{"_id":"58504dd14f1c1bdd5d64a27d","slug":"naunihaalo-ki-thaali","type":"story","status":"publish","title_hn":"देश के भविष्य से खिलवाड़, थाली में परोसी जा रही बासी रोटी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
देश के भविष्य से खिलवाड़, थाली में परोसी जा रही बासी रोटी
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 14 Dec 2016 12:11 PM IST
विज्ञापन
फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मिड-डे मील में बच्चों को खराब क्वालिटी का भोजन परोसा जा रहा है। बासी रोटी खिलाकर उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। प्राइमरी से लेकर उच्च प्राथमिक विद्यालय के छात्रों को दस से 12 घंटे पहले बनीं रोटियां परोसी जा रही हैं। नियमानुसार रोटी आठ से दस किमी. के दायरे में बननी चाहिए, लेकिन वह 60 से 70 किमी. की दूरी से लाईं जा रही हैं। एनजीओ भोजन की मात्रा में भी खेल कर रही हैं। इससे सरकार को प्रतिमाह आठ से दस लाख का चूना लगाया जा रहा है। मंडलीय समन्वयक के निरीक्षण में यह खुलासा हुआ है।
एनजीओ ने भारी मुनाफा कमाने के लिए पूरा खेल कर रखा है। सोमवार और बृहस्पतिवार को भोजन में दी जाने वाली चपाती स्थानीय रसोई में नहीं, बल्कि डासना और नोएडा में तैयार हो रही हैं। इसका खुलासा मंडलीय स्तर पर कराई गई जांच में हुआ है। एनजीओ डासना, नोएडा में प्लांट से रोटियां लाते हैं। सुबह चार बजे एनजीओ की गाड़ी रोटी लेकर चलती है। प्राइमरी, उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को भोजन दोपहर 12 से 12.30 बजे के बीच ही दिया जाता है। आठ से 10 घंटे की बासी चपाती बच्चों को मिलती है। प्लांट में रोटी बनाने के लिए आटा करीब चार घंटे पहले ही तैयार होकर रख दिया जाता है। मंडलीय समन्वयक ने निरीक्षण की पूरी रिपोर्ट एडी बेसिक को सौंप दी है।
मोटी कमाई का खेल
मिड-डे मील के मंडलीय समन्वयक वीरेंद्र कुमार द्वारा किए गए निरीक्षण में और भी कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने रिपोर्ट में लिखा है कि एनजीओ भोजन में पर्याप्त मात्रा में बच्चों को खाद्यान्न (गेहूं व चावल) नहीं दे रहे हैं। सोमवार व बृहस्पतिवार को प्रति छात्र दो चपाती दी जाती हैं। इनका वजन 60 ग्राम है। नियमानुसार प्राइमरी में 100 ग्राम व उच्च प्राइमरी में 150 ग्राम की चपाती होनी चाहिए। इसी हिसाब से सरकार की तरफ से एनजीओ को खाद्यान्न मुहैया कराया जाता है। इसके अतिरिक्त भोजन तैयार करने के लिए प्राइमरी में 4.30 रुपये व उच्च प्राइमरी में 6.18 रुपये प्रति डाइट (छात्र) के हिसाब से सरकार देती है। रसोइये को अलग से भुगतान किया जाता है।
विज्ञापन
बड़े स्तर पर हो रही लूट
इस खेल में मेरठ के अलावा बागपत, मुजफ्फरनगर, हापुड़, बुलंदशहर के एनजीओ भी शामिल हैं। डासना और नोएडा में बनाई जा रहीं चपाती इन सभी जिलों के नगरीय प्राथमिक, उच्च प्राथमिक विद्यालय में पहुंचाई जा रही हैं।
70 हजार छात्रों के सेहत से खिलवाड़
