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गन्ने पर असर नहीं, इसलिए चैन से बैठे पश्चिमी यूपी के किसान
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मेरठ। कृषि कानूनों को लेकर जिस तरह पंजाब और हरियाणा के किसानों की भारी भीड़ दिल्ली के सिंधु और टीकरी बार्डर पर जमा है ऐसी भीड़ दिल्ली के गाजीपुर बार्डर पर यूपी गेट पर नहीं है। जबकि यहां पर किसानों का नेतृत्व किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की भाकियू और उसके बेटे चौधरी नरेश टिकैत व राकेश टिकैत कर रहे हैं।
कानूनों के विरोध में पश्चिमी यूपी के किसानों की कम भागीदारी के पीछे का कारण किसान गन्ने पर कृषि कानून का असर न होना मान रहे हैं। वहीं कुछ किसानों का कहना है कि अब किसान नेताओं में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत जैसी इमानदारी और सादगी नहीं है, इसीलिए पश्चिम यूपी के किसान आंदोलन में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं।
अगर गन्ने पर असर पड़ता तो करते आंदोलन
भाकियू से लंबे समय तक जुड़े रहे ब्रजपाल सिंह पाथौली का कहना है कि पश्चिमी यूपी गन्ने की बेल्ट है और इसे चीनी का कटोरा कहा जाता है। केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानून गन्ने को प्रभावित नहीं कर रहे हैं। गन्ना किसी मंडी में नहीं बल्कि गन्ना एक्ट के तहत गन्ना समितियों के माध्यम से बेचा जाता है। अगर इन कानूनों में गन्ना भी प्रभावित होता तो पश्चिमी के किसान जोरशोर से आंदोलन करते।
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दर्जनों किसान संगठन बन गए
प्रगतिशील किसान एवं दौराला गन्ना समिति के पूर्व चेयरमैन चौधरी पीतम सिंह का कहना है कि चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के जाने के बाद दर्जनों किसान संगठन बन गए। राजनीतिक पार्टियों ने भी किसानों को जातियों और धर्मों में बांट दिया। इससे किसान आंदोलन कमजोर हो रहा है। गन्ने की वजह से पश्चिमी यूपी में आ रही समृद्धि भी अब किसानों को आंदोलनों से दूर कर रही है। पीड़ा होने पर ही किसान आंदोलन की तरफ बढ़ता है।
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महापंचायत में पहुंचे बहुत कम किसान
मेरठ। यूपी गेट पर बृहस्पतिवार को हुई भाकियू की महापंयायत में मेरठ से बहुत कम किसान पहुंचे। केवल भाकियू पदाधिकारी ही अपने साथ कुछ किसानों को लेकर महापंचायत में शामिल हुए। सूत्रों का कहना है कि पदाधिकारियों के गांवों के किसान ही आंदोलन में शिरकत नहीं कर रहे हैं। ब्यूरो
विद्युत अभियंताओं ने भी दिया किसान आंदोलन को समर्थन
मेरठ। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद् अभियंता संघ ने कृषि कानूनों और विद्युत संशोधन बिल 2020 की वापसी की मांग कर रहे किसानों को समर्थन का एलान किया है।
संघ के अध्यक्ष वीपी सिंह और महासचिव प्रभात सिंह ने बताया कि विद्युत संशोधन बिल में प्रावधान है कि किसानों को बिजली टैरिफ में मिल रही सब्सिडी समाप्त कर दी जाए और बिजली की लागत से कम मूल्य पर किसानों सहित किसी भी उपभोक्ता को बिजली न दी जाए। हालांकि बिल में यह प्रावधान है कि सरकार चाहे तो किसानों को डीबीटी के जरिये सब्सिडी दे सकती है, लेकिन इसके पहले किसानों को बिजली का पूरा भुगतान करना पड़ेगा। ब्यूरो
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कानूनों के विरोध में पश्चिमी यूपी के किसानों की कम भागीदारी के पीछे का कारण किसान गन्ने पर कृषि कानून का असर न होना मान रहे हैं। वहीं कुछ किसानों का कहना है कि अब किसान नेताओं में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत जैसी इमानदारी और सादगी नहीं है, इसीलिए पश्चिम यूपी के किसान आंदोलन में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं।
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अगर गन्ने पर असर पड़ता तो करते आंदोलन
भाकियू से लंबे समय तक जुड़े रहे ब्रजपाल सिंह पाथौली का कहना है कि पश्चिमी यूपी गन्ने की बेल्ट है और इसे चीनी का कटोरा कहा जाता है। केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानून गन्ने को प्रभावित नहीं कर रहे हैं। गन्ना किसी मंडी में नहीं बल्कि गन्ना एक्ट के तहत गन्ना समितियों के माध्यम से बेचा जाता है। अगर इन कानूनों में गन्ना भी प्रभावित होता तो पश्चिमी के किसान जोरशोर से आंदोलन करते।
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दर्जनों किसान संगठन बन गए
प्रगतिशील किसान एवं दौराला गन्ना समिति के पूर्व चेयरमैन चौधरी पीतम सिंह का कहना है कि चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के जाने के बाद दर्जनों किसान संगठन बन गए। राजनीतिक पार्टियों ने भी किसानों को जातियों और धर्मों में बांट दिया। इससे किसान आंदोलन कमजोर हो रहा है। गन्ने की वजह से पश्चिमी यूपी में आ रही समृद्धि भी अब किसानों को आंदोलनों से दूर कर रही है। पीड़ा होने पर ही किसान आंदोलन की तरफ बढ़ता है।
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महापंचायत में पहुंचे बहुत कम किसान
मेरठ। यूपी गेट पर बृहस्पतिवार को हुई भाकियू की महापंयायत में मेरठ से बहुत कम किसान पहुंचे। केवल भाकियू पदाधिकारी ही अपने साथ कुछ किसानों को लेकर महापंचायत में शामिल हुए। सूत्रों का कहना है कि पदाधिकारियों के गांवों के किसान ही आंदोलन में शिरकत नहीं कर रहे हैं। ब्यूरो
विद्युत अभियंताओं ने भी दिया किसान आंदोलन को समर्थन
मेरठ। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद् अभियंता संघ ने कृषि कानूनों और विद्युत संशोधन बिल 2020 की वापसी की मांग कर रहे किसानों को समर्थन का एलान किया है।
संघ के अध्यक्ष वीपी सिंह और महासचिव प्रभात सिंह ने बताया कि विद्युत संशोधन बिल में प्रावधान है कि किसानों को बिजली टैरिफ में मिल रही सब्सिडी समाप्त कर दी जाए और बिजली की लागत से कम मूल्य पर किसानों सहित किसी भी उपभोक्ता को बिजली न दी जाए। हालांकि बिल में यह प्रावधान है कि सरकार चाहे तो किसानों को डीबीटी के जरिये सब्सिडी दे सकती है, लेकिन इसके पहले किसानों को बिजली का पूरा भुगतान करना पड़ेगा। ब्यूरो