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एमडीए के कर्मचारी कर रहे ठेकेदारी
अमित मुदगल/मेरठ
Updated Mon, 08 Aug 2016 02:34 AM IST
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एमडीए कार्यालय का लोगो।
- फोटो : अमर उजाला
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मेरठ विकास प्राधिकरण में कई कर्मचारियों ने नियम कानून को पूरी तरह ताक पर रख दिया है। नाम बदलकर ये कर्मचारी ठेकेदारी कर रहे हैं। मिलीभगत कर बिना दफ्तर आए ही इनकी हाजिरी रोजाना लग जाती है। समय पर वेतन भी जारी हो रहा है। शासन से ऐसे कर्मचारियों की शिकायत नाम के साथ हुई है, जिस पर गोपनीय जांच शुरू कराई गई है।
कर्मचारियों के कारनामों की शिकायत
एमडीए बोर्ड के एक सदस्य ने मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत की है। इसमें बताया गया है कि नाम बदलकर ये कर्मचारी निर्माण कार्यों में ठेकेदारी कर रहे हैं। प्राधिकरण के कर्मचारी होने का लाभ इन्हें ठेकेदारी में भी मिल रहा है। पहले मेरठ में जमकर ठेकेदारी की और अब दो मेट गाजियाबाद में नाम बदलकर इस काम को कर रहे हैं। वेतन एमडीए से ले रहे हैं। यहां कभी आते ही नहीं। इन दोनों की हाजिरी यहां जरूर लग जाती है। इलेक्ट्रिीशियन भी इसी काम को कर रहे हैं। स्टोर में तैनात लिपिकोें की जांच कराने को कहा गया है। आरोप लगाया कि केवल सफाई के नाम पर 25-25 हजार रुपये की दो फाइल पास कराने स्टोर लिपिक एमडीए आते हैं। बाकी समय अपना काम करते हैं और सफाई होती नहीं। हां, ये फाइलें तत्काल पास हो जाती हैं। इस बात की जांच भी नहीं की जा रही है कि वास्तव में इतना पैसा सफाई पर खर्च हो रहा है या नहीं।
अधिष्ठान में बड़ा खेल
शिकायत में कहा गया है कि एमडीए के अधिष्ठान विभाग में बड़ा खेल हो रहा है। यहां कई कर्मचारियों की डिग्रियां फर्जी हैं। गलत वेतन निर्धारण किया गया है। ऐसी कई फाइलें हैं जिनमें कर्मचारियों के शैक्षिक दस्तावेज लगे ही नहीं हैं और हैरत की बात यह है कि उनसे मांगे भी नहीं गए हैं। जांच करने वाले ही कई बाबुओं के सही दस्तावेज फाइलों पर नहीं लगे हैं। कर्मचारियों की सर्विस बुक तक अपूर्ण हैं।
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रिटायरमेंट पर भी ऑडिट नहीं
हाल ही में एमडीए से एक कर्मचारी रिटायर हुए हैं। रिटायरमेंट से पूर्व उन्होंने लखनऊ विकास प्राधिकरण के आधार पर अपना वेतन तय करा लिया। सन 1986 से इसे जोड़कर लाखों रुपये एरियर के रूप में भुगतान लिया गया। हैरत की बात यह है कि रिटायरमेंट के समय इसका ऑडिट ही नहीं कराया गया। यह हाल तब है, जबकि ऐसे ही प्रकरण में पूर्व में रिकवरी के आदेश हो चुके हैं। इसके बाद भी यह खेल यहां बदस्तूर जारी है। यहां ऐसे कई कर्मचारी हैं जिन्होंने अन्य प्राधिकरणों के हिसाब से मन माफिक एमडीए में अपनी वेतन प्रोन्नति करा ली है।
मकान भत्ता में भी धांधली
एमडीए के कई कर्मचारी ऐसे हैं जो आवासीय भत्ता लेने में भी बड़ा गड़बड़झाला कर रहे हैं। शिकायत में ऐसे कर्मचारियों के नाम स्पष्ट किए गए हैं। दरअसल नियम यह है कि यदि पति पत्नी दोनों सरकार या अर्द्ध सरकारी सेवा में हैं तो दोनों में से एक को ही आवास भत्ता अनुमन्य होगा। एमडीए में भी ऐसे कई कर्मचारी हैं जिनकी पत्नी सरकारी सेवा में हैं। पति पत्नी दोनों ही सरकार से आवास भत्ता ले रहे हैं।
गोपनीय जांच शुरू
इस प्रकरण पर शासन के गोपनीय विभाग से जांच शुरू करने को कहा गया है। एमडीए वीसी को इस बाबत पत्र भेजा गया है। साथ ही इसकी सूचना उप्र आवास एवं शहरी नियोजन विभाग को भी भेजी गई है। कहा गया है कि अपने स्तर से पूरे प्रकरण की जांच कराएं और देखें कि वास्तव में सच्चाई क्या है? विदित हो कि एमडीए में कर्मचारियों की उपस्थिति को लेकर कई बार सवाल खड़े हो चुके हैं। यहां तक कि एमडीए कर्मचारी हाजिरी के लिए प्रस्तावित बायोमेट्रिक मशीन का भी विरोध करते आए हैं। यही कारण है कि चंद ऐसे कर्मचारियों की वजह से सिस्टम पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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कर्मचारियों के कारनामों की शिकायत
एमडीए बोर्ड के एक सदस्य ने मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत की है। इसमें बताया गया है कि नाम बदलकर ये कर्मचारी निर्माण कार्यों में ठेकेदारी कर रहे हैं। प्राधिकरण के कर्मचारी होने का लाभ इन्हें ठेकेदारी में भी मिल रहा है। पहले मेरठ में जमकर ठेकेदारी की और अब दो मेट गाजियाबाद में नाम बदलकर इस काम को कर रहे हैं। वेतन एमडीए से ले रहे हैं। यहां कभी आते ही नहीं। इन दोनों की हाजिरी यहां जरूर लग जाती है। इलेक्ट्रिीशियन भी इसी काम को कर रहे हैं। स्टोर में तैनात लिपिकोें की जांच कराने को कहा गया है। आरोप लगाया कि केवल सफाई के नाम पर 25-25 हजार रुपये की दो फाइल पास कराने स्टोर लिपिक एमडीए आते हैं। बाकी समय अपना काम करते हैं और सफाई होती नहीं। हां, ये फाइलें तत्काल पास हो जाती हैं। इस बात की जांच भी नहीं की जा रही है कि वास्तव में इतना पैसा सफाई पर खर्च हो रहा है या नहीं।
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अधिष्ठान में बड़ा खेल
शिकायत में कहा गया है कि एमडीए के अधिष्ठान विभाग में बड़ा खेल हो रहा है। यहां कई कर्मचारियों की डिग्रियां फर्जी हैं। गलत वेतन निर्धारण किया गया है। ऐसी कई फाइलें हैं जिनमें कर्मचारियों के शैक्षिक दस्तावेज लगे ही नहीं हैं और हैरत की बात यह है कि उनसे मांगे भी नहीं गए हैं। जांच करने वाले ही कई बाबुओं के सही दस्तावेज फाइलों पर नहीं लगे हैं। कर्मचारियों की सर्विस बुक तक अपूर्ण हैं।
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रिटायरमेंट पर भी ऑडिट नहीं
हाल ही में एमडीए से एक कर्मचारी रिटायर हुए हैं। रिटायरमेंट से पूर्व उन्होंने लखनऊ विकास प्राधिकरण के आधार पर अपना वेतन तय करा लिया। सन 1986 से इसे जोड़कर लाखों रुपये एरियर के रूप में भुगतान लिया गया। हैरत की बात यह है कि रिटायरमेंट के समय इसका ऑडिट ही नहीं कराया गया। यह हाल तब है, जबकि ऐसे ही प्रकरण में पूर्व में रिकवरी के आदेश हो चुके हैं। इसके बाद भी यह खेल यहां बदस्तूर जारी है। यहां ऐसे कई कर्मचारी हैं जिन्होंने अन्य प्राधिकरणों के हिसाब से मन माफिक एमडीए में अपनी वेतन प्रोन्नति करा ली है।
मकान भत्ता में भी धांधली
एमडीए के कई कर्मचारी ऐसे हैं जो आवासीय भत्ता लेने में भी बड़ा गड़बड़झाला कर रहे हैं। शिकायत में ऐसे कर्मचारियों के नाम स्पष्ट किए गए हैं। दरअसल नियम यह है कि यदि पति पत्नी दोनों सरकार या अर्द्ध सरकारी सेवा में हैं तो दोनों में से एक को ही आवास भत्ता अनुमन्य होगा। एमडीए में भी ऐसे कई कर्मचारी हैं जिनकी पत्नी सरकारी सेवा में हैं। पति पत्नी दोनों ही सरकार से आवास भत्ता ले रहे हैं।
गोपनीय जांच शुरू
इस प्रकरण पर शासन के गोपनीय विभाग से जांच शुरू करने को कहा गया है। एमडीए वीसी को इस बाबत पत्र भेजा गया है। साथ ही इसकी सूचना उप्र आवास एवं शहरी नियोजन विभाग को भी भेजी गई है। कहा गया है कि अपने स्तर से पूरे प्रकरण की जांच कराएं और देखें कि वास्तव में सच्चाई क्या है? विदित हो कि एमडीए में कर्मचारियों की उपस्थिति को लेकर कई बार सवाल खड़े हो चुके हैं। यहां तक कि एमडीए कर्मचारी हाजिरी के लिए प्रस्तावित बायोमेट्रिक मशीन का भी विरोध करते आए हैं। यही कारण है कि चंद ऐसे कर्मचारियों की वजह से सिस्टम पर सवाल खड़े हो रहे हैं।