पीतलनगरी में खाकी की साख दांव पर, हर पांचवां पुलिसकर्मी आरोपी
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पीतल नगरी में खाकी की साख दांव पर है। जिले में तैनात लगभग 3500 पुलिसकर्मियों में से 720 अर्थात हर पांचवां पुलिसकर्मी किसी न किसी आरोप में घिरा है। पुलिस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है सबसे ज्यादा आरोप दबंगों और रसूखदारों के खिलाफ अपराध की शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई न करने की है।
लगभग 175 मामले ऐसे हैं जिनमें शिकायत के बावजूद पुलिस कर्मियों ने दबंगों, उत्पीड़न करने वालों अथवा अपराध करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। खोखला हो रहे सिस्टम की सबसे चिंताजनक बात यह है कि पुलिस के आला अफसर भी मातहतों के खिलाफ लगे आरोपों की अनदेखी करते रहे हैं।
पुलिस महकमे का दावा है कि लगभग 50 मामलों में जांच पूरी हो चुकी है। लेकिन इन पर कार्रवाई बाकी है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि समय रहते दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई न करने से ही ‘विकास दुबे कानपुर वाला’ जैसे दुर्दांत अपराधी पैदा होते हैं।
पुलिस कर्मियों से संबंधित जितने भी मामलों की जांच चल रही है। मैं खुद उन मामलों की निगरानी करूंगा। जितने भी मामलों की जांच पूरी हो गई होगी। उन पर जल्द फैसला लिया जाएगा। इसके अलावा पुलिसकर्मियों से संबंधित मामलों की शिकायत के लिए मैंने व्हाट्सएप नंबर 9368332927 जारी किया है। इस नंबर पर पीड़ित अपनी शिकायत भेज सकते हैं।
- प्रभाकर चौधरी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मुरादाबाद
आरोपियों से मिलीभगत से एफआईआर दर्ज न करना 200
संज्ञेय अपराधों में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी गिरफ्तारी न करना 100
फरियादियों और पीड़ितों के साथ दुर्व्यवहार 75
अवकाश के बाद से गायब रहना 62
ड्यूटी प्वाइंट से गायब रहना 50
समय से चार्जशीट दाखिल न करना 30
अन्य आरोप 203
कुल आरोपी पुलिसकर्मी 720
सिपाही से इंस्पेक्टर तक सब पर जांच की आंच
जिन पुलिस कर्मियों के खिलाफ जांच चल रही है उनमें आरक्षी, मुख्य आरक्षी, उप निरीक्षक, और निरीक्षक भी शामिल हैं। जनपद में पुलिसकर्मियों की संख्या से औसत निकालें तो हर पांचवां पुलिसकर्मी जांच के दायरे में है। सबसे ज्यादा शिकायतें आरोपियों की गिरफ्तारी न करने के मामलों में हैं।
ज्यादातर मामलों में प्राथमिक रिपोर्ट में ही मिल जाती है क्लीनचिट
पुलिस कर्मियों के खिलाफ शिकायत मिलने पर अफसर पहले प्राथमिकी जांच कराते हैं। इस जांच रिपोर्ट से ही तय होता है कि पुलिस कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए या नहीं। विभाग का ही व्यक्ति जांच करता है। वह प्राथमिक रिपोर्ट में ही पुलिसकर्मी को क्लीनचिट दे देते हैं। ऐसे में आरोप लगने के बाद भी इन पुलिसकर्मियों को राहत मिल जाती है। जबकि शिकायत करने वाला न्याय के लिए भटकता रहता है।