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ये है रमजान महीने में रोजा रखने की सबसे खास वजह
अमर उजाला ब्यूरो/ सहारनपुर
Updated Tue, 06 Jun 2017 06:19 PM IST
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रमजान का महीना
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देवबंद में दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी बनारसी ने कहा कि मजहबे इस्लाम में रमजान महीने का रोजा एक अहम रुकन (भाग) है, जिसका सवाब अल्लाह ताआला खुद देता है।
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रमजान की फजीलतों पर रोशनी डालते हुए मौलाना अबुल कासिम नोमानी बनारसी ने कहा कि हदीस में अल्लाह ने फरमाया है कि बंदा रोजा सिर्फ मेरे लिए रखता है सुबह से शाम तक भूखा प्यासा रहता है, अपनी कामुकता पर काबू रखता है। गुनाहों से बचता है और मेरी खुशी हासिल करने के लिए सब्र और बर्दाश्त का प्रदर्शन करता है। इसलिए इसका बदला और सवाब में खुद अपने हाथों से अपने बंदों को दूंगा। उन्होंने कहा कि रमजान को अल्लाह ने तीन भागों में विभाजित किया हुआ है। पहला अशरा (पहले दस दिन) रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत और अंतिम तीसरा अशरा (आखिरी 9 या 10 दिन) दोजख से निजात का है। मौलाना बनारसी ने रोजा बुरे कामों से बचने और नेक काम करने का माध्यम है। रोजा केवल इबादत ही नहीं बल्कि इबादतों की रुह है। रोजा एक ऐसी उपासना है जो मनुष्य के लिए शारीरिक और व्यवहारिक तौर पर फायदेमंद है।
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