जिले में 6 एनजीओ संचालित हैं। ये 69,937 बच्चों को भोजन देने का काम करती हैं। सभी एनजीओ ने स्थानीय स्तर पर रसोई बनाई हैं, लेकिन यहां पर रोटी नहीं बनाई जाती। रसोई का कार्य केवल कागजों तक सीमित है।
एनजीओ पर होगी कार्रवाई
अभी तक एनजीओ दलिया ही दे रहे थे। दबाव बनाकर रोटी की व्यवस्था कराई गई है। क्वालिटी खराब होने की कुछ शिकायतें हैं। जांच कराई जा रही है। अगर क्वालिटी खराब मिलती या कम मात्रा में खाद्यान्न दिया जा रहा है तो संबंधित एनजीओ पर कार्रवाई कराई जाएगी। - डॉ. अशोक कुमार सिंह, एडी बेसिक
विज्ञापन
एनजीओ ने भारी मुनाफा कमाने के लिए पूरा खेल कर रखा है। सोमवार और बृहस्पतिवार को भोजन में दी जाने वाली चपाती स्थानीय रसोई में नहीं, बल्कि डासना और नोएडा में तैयार हो रही हैं। इसका खुलासा मंडलीय स्तर पर कराई गई जांच में हुआ है। एनजीओ डासना, नोएडा में प्लांट से रोटियां लाते हैं। सुबह चार बजे एनजीओ की गाड़ी रोटी लेकर चलती है। प्राइमरी, उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को भोजन दोपहर 12 से 12.30 बजे के बीच ही दिया जाता है। आठ से 10 घंटे की बासी चपाती बच्चों को मिलती है। प्लांट में रोटी बनाने के लिए आटा करीब चार घंटे पहले ही तैयार होकर रख दिया जाता है। मंडलीय समन्वयक ने निरीक्षण की पूरी रिपोर्ट एडी बेसिक को सौंप दी है।
विज्ञापन
मोटी कमाई का खेल
मिड-डे मील के मंडलीय समन्वयक वीरेंद्र कुमार द्वारा किए गए निरीक्षण में और भी कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने रिपोर्ट में लिखा है कि एनजीओ भोजन में पर्याप्त मात्रा में बच्चों को खाद्यान्न (गेहूं व चावल) नहीं दे रहे हैं। सोमवार व बृहस्पतिवार को प्रति छात्र दो चपाती दी जाती हैं। इनका वजन 60 ग्राम है। नियमानुसार प्राइमरी में 100 ग्राम व उच्च प्राइमरी में 150 ग्राम की चपाती होनी चाहिए। इसी हिसाब से सरकार की तरफ से एनजीओ को खाद्यान्न मुहैया कराया जाता है। इसके अतिरिक्त भोजन तैयार करने के लिए प्राइमरी में 4.30 रुपये व उच्च प्राइमरी में 6.18 रुपये प्रति डाइट (छात्र) के हिसाब से सरकार देती है। रसोइये को अलग से भुगतान किया जाता है।
विज्ञापन
बड़े स्तर पर हो रही लूट
इस खेल में मेरठ के अलावा बागपत, मुजफ्फरनगर, हापुड़, बुलंदशहर के एनजीओ भी शामिल हैं। डासना और नोएडा में बनाई जा रहीं चपाती इन सभी जिलों के नगरीय प्राथमिक, उच्च प्राथमिक विद्यालय में पहुंचाई जा रही हैं।
70 हजार छात्रों के सेहत से खिलवाड़
जिले में 6 एनजीओ संचालित हैं। ये 69,937 बच्चों को भोजन देने का काम करती हैं। सभी एनजीओ ने स्थानीय स्तर पर रसोई बनाई हैं, लेकिन यहां पर रोटी नहीं बनाई जाती। रसोई का कार्य केवल कागजों तक सीमित है।
एनजीओ पर होगी कार्रवाई
अभी तक एनजीओ दलिया ही दे रहे थे। दबाव बनाकर रोटी की व्यवस्था कराई गई है। क्वालिटी खराब होने की कुछ शिकायतें हैं। जांच कराई जा रही है। अगर क्वालिटी खराब मिलती या कम मात्रा में खाद्यान्न दिया जा रहा है तो संबंधित एनजीओ पर कार्रवाई कराई जाएगी। - डॉ. अशोक कुमार सिंह, एडी बेसिक