्रम होने पर उन्होंने मुरादाबाद की तारीफ भी की थी।
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किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई, मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में मां आई। सादा जुबान में ऐसे गंभीर शेर कहने वाले शायर मुनव्वर राना असल जिंदगी में भी अपने हिस्से में सिर्फ मोहब्बतें चाहते थे। बात 1988 की है, जब स्थानीय शायर कशिश वारसी के निमंत्रण पर पहली बार मुनव्वर याद-ए-दिगर मुशायरे में मुरादाबाद आए थे।
यह मुशायरा लाल मस्जिद क्षेत्र में हुआ था। बकौल कशिश उस समय मुशायरे में मुनव्वर राना का पेमेंट 20 से 25 हजार रुपये होता था। तब उन्होंने मुरादाबाद मुशायरे के बाद भुगतान नहीं बल्कि बड़ी मुरव्वत से हलीम चावल की फरमाइश की थी। मुशायरा 22 जनवरी 1988 को होना था और उसमें तत्कालीन दिग्गज शायर रईस अंसारी व निहाल रिजवी को आमंत्रित किया गया था।
इन शायरों ने कशिश वारसी से कहा कि मुनव्वर राना को भी बुलाओ। उस समय आयोजक के पास इतना बजट नहीं था कि राना को 25 हजार रुपये का भुगतान किया जा सके। कम बजट की बात दबे लहजे में कहते हुए कशिश ने असमर्थता व्यक्त की तो रईस ने मुनव्वर को फोन थमा दिया और कशिश से बोले... ले बात कर।
कशिश ने कहा... बाबा आदाब। उधर से आवाज आई आदाब... खुश रहिए। कशिश बोले कि क्या आप शहर-ए-जिगर में मुशायरा पढ़ने आ सकते हैं। मुझे कहते हुए शर्म महसूस हो रही है, कि आपके मुताबिक मानदेय नहीं हो सकेगा। तब मुनव्वर राना का जवाब था कि कशिश... या तो मुझे बाबा मत पुकार या फिर पेमेंट की बात मत कर।
मैं रईस और निहाल भाई के साथ मुरादाबाद आ रहा हूं। पेमेंट नहीं लूंगा लेकिन घर के बने हलीम चावल खिलाने होंगे। इसके बाद कई बार मुरादाबाद में अलग-अलग मंचों पर राना ने मुशायरों में शिरकत की।
मेरी पोती को किताब देकर बोले भाईजान तक पहुंचा देना
मुरादाबाद निवासी वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. माहेश्वर तिवारी ने देश के कई शहरों में मुनव्वर राना के साथ मंच साझा किया है। डॉ. माहेश्वर बताते हैं कि मुनव्वर प्यार से उन्हें भाईजान कहते थे। गंभीर बीमारी का पता उन्हें बहुत पहले चल गया था लेकिन कहते थे कि भाईजान जितनी जिंदगी है उसे खुलकर जिएंगे।
जिगर मंच पर आयोजित प्रदर्शनी के मुशायरे में एक बार जब मुनव्वर राना मुरादाबाद आए तो माहेश्वर तिवारी की पोती भाषा उनसे मिलने पहुंचीं। भाषा ने अपना परिचय दिया तो मुनव्वर ने उन्हें अपनी किताब दी और कहा कि यह भाईजान तक पहुंचा देना।
तो अब इस गांव से रिश्ता हमारा खत्म हमारा खत्म होता है...
कशिश वारसी बताते हैं कि मुरादाबाद के कई मुशायरों में मुनव्वर राना ने अपना कलाम पेश किया है। साल 2012 से 15 के मुरादाबाद में आयोजित प्रदर्शनी के मुशायरे में वह आए थे। तब उन्होंने अपनी प्रसिद्ध गजल पढ़ी थी जिसका शेर है कि तो अब इस गांव से रिश्ता हमारा खत्म होता है, फिर आंखें खोल ली जाएं कि सपना खत्म होता है।
तब किसे पता कि इस शहर में उनका यह आखिरी मुशायरा था। कशिश का कहना है कि आज मुनव्वर राना को याद करके उन्हें यही गजल बार बार याद आती है।