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रामगंगा किनारे की हरियाली लील रहा स्क्रैप का काला धुआं- पानी
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
Updated Sun, 05 Mar 2017 02:43 AM IST
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सूख गए हजारों पेड़
- फोटो : अमर उजाला
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ई कचरे से सोना-चांदी निकालने वाले धंधेबाजों ने बरसों पुराने विशालकाय बरगद-पीपल के पेड़ों को सुखा डाला है। प्रदूषण युक्त भट्ठियों से निकला काला धुआं-पानी इन पेड़ों की जान ले रहा है। कुछ वक्त पहले तक हरे भरे पेड़ लोगों को छांव देते थे, लेकिन अब ये पेड़ पूरी तरह सूख चुके हैं।
सोचिए प्रदूषण ने जब इन विशालकाय पेड़ों का ये हाल कर दिया है तो इंसानों का अंजाम क्या होगा। एनजीटी ने प्रदूषण से होने वाले खतरों को समझा और प्रशासन को ये सब बंद कराने को कहा भी, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी ने आदेश नजरअंदाज कर दिया। नतीजतन ईकचरा अब भी जल रहा है।
राममंगा नदी किनारे जिस क्षेत्र में सबसे अधिक पीतल गलाने की भट्ठ़ियां हैं, वहां के डेढ़-दो सौ साल पुराने पेड़े सूखने लगे हैं। इन पेड़ों पर यहां के स्क्रैप के पानी का भी खास असर पड़ा है। यहां लालबाग, नवाबपुरा, जामा मस्जिद दसवांघाट, बरबलान, गुंइयांबाग समेत विभिन्न क्षेत्रों में पीतल की सिल्ली बनाने के लिए भट्टियों में स्क्रैप जलाया जाता है।
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इससे निकलने वाला धूआं बेहद हानिकारक और प्रदूषणकारी है। वहीं नदी किनारे नदी के पानी में मिट्टी वाले स्क्रैप को धोने से यहां का पानी प्रदूषित हुआ है। प्रदूषण इस कदर बढ़ गया है की भू जल भी प्रदूषित हो रहा है।
ऐसे में यहां के सालों पुराने विशालकाय पेड़ पिछले दस से पंद्रह सालों से सूखने लगे हैं। पीपल, शीशम, नीम समेत कई पेड़े जो हरेभरे और छायादार थे वे या तो पूरी तरह सूख गए हैं या सूखने वाले हैं।
ऐसे में समझा जा सकता है कि यहां प्रदूषण किस स्तर तक पहुंच गया है। जब पेड़ाें पर यहां के प्रदूषण का इतना गहरा दुष्परिणाम सामने आ रहा है तो मानव स्वास्थ्य के लिए यह कितना हानिकारक होगा, समझा जा सकता है।
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सोचिए प्रदूषण ने जब इन विशालकाय पेड़ों का ये हाल कर दिया है तो इंसानों का अंजाम क्या होगा। एनजीटी ने प्रदूषण से होने वाले खतरों को समझा और प्रशासन को ये सब बंद कराने को कहा भी, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी ने आदेश नजरअंदाज कर दिया। नतीजतन ईकचरा अब भी जल रहा है।
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राममंगा नदी किनारे जिस क्षेत्र में सबसे अधिक पीतल गलाने की भट्ठ़ियां हैं, वहां के डेढ़-दो सौ साल पुराने पेड़े सूखने लगे हैं। इन पेड़ों पर यहां के स्क्रैप के पानी का भी खास असर पड़ा है। यहां लालबाग, नवाबपुरा, जामा मस्जिद दसवांघाट, बरबलान, गुंइयांबाग समेत विभिन्न क्षेत्रों में पीतल की सिल्ली बनाने के लिए भट्टियों में स्क्रैप जलाया जाता है।
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इससे निकलने वाला धूआं बेहद हानिकारक और प्रदूषणकारी है। वहीं नदी किनारे नदी के पानी में मिट्टी वाले स्क्रैप को धोने से यहां का पानी प्रदूषित हुआ है। प्रदूषण इस कदर बढ़ गया है की भू जल भी प्रदूषित हो रहा है।
ऐसे में यहां के सालों पुराने विशालकाय पेड़ पिछले दस से पंद्रह सालों से सूखने लगे हैं। पीपल, शीशम, नीम समेत कई पेड़े जो हरेभरे और छायादार थे वे या तो पूरी तरह सूख गए हैं या सूखने वाले हैं।
ऐसे में समझा जा सकता है कि यहां प्रदूषण किस स्तर तक पहुंच गया है। जब पेड़ाें पर यहां के प्रदूषण का इतना गहरा दुष्परिणाम सामने आ रहा है तो मानव स्वास्थ्य के लिए यह कितना हानिकारक होगा, समझा जा सकता है।