Kargil Vijay Diwas: तीन गोली लगी.. फिर भी दुश्मन से लड़ते रहे कैप्टन अखिलेश, युद्ध से दो माह पहले हुई थी शादी
मुरादाबाद निवासी कैप्टन अखिलेश सक्सेना ने कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय दिया था। तीन गोली लगने के बाद भी वह दुश्मनों से लड़ते रहे। युद्ध के दौरान सक्सेना ने तीन महत्वपूर्ण टुकड़ियों का नेतृत्व किया था।
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कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का प्रदर्शन करने वाले जांबाजों में जिले के लाल कैप्टन अखिलेश सक्सेना का नाम भी शामिल है। तीन गोलियां लगने के बाद भी कैप्टन अखिलेश सक्सेना दुश्मनों से लोहा लेते रहे थे। उनकी मां चंद्रकांता ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान हमें नहीं पता था कि मेरा बेटा युद्ध में चला गया है।
युद्ध शुरू होने के दो माह बाद हमें यह जानकारी मिली। हमें गर्व है कि बेटे ने देश की रक्षा के लिए अदम्य साहस दिखाया। शुक्रवार को कारगिल विजय दिवस को 25 साल पूरे हो गए। कारगिल युद्ध में मुरादाबाद जिले के नवीन नगर निवासी कैप्टन अखिलेश सक्सेना ने आर्टीलरी विंग की तीन महत्वपूर्ण टुकड़ियों का नेतृत्व किया था।
पाकिस्तानी घुसपैठिए ऐसे स्थान पर बैठे हुए थे, जहां से वह भारतीय सैनिकों पर गोलाबारी कर रहे थे। भारतीय सेना के दो हमले विफल हो चुके थे। ऐसे में कैप्टन अखिलेश सक्सेना को दुश्मनों से सीधा मोर्चा लेने के लिए कमान सौंपी गई। वह तब तक लड़ते रहे, जब तक जीत हासिल नहीं हुई।
उनकी मां चंद्रकांता ने बताया कि कारगिल युद्ध में पहुंचने के दो महीने पहले ही कैप्टन अखिलेश की शादी हुई थी। बेटे की पोस्टिंग पंजाब में थी। युद्ध में जाने से एक सप्ताह पहले बहू को घर पहुंचा दिया था। उन्होंने बताया कि युद्ध शुरू होने के दो माह बाद जब तीन गोलियां लगने पर बेटे को बेस अस्पताल दिल्ली में भर्ती कराया गया था।
तब वह बेटे से परिवार के साथ मिलने पहुंची थीं। एक साल बाद कैप्टन अखिलेश अस्पताल से घर आए। हालांकि, उसके बाद सेना में सेवाएं नहीं दे सके।
टाटा कम्युनिकेशन कंपनी में हैं वाइस प्रेसीडेंट
कागरिल की लड़ाई में गंभीर रूप से घायल कैप्टन अखिलेश सक्सेना करीब एक साल तक अस्पताल में भर्ती रहे थे। उसके बाद वह घर लौटे, लेकिन सेना में सेवाएं देने की स्थिति में नहीं थे। ऐसे में उन्होंने एमबीए की परीक्षा पास की। अब वह दिल्ली स्थित टाटा कम्युनिकेशन कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट के पद पर कार्यरत हैं।
सीमा पर पाकिस्तान की गोलाबारी आज भी कर देती है बेचैन
कैप्टन अखिलेश सक्सेना ने बताया कि कारगिल युद्ध में वहां की परिस्थितियां बहुत विषम थीं। दुश्मन ऊंची चोटियों पर बैठे थे और भारतीय सैनिकों को नीचे से ऊपर जाकर लड़ना पड़ता था। ऐसे में भारतीय सैनिकों को दुश्मनों को मार गिराने में काफी परेशानी उठानी पड़ती थी।
बावजूद वह अपनी टुकड़ी के साथ निरंतर चढ़ाई करते गए और आगे बढ़ते रहे, वहां करो या मरो की स्थिति बनी रहती थी। उन्होंने बताया कि दो जुलाई को देर रात करीब तीन बजे तोलोलिंग चौकी को पाकिस्तानी घुसपैठियों से मुक्त कराकर आगे कूच करने के लिए सैनिकों को निर्देशित कर रहे थे।
उसी समय दुश्मन की तीन गोलियां उनके हाथों में लगीं, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बराबर मोर्चा संभाले रखा। उन्होंने ब्लैक रॉक पर तिरंगा फहराया था। उन्होंने बताया कि सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से होने वाली गोलीबारी आज भी उन्हें बेचैन कर देती है।
युद्ध शुरू होने के दो महीने बाद आई थी चिट्ठी
कैप्टन के पिता एडवोकेट सीपी सक्सेना ने बताया कि बेटे की चिट्ठी युद्ध शुरू होने के दो महीने बाद आई थी। चिट्ठी में लिखा था कि मम्मी-पापा भारत और पाकिस्तान का युद्ध शुरू हो गया है। मैं युद्ध में जा रहा हूं, पता नहीं क्या होगा। मैं जो भी करने जा रहा हूं, देश के लिए करने जा रहा हूं। चिट्ठी मिलने पर परिजन बेचैन हुए, लेकिन सभी को बेटे पर गर्व है।