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नदी ही नहीं, जिंदगी भी निगल रहा उद्योगों का प्रदूषण

Fri, 24 Feb 2017 02:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 24 Feb 2017 02:19 AM IST
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life is destroying pollution
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
 प्रत्येक औद्योगिक इकाई में प्राथमिक औद्योगिक प्रवाह शोधन संयंत्र (ईटीपी) की अनिवार्यता के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जिले में हलचल मच गई है। खासकर उन इकाइयों में हड़कंप की स्थिति है, जो बिना ईटीपी के संचालित हैं। हालांकि, सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सख्त कार्रवाई की बात कह रहा है। लेकिन, जब तक ईटीपी लगाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान नहीं चलाया जाएगा, तब तक जिला औद्योगिक प्रदूषण से उबर नहीं पाएगा।
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मेरठ समेत वेस्ट यूपी के कई जिलों में अधिकांश औद्योगिक इकाइयों से दूषित जल की निकासी सीधे नदी और अन्य जलाशयों में हो रही है। स्थिति यह है कि अधिकांश इकाइयों में ईटीपी ही नहीं हैं। यह भी सामने आया है कि जिन इकाइयों में ईटीपी लगा है, वह निरीक्षण के दौरान अधिकांश मामलों में बंद पाया जाता है। इसके चलते जल प्रदूषण से गंभीर बीमारियां फैल रही हैं। प्रदूषण इस स्तर तक पहुंच चुका है कि कई लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी है। भूजल सहित अन्य जल स्रोतों में प्रदूषण के चलते अधिकांश इलाकों में हैंडपंप दूषित पानी उगल रहा है। इसके चलते कई हैंडपंप बंद भी कराए जा चुके हैं। यही वजह है कि कभी जीवनदायिनी कही जाने वाली काली नदी का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है। इसके किनारे बसे दर्जनों गावों के लोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की गिरफ्त में हैं। काली नदी के किनारे बसे दौराला, पनवाड़ी, देदवा, सैनी, गेसूपुर, गोकलपुर, घोसीपुर, समोली, उलखपुर, जलालपुर, मामूरी समेत दर्जनों गांवों में भयावह स्थिति है।
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सख्ती से नहीं होता पालन
सूत्रों के मुताबिक, जिले में जिन 70 औद्योगिक इकाइयों के प्रदूषण फैलाने के चलते बंद होने की बात कही जा रही है, जरूरी नहीं है कि वे बंद ही हों। साथ ही जिन सात इकाइयों में ईटीपी न लगे होने की बात कही जा रही है, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, यह भी अभी स्पष्ट नहीं है। दरअसल, क्षेत्रीय स्तर पर नियम और आदेशों का सख्ती से पालन न कराए जाने के चलते ही ऐसी भयावह स्थिति पैदा हुई है। शीर्ष अदालत और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) जनहित से जुड़े इस मुद्दे पर इतने गंभीर हैं कि प्रदूषण पर लगाम के लिए समय-समय पर लगातार सख्त आदेश दिए जाते रहे हैं। लेकिन सरकारी विभागों द्वारा न तो ऐसी इकाइयों की मानीटरिंग की जाती है और न ही कमियां मिलने पर सख्त कदम उठाए जाते हैं। यही वजह है कि औद्योगिक इकाइयों से दूषित पानी सीधे नदियों और अन्य जलाशयों में बहाया जा रहा है।
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यह हैं सुप्रीम कोर्ट के आदेश
प्रदेश में बढ़ते जल प्रदूषण पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी रोकथाम के लिए सख्त आदेश जारी किए हैं। तीन माह में प्रदूषण पर रोक लगाने के साथ ही कहा है कि सभी इकाइयों में अनिवार्य रूप से ईटीपी लगने चाहिए। साथ ही जहां लगे हैं, वह चालू हालत में हों। ऐसा न होने पर कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए हैं।


मेरठ में ये हैं उद्योग
क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार मेरठ में डिस्टिलरी, पेपर मिल, शुगर मिल जैसी करीब 126 प्रमुख औद्योगिक इकाइयां हैं। प्रदूषण फैलाने के चलते इनमें से करीब 70 इकाइयां कागजों पर बंद बताई जा रही है। इसके अलावा करीब सात इकाइयां बिना ईटीपी के संचालित बताई जा रही हैं। हालांकि, बोर्ड के अफसरों ने नए सिरे से सत्यापन के बाद ही इसकी आधिकारिक संख्या बताने की बात कही है।

आदेश की खास बातें
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सामूहिक रूप से सभी इकाइयों को नोटिस जारी करे
- तीन महीने बाद संबधित बोर्ड निरीक्षण करे
- निरीक्षण के दौरान देखें कि ईटीपी लगाया गया या नहीं
- यह भी देखा जाए कि ईटीपी बंद है या चालू है
- ईटीपी अगर बंद है तो उसकी अवधि क्या है
- ईटीपी अगर चालू स्थिति में है तो वह ठीक से काम कर भी रहा है या नहीं


 
